समाज में सरकारी नौकरी को क्यों वरीयता दी जाती है जबकि प्राइवेट नौकरी में सरकारी अफसर से ज्यादा कमाता है?

शेयर करें:

राजेंद्र अग्निहोत्री जी अपने अनुभव बताया जो की भारतीय रेल में काम किया था (1975-2015) सरकारी नौकरी के पीछे भागने का सही कारण बताऊँगा, क्योकि मैंने सरकारी नौकरी की है और अब रिटायर भी हो चुका हूँ, तो नग्न सत्य भी मर्यादा में रह कर लिख सकता हूँ।

यहाँ यह बता देना उपयुक्त होगा कि मुझे जो नौकरी मिली थी वो मुझे पसंद नहीं थी और मेरे caliber के अनुसार नहीं थी। एक वर्ष के अन्दर रेलवे में ही मेरा सलेक्शन Chemical and Metallurgical Assistant पोस्ट के लिए हो गया था। लेकिन मेरे अधिकारियों ने मुझे रिलीव नहीं किया उस पोस्ट के लिए। इस वजह से मेरे अन्दर एक फ्रस्ट्रेशन था। मेरे अन्दर हमेशा ये चलता था कि मैं अपने अधिकारियों से सुपीरियर हूँ।

कोई मुझे आर्डर दे यह मुझे गवारा नहीं था। किसी अधिकारी ने Authoritative way में मुझे आर्डर दिया तो मेरे अन्दर का शैतान जाग जाता था। फिर वो काम मैं आसानी से नहीं करता था। हाँ प्यार से चाहे कोई मेरा गला काट ले तो वो मुझे मंजूर था। इससे आप क्या, मैं भी यही निष्कर्ष निकालता हूँ कि सिस्टम ने मुझे एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति बना दिया था जिसने अपनी साढ़े उन्तालीस (39.5 years) साल की रेलवे की नौकरी किसी तरह रो गा कर पूरी कर ली।

यहाँ नौकरी पूरी करने का मतलब ये है कि बिना किसी मेजर पेनाल्टी के अपनी सर्विस पूरी करना, अपने आप में इतनी खामियाँ होते हुए भी, और अपने सारे रिटाररमेंट बेनिफिट्स लेते हुये रिटायर होना। हाँ, माइनर पेनाल्टी के मेमोरेन्डम (चार्जशीट) इतने मिले हैं कि, मुझे भी उनकी गिनती याद नहीं। मेजर पेनाल्टी कोई मिली भले न हो लेकिन मेरे कम से कम 5 सस्पेन्शन हुये हैं (एक्सीडेण्टल केश एक भी नहीं था)।

अब आप बताईये क्या मेरा इस तरह का व्यवहार कोई प्राईवेट सैक्टर में बरदाश्त करता? मैं स्वयं जवाब देता हूँ, नहीं करता और मैं 6 महीने के अन्दर प्राइवेट नौकरी से निकाल दिया जाता। सरकारी DAR (Discipline and Appeal Rules 1968) नियम सख्त भी हैं और उन्हें डिले करके कर्मचारी बच भी निकलता है। यह इस पर निर्भर करता है कि एक्शन लेने वाला अधिकारी कैसा है और आपकी ओवरआल इमेज क्या है।

दोनों एक दूसरे की ताकत तोलते हैं, इसमें कोई शक नहीं कि अधिकारी ज्यादा ताकतवर है, लेकिन वह नियमों से भी बंधा है। आपने पेपर में पढ़े होंगे कई टाप मोस्ट लेवल के क्लास वन अधिकारी पर कितने ही बड़े चार्ज हों, लेकिन मामले लटके रहते हैं।

अब मैं बताता हूँ कि मैंने क्या क्या किया और फिर भी बच निकला (यही इस चीज का जवाब है कि लोग सरकारी नौकरी की तरफ क्यों भागते हैं।)।

