नोटा विकल्प क्या है?

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NOTA = None Of The Above यानी : इनमे से कोई नहीं. नोटा के बारे में पेड मीडिया द्वारा किया गया भ्रामक प्रचार यह है कि, यह उम्मीदवार को खारिज करने की प्रक्रिया है, जबकि ऐसा नहीं है। सही बात यह है कि नोटा खुद के वोट को खारिज करने की प्रक्रिया है !! कैसे ?

(1) नोटा – नोटा में दिए गए वोट निरस्त माने जाते है। मान लीजिये किसी निर्वाचन क्षेत्र में 100 वोट गिरे है , और उनमे से 90 वोट नोटा को मिले , तो चुनाव आयोग 90 वोटो को invalid मान कर रद्द कर देता है, और सिर्फ 10 वोट ही वैध माने जायेंगे। इन 10 वोटो में जिस उम्मीदवार को अधिक वोट मिले है वो उम्मीदवार जीत जायेगा !! इस तरह नोटा उम्मीदवार को ख़ारिज नहीं करता, बल्कि आपके वोट को मतों की गिनती से बाहर कर देता है !!

(2) राईट टू रिजेक्ट – यह भी एक कमतर और अनुपयोगी प्रस्ताव है। राईट टू रिजेक्ट में उम्मीदवारों को खारिज कर दिया जाता है। किन्तु नोटा और राईट टू रिजेक्ट में अंतर यह है कि, यदि रिजेक्ट करने वाले मतदाताओ का बहुमत है तो फिर से चुनाव कराये जाते है। अत: राईट टू रिजेक्ट उम्मीदवारों को खारिज करने की व्यवस्था है।

अब मान लीजिये कि रिजेक्शन के बाद होने वाले चुनाव में जो जो उम्मीदवार मैदान में है जनता उनमे से किसी योग्य एवं ईमानदार व्यक्ति को चुन लेती है। लेकिन जैसे ही यह आदमी चुनाव जीतेगा उसके अगले दिन ही वो भ्रष्ट हो जाएगा। अब मतदाता के पास इसे 5 साल झेलने के अलावा कोई इलाज नहीं है। 5 साल बाद मतदाता फिर किसी दूसरे उम्मीदवार को चुनेंगे और भगवान से मनाएंगे कि ये उम्मीदवार भ्रष्ट न हो जाए। किन्तु चुनाव जीतने के अगले दिन ही यह भी बिक जाएगा। बस यही चक्र चलता रहेगा। राईट टू रिजेक्ट इस चक्र को रोकने सक्षम नहीं है।

(3) वोट वापसी – यह सबसे ताकतवर प्रस्ताव है। यदि मतदाता किसी उम्मीदवार को चुनते है, और चुनाव जीतने के बाद वह निकम्मा या भ्रष्ट हो जाता है तो मतदाता बहुमत का प्रदर्शन करके इस जीते हुए उम्मीदवार को पद से निष्काषित कर सकते है। इस तरह वोट वापसी की व्यवस्था चुनाव जीतने वाले व्यक्ति को निरंतर ईमानदार बनाए रखती है। जैसे ही वह बिकेगा वैसे ही जनता अपना वोट वापिस लेकर किसी दुसरे को देना शुरू कर देगी। और यदि 51% मतदाता किसी अन्य उम्मीदवार को वोट कर देते है तो मौजूदा व्यक्ति निकाल दिया जायेगा।

लगभग 240 साल पहले जब अमेरिका इंग्लेंड से आजाद हुआ, और वहां वोट देने का क़ानून आया तो नागरिको ने कहा कि अगर चुनाव जीतने के बाद नेता हमारी बात सुनना बंद कर देंगे तो हम उसे 5 साल से पहले कैसे हटायेंगे ?

इस समस्या के इलाज के लिए अमेरिका में वोट वापिस लेने का क़ानून भी लाया गया। वोट वापिस लेने का क़ानून होने से अमेरिका के नागरिक जब देखते है कि कोई नेता या अधिकारी एकदम निकम्मा हो गया है, तो वे उसे हटाने के लिए 5 साल तक इन्तजार नहीं करते, बल्कि अपना वोट वापिस लेकर उसे पहले ही बदल देते है !!

निकाले जाने के डर की वजह से अमेरिका के नेता एवं अधिकारी अपने काम में लगातार सुधार करते रहते है। जो अपना काम नहीं सुधारता उसे वहां के नागरिक नौकरी से निकाल देते है। ठीक उसी तरह जिस तरह प्राइवेट कम्पनी में यदि कर्मचारी ठीक से काम नहीं करता तो मालिक उसे नौकरी से निकाल देता है।

छांटने की इस प्रक्रिया के कारण वहां भ्रष्ट आदमी पद पर नहीं रह पाता। इसके अलावा जब किसी नेता या अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की कोई शिकायत आती है तो मुकदमे की सुनवाई जज की जगह नागरिको की जूरी करती है। जूरी सिस्टम के कारण भ्रष्ट नेताओं-अधिकारियो को तुरंत दंड मिलता है और वे सलीके से काम करते है।

