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श्री काशी मणिकर्णिका महात्म्य कथा

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🌺।।स्कन्दपुराण के काशी खण्ड से ली गयी श्री काशी मणिकर्णिका महात्म्य कथा।।🌺

जब श्री हरि विष्णु के तप से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने, जो गौरी सहित थे, उन्हें वरदान मांगने को कहा तो महाविष्णु ने निम्नलिखित वरदान माँगा।

श्री महाविष्णु वर मांगते है कि;

⚜️गिरिजावल्लभ! आपके मुक्तामय (मोती के) कुंडल के गिर जाने से तिर्थों में श्रेष्ठ यह तीर्थ इस लोक में मुक्तिक्षेत्र हो।

⚜️हे विभो! इस अकथनीय उस परंज्योति के प्रकाश पाने से इस तीर्थ का और एक नाम काशी पड़े।

⚜️सृष्टि के जरायूजादि चारों प्रकार के भूतग्रामों में आब्रह्मस्तम्ब पर्यंत (समस्त) जो कुछ जंतुसंज्ञक हैं, वह सब काशी में मुक्तिलाभ करें।

⚜️शम्भो! जो महाप्राज्ञ आयु को क्षणविनाशी, विपत्ति को विपुल और संपत्ति को क्षणभंगूर विचार कर इस तीर्थक्षेत्र मणिकर्णीका पर स्नान, संध्या,जप, होम, वेदपाठ, तर्पण, पिण्डादान, देवों का पूजन तथा गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, घोड़ा, अन्न, वस्त्र, भूषण, कन्यादानादिक एवं अनेक अग्निष्टोम प्रभुति यज्ञ, व्रतोत्सर्ग और लिंग वा प्रतिमा आदि कि स्थापना करे, इस का कर्म फल एकमात्र अक्षय मोक्ष होवे।

⚜️आत्मघात और निरअनशन व्रत को छोड़ कर यहाँ पर अन्य जो कुछ शुभकर्म किया जावे वह सब मुक्ति लक्ष्मी का हेतु होवे।

⚜️चाहे जितने भी तीर्थ और हुवे हैं और जितने भी होंगे,उनसबसे यह तीर्थ शुभ हो।

जैसे आपसे अधिक मंगल और कोई नहीं है,वैसे ही इस आनन्दवन से बढ़कर कोई भी क्षेत्र कहींपर न होवे।

⚜️सांख्ययोग, आत्मदर्शन, व्रत तप, दान, आदि के बिना ही इस स्थल में प्राणियों का कल्याण होवें।

⚜️शशक, मशक, कीट, पतंग, तुरग, उरग, इत्यादि भी पंचक्रोशी काशी में जो मरें, वे निर्वाण पद को प्राप्त करें।

⚜️केवल काशी के नाम लेने वाले लोगों का भी सदैव पापक्षय होवें।

⚜️काशीवासी सज्जनों के लिए सर्वदैव सतयुग होवे, सदा उत्तरायणरहे और नित्य ही महोदय पर्व बना रहे।

⚜️जितने वेदविहित क्षेत्र हैं, उन सबसे यह क्षेत्र अधिकतर पवित्र होवे।

⚜️चारों वेदों के अध्ययन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, काशी में लाखगायत्री जप मात्र से वह फल मिल जावे।

⚜️काशीवासी सज्जनों के लिए सर्वदैव सतयुग होवे, सदा उत्तरायणरहे और नित्य ही महोदय पर्व बना रहे।

⚜️जितने वेदविहित क्षेत्र हैं, उन सबसे यह क्षेत्र अधिकतर पवित्र होवे।

⚜️चारों वेदों के अध्ययन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, काशी में लाखगायत्री जप मात्र से वह फल मिल जावे।

⚜️अष्टांगयोग साधन से जो पुण्य होता है, वही पुण्य अधिकता के सहित काशी सेवन से प्राप्त होवें।

⚜️कृच्छ, चान्द्रायाणादिक व्रतों से जो श्रेय उपार्जन किया जाता है, आंनद वन में केवल एक ही उपवास करने से वह पुण्यलाभ होवे।

⚜️अन्य स्थान में एक सौ वर्ष तपस्या करके जो पुण्य होता है, काशी में एक वर्ष मात्र भूमिशय्या व्रत से वह फल मिल जाये।

⚜️अन्यत्र आजन्म मौनव्रत करने का जो फल है, वह काशी में एक पक्ष भर संभाषण करने से प्राप्त होवे।

⚜️अन्यत्र सर्वस्व दान कर देने से जो पुण्य कहा गया है, काशी में हजार ब्राह्मण को भोजन करा देने से वह 10 हजार से भी अधिक फलप्रद होवे।

⚜️समस्त मुक्ति क्षेत्रों के सेवन से जो फल प्राप्त होता है, काशी में पांच रात्रि मणिकर्णिका के सेवन से वही फल मिले।

⚜️प्रयाग स्नान से जो पुण्य प्राप्त होता है, श्रद्धा से काशी के दर्शन मात्र से वही पुण्य प्राप्त होवे।

⚜️अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञों के करने से जो पुण्य लाभ होता है, काशी में संयम पूर्वक त्रिरात्रवास करने से ही वही पुण्य प्राप्त हो जावे।

⚜️सम्यक प्रकार से तुला पुरुष दान करने से जो पुण्य मिलता है, श्रद्धापूर्वक काशी के दर्शन मात्र से वही पुण्य प्राप्त होवे।

⚜️इतना सुन कर प्रसन्नता पूर्वक गिरजावल्लभ शिव जी उनको सभी वर प्रदान कर देते हैं।

🙏🌺साभार : भृगु ज्योतिष (रिसर्चस)

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