मैंने अपनी एक साल की नौकरी के बाद ही 1978 में अपने मुख्य सिगनल निरीक्षक को बुदनी रेलवे स्टेशन पर अनपार्लियामेण्टल भाषा में जवाब दिया था। कोई गाली नहीं दी थी। वजह क्या थी? दिन भर ड्यूटी करने के बाद उसी रात में शाम 5 बजे से रात 12 बजे तक मुझे तीन बार सिगनल फेलियोर अटैण्ड करने के लिए बुलाया गया।

मैं गया फेलियोर ठीक किये। फिर रात में 01.00 बजे बुलावा आ गया कि फिर कोई सिगनल फेल हो गया है और मुझे ठीक करने जाना है। अब मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैंने कह दिया मेरी तबियत ठीक नहीं है मैं अब नहीं आ सकता।

बुदनी में (होशंगाबाद से एक स्टेशन पहले) मैं अकेला इलैक्ट्रीकल सिगनल मेन्टेनर था। जब मैंने मना किया तो भोपाल से मेरे मुख्य सिगनल निरीक्षक महोदय को स्टाफ लेकर आना पढ़ा और वो सिगनल ठीक कराना पढ़ा। सुबह 9 बजे उठकर मैं रेलवे हास्पिटल जा रहा था कि स्टेशन पर CSI (Chief Signal Inspector ) महोदय मिल गये।

उन्होंने पूछा रात में फेलियोर क्यों नहीं अटैण्ड किया? मैंने कहा 3–3 फेल्योर अटैण्ड किये तो थे, अब रात भर फेल्योर होते रहें तो मेरे भी काम करने के कुछ लिमिटेशन हैं। मैंने ही सारी रेलवे का ठेका तो नहीं ले रखा। इस पर वो बोले कि लिख कर दे देते कि तबियत ठीक नहीं है। मैंने कहा मुँह से बोला तो था। वो बोले दो लाइन लिख के दे देते। मैंने कहा मै इतना थक गया था कि मेरे हाथों में रात को इतनी ताकत नहीं थी।

वो मुझे सस्पेंशन मेमो देने लगे मैंने कहा अभी मेरी तबियत ठीक नहीं है मैं रेलवे डाक्टर के पास जा रहा हूँ। जब फिट हो जाऊँगा तो ले लूँगा। वह मेमो स्टेशन मास्टर की डायरी में रख कर चले गये और स्टेशन मास्टर को बोल गये कि जिस दिन ये ड्यूटी पर आये तब इसे ये दे देना। मैं हास्पिटल चला गया, दवा ली डाक्टर ने मुझे सिक लिस्ट में रख लिया।

3 दिन बाद मैं फिट होकर आया और स्टेशन की डायरी में रखा हुआ सस्पेंशन मेमो ले लिया। उस समय मैं 23 वर्ष का था और बैचलर था। सस्पेंशन में सुबह 8 बजे एक बार अपनी हाजिरी दी और दिन भर घर पे पड़े रहना। सस्पेंशन में आधी तनखा मिलती है। करीब 25–30 दिन सस्पेंशन में रहा। इतना लम्बा इसलिये चला कि मैं माफी माँगने या अपनी गलती मानने अपने बौस CSI/Bhopal के पास नहीं गया। जब कोई गलती की ही नहीं तो कैसी माफी।

इस बीच एक और मजेदार ट्रीटमेंट मैंने अपने CSI को दिया। हमारा डिपो आफिस भोपाल में होता था और मैं होशंगाबाद से एक स्टेशन पहले बुदनी में पोस्टिड था। मुझे तीन स्टेशन के सिगनल गियर्स का मेन्टेनेन्स करना होता था। हमारी सैलरी भोपाल में ही हर महीने की 21 तारीख को होती थी। सस्पेन्शन के दौरान ही 21 तारीख पड़ी और मैं भोपाल पेमेंट लेने गया।