जब भारत आजाद हुआ और वोट देने का कानून आया तो भारतीय नागरिको ने भी यह मांग की कि वोट वापिस लेने का क़ानून भी बनाओ, ताकि निकम्मे एवं भ्रष्ट नेता-मंत्री-अधिकारी को हम छांट कर नौकरी से निकाल सके। पर उस समय के नेता भारत के आम नागरिको को वोट वापिस लेने का अधिकार नहीं देना चाहते थे, अत: उन्होंने इस क़ानून को गेजेट में छापने से मना कर दिया। उन्होंने कहा – अभी भारतीयों के लिए वोट देने का क़ानून ही काफी है, और वोट वापिस लेने का क़ानून हम बाद में बना देंगे !!

और फिर बाद में, बाद में कहकर वे इस क़ानून को पिछले 70 सालों से टालते आ रहे है। आज की तारीख में भी सभी पार्टियों के सभी नेता यही कहते है कि – अभी थोडा और रुको, अगले महीने यह क़ानून बना देंगे, अगले साल बना देंगे, अभी इस क़ानून को गेजेट में छापने का सही टाइम नहीं आया है “, आदि आदि !!

जब भारत के लोग अंग्रेजो से मांग कर रहे थे कि हमें भी वोटिंग राइट्स दो, तो अंग्रेज यही कहते थे कि भारतीयों में अक्ल नहीं है, भारतीय गंवार है, जाहिल है, पढ़े लिखे नहीं है, अत: इन्हें वोट देने का अधिकार देने से कयामत आ जायेगी !!

अंग्रेज चले गए पर शेष भारतीयों को कोसने और गरियाने के लिए अपनी पढ़ी लिखी सभ्य औलादों को यही पर छोड़ कर गए है। और ये विशिष्ट बुद्धिजीवी आज भी यही रट लगाये हुए है कि भारत के लोग जाहिल है और इसीलिए इन्हें वोट वापसी का अधिकार नही मिलना चाहिए !!

अब वोट वापसी का क़ानून तो उन्हें लाना नहीं है, तो वे भारतीयों को ” नोटा और राईट टू रिजेक्ट ” जैसे झुनझुने पकड़ाते रहते है। और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा संचालित पेड मीडिया इस बात का विशेष ध्यान रखता है कि ” वोट वापसी ” नामक लफ्ज भारतीयों के कान तक में नहीं जाना चाहिए !!

चुनाव सुधार के नाम पर अभी 20 साल वे नोटा से टाइम पास करेंगे, और जब यह बात कॉमन नोलेज में आ जाएगी कि नोटा बकवास है तो वे चुनाव सुधार के नाम पर राईट टू रिजेक्ट नाम की नयी सुपर बकवास लायेंगे और इससे फिर 20 साल बर्बाद कर देंगे, और फिर कहेंगे कि भारत के लोगो के डीएनए में ही गडबडी है, इनका कुछ हो नहीं सकता !! गलत समाधान देना राजनीति का सबसे बारीक पैंतरा है !!

क्या नोटा दबाने से कोई बदलाव लाया जा सकता है ?

पेड मीडिया द्वारा कार्यकर्ताओं को यह दवाई पिलाई जा रही है कि , नोटा के कारण राजनैतिक पार्टियों पर अच्छे उम्मीदवार उतारने का दबाव पड़ेगा। मेरे विचार में यह एक बकवास तर्क है। तकनीकी रूप से नोटा दबाने वाला व्यक्ति यह कहता है कि मैं किसी को चुनना नहीं चाहता।

लेकिन तथ्य यह है कि तब भी वे लोग चुन लिए जायेंगे जिन्हें आप चुने हुए नहीं देखना चाहते। नोटा इस परिस्थिति में कोई भी बदलाव लेकर नहीं आता। और न ही नोटा की संख्या बढ़ने से किसी राजनैतिक पार्टी को कोई फर्क आता है। दबाव बनना तो दूर की बात है। राईट टू रिजेक्ट भी इसी तरह की चिल्लर व्यवस्था है !!

वोट वापसी इससे कहीं ज्यादा ताकतवर व्यवस्था है। वोट वापसी में मतदाताओ के पास यह विकल्प रहता है कि वह चुन कर आये बदतर व्यक्ति को किसी भी समय नौकरी से निकाल सकते है। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह एक रहस्य भरा प्रश्न है कि नोटा का समर्थन करने वाले कार्यकर्ता जब यह मानते है कि सारे उम्मीदवार बुरे है अत: हम नोटा दबायेंगे तो वह कौनसी चीज है जो उन्हें वोट वापसी कानून का समर्थन करने से रोकती है !!

क्योंकि वोट वापसी क़ानून नोटा का प्रचार करने वाले कार्यकर्ताओ को यह अधिकार देता है कि, वे बदतर उम्मीदवारों को नौकरी से निकाल कर किसी अच्छे उम्मीदवार को चुन सके। वो भी किसी भी समय। 5 साल इन्तजार किये बिना !!