मैं बढ़िया कपड़े पहनकर और टाई लगाकर भोपाल अपने डिपो में गया। मैं यहाँ बता दूँ कि रेलवे में अमूमन ड्यूटी पर DRM लेवल से नीचे कोई टाई नहीं लगाता। पेमेंट पे क्लर्क देता था और डिपो इंचार्ज CSI को उस पेमेंट को अपने इनीशियल करके witness करना होता था। ध्यान रहे कि मैं 1978 की बात कर रहा हूँ, उस समय बैंक पेमेंट जैसी कोई चीज नहीं होती थी। आप समझ सकते हैं मेरी टाई देखकर मेरे बौस पर क्या गुजरी होगी।

बस मेरा उद्देश्य सुलगाने का था, मैं उसमें पूर्ण रूप से सफल हुआ। इसके 3-4 दिनों के बाद मेरा सस्पेंशन रिवोक कर दिया गया यानि ड्यूटी पर ले लिया गया। इसके बाद एक चार्जशीट (SF 11) दी गयी। उसका मैंने जवाब दिया मेरा एक वर्ष का इंक्रीमेंट बन्द कर दिया गया। मैंने मन में सोचा चलो सस्ते में निपटे।

6 साल के दौरान ऐसे तीन सस्पेन्शन हुए। फिर 1983 मैं मेरा सैलैक्शन सिगनल इंस्पेक्टर के पद पर Railway Service Commission Bombay से हो गया – डिपार्टमेंटल नहीं, कयों कि वो तो कभी हो ही नहीं सकता था – क्योंकि सर्विस रिकॉर्ड जो खराब था। लेकिन ऊपरवाले ने Bypass method निकाला और मैं Signal Inspector की ट्रेनिंग के लिए सिकन्दराबाद चला गया। 2 साल की ट्रेनिंग करने के बाद 1985 में पोस्टिंग मुम्बई डिवीजन में हो गयी। कई जगह ट्रांसफर होते हुए फरीदाबाद 1988 में पहुँचा। 1998 तक सब ठीक चला।

उसके बाद फरीदाबाद और झाँसी में 2005 तक दो ग्रुप A सीनियर स्केल लेवल के आफिसरों से भिड़ंत हुयी। ज्यादा डिटेल में नहीं जाऊँगा। बस मैंने उन्हें अपनी भाषा में जवाब दिया, मेरी भाषा आप जानते ही हैं, दोनों बार मेरा सस्पेंशन हुआ और कुछ पनिशमेंट भी मिला। उसे मैंने प्रसाद समझकर सर माथे से लगाया। मैं अपील नहीं करता था। क्योंकि मुझे डर रहता था कि मेरे Hostile जवाब को पढ़कर उच्च अधिकारी तो मेरा पनिशमेंट और बढ़ा देंगे।

ये जो ऊपर लिखा है उससे प्रश्न का जवाब तो आपको अपने आप ही मिल जायेगा, क्यों कि प्रश्न पूछने वाले कोई मामूली व्यक्ति नहीं हैं वो P.hd. कर रहे हैं और IIT के इंजीनियरिंग छात्र भी रहे हैं। मैंने ये सब इसलिए लिखा कि आज के छात्र जो कल अधिकारी बनेंगे, उन्हें ऐसी वास्तविक घटनाओं से कुछ सीखने को मिलेगा।

सब लोग मेरे जितनी हिम्मत वाले नहीं होते। ऐसे लोग लाखों में एकाध मिलेगा। मैं ये नहीं कह रहा कि इसलिए सरकारी नौकरी करनी चाहिए।

सरकारी नौकरी लोग इसलिये करना चाहते हैं कि :—

  • एक बार मिल गयी तो आराम से कोई छुड़ाने वाला नहीं है।
  • मक्कारी करने की आजादी है।
  • यूनियन ज्वाइन करके शैल्टर ले लो।
  • आफिस के बाबू ने दिन भर में एक लैटर लिख दिया तो बहुत काम कर दिया।
  • काम करना नहीं अटकाना आना चाहिए।
  • यहाँ ज्यादा पढ़े लिखे और होशियार लोगों की जरूरत नहीं है, मेरे जैसे।
  • पीछे फाइल देख कर आगे चलो।
  • इंक्रीमेंट तो मिल ही जाना है।
  • हर 6 महीने में DA भी बढ़ जाना है, बिना माँगे।
  • बोनस है, ट्रासपोर्ट अलाउंस है सारी सुविधाएं हैं।
  • अधिकारी हैं तो घर के लिए बंगला पिओन और कुछ कर्मचारी अनआफिशियली भी बंगले पर मिलेंगे।
    सरकारी जीप मिलेगी।
  • काम नहीं करना है तो वेवकूफ बने रहो, कोई काम ही नहीं बताएगा। जिसे काम आता होगा उसे ही काम से लादा जायेगा। इसी लिये मराठी में कहावत है – ‘येड़ा बनके पेड़ा खाओ’ । येड़ा का अर्थ है पागल/वेवकूफ।

ये ही सब चीजें हैं सरकारी काम के पीछे भागने के। लेकिन सारे डिपार्टमेंट ऐसे नहीं है। मिलिट्री, रेलवे के 4 इंजीनियरिंग विभाग, आपरेटिंग विभाग, रनिंंग विभाग आदि की नौकरी बहुत मुश्किल है।

चाय वाले का धन्धा करना है, तो शाम को सोने से पहले सुबह के लिए मटेरियल है कि नहीं ये चिन्ता करनी पड़ेगी। सुबह जल्दी उठने की चिन्ता करनी पड़ेगी। ठेला लगाते हो तो पुलिस वाले का हफ्ता, नगरनिगम वालों का हफ्ता। किसी दिन कप, गिलास धोने वाल लड़का नहीं आया तो या तो खुद धोओ, नहीं तो उस दिन काम बन्द। धन्धा छोटा हो चाहे बड़ा, उसके बारे में 24 घंटे सोचोगे तो ही चलेगा।

नौकरी वाला 7–8 दिन या 15–20 दिन की छुट्टी ले के शादी, विवाह या घूमने जा सकता है। धन्धे वाले को एक दिन भी दुकान बन्द करनी पड़ जाये तो उन्हें रोना आता है। ऐसे अपनी ही बुराईयाँ बताने वाला आपको दिया ले कर ढूँढने से भी नहीं मिलेगा। लोग अपनी चार्जशीट, सस्पेन्शन की बातें छुपाते हैं, लेकिन मैं तो सीना ठोक के खुले आम बताता हूँ, क्योंकि वो ही मेरे मैडल हैं जो मैंने कमाये हैं।

आप अपने शहर में देखिए लोग किस तरह अपने छोटे से बिज़नेस की वजह से, सारे शहर में मशहूर हो जाते है और कितना धन भी अर्जित करते है भारत मे आज भी लोग पूरी तरह सुरक्षित जीवन सुरक्षित निवेश को अपनी प्रार्थमिकता देते है और यह सरकारी नॉकरी में पूरी तरह मिल जाता है कल आपके जीवन मे कुछ भी दुर्घटना घट जाये, लेकिन सरकारी नॉकरी आपके लिए वरदान साबित हो जाती है।

हमे आज की डिजिटल में दुनिया कुछ नया क्रिएटिव करना होगा, नॉकरी करनी नही, बल्कि नॉकरी पैदा करने के बारे में सोचना होगा जैसा कि विकसित देशों में होता है और अपनी मानसिकता को आज की दुनिया के मुताबिक बनाना होगा। कहते है काम ऐसा हो जिसमें कोई काम ही न हो। यही लालच तो हमे सरकारी नॉकरी की तरफ धकेलता है।