क्या होती है पेड न्यूज़ और क्या है उसके दुस्परिणाम?

शेयर करें:

आज भी किसी शहर मे एक आम आदमी के दिन के शुरुवात एक लोकल न्यूज़ पेपर और चाय के प्याले से होती है। यै न्यूज़ पेपर उनके विचार धारा को प्रभाबित करते है और उनकी मानसिकता बदलने के ताक़त रखते है। अब वह अच्छी हो या बुरी, यह मीडिया डिसाइड करता है।

न्यूज़ पेपर एक ऐसा माध्यम है, जो विकसित किए गए थे समाज/शहर/देश/दुनिया को बताने के लिए की क्या हो रहा है आपके आस पास, आपके शहर मे, आपके समाज मे। जो समय के साथ Commercialize हो गए। उनमे से कुछ ऐसी पैसे के दौड़ मेन शामिल हो गए जो अपने हितो को जनता के हितो से उपर ले गए।

यह इंपोर्टेंट है कि, न्यूज़ को लिखने वाले रिपोर्टर समझे कि उनके उपर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है की वह तथ्यो की जांच करे और सच को झूठ मे और झूठ को सच मे न बदले। और सबसे इंपोर्टेंट, किसी भी तथ्य को तोड़ मरोड़ कर न लिखे। एक सच जो किसी के व्यक्तिगत सोच/फायदे से उपर हो, उसे लिखे।

एक न्यूज़ जो किसे को व्यक्तिगत रूप से फायदा पहुचाने के लिए लिखी जाय, पेड न्यूज़ के तहत आती है, ऐसा आज होता है और इसके कुछ उदाहरण हमने इस साइट पर पैश किए है। हमारा प्रयास है की हम जनता को बता सके की कौनसी न्यूज़ पेड न्यूज़ हो सकती है। फैसला आप करे।

इसे श्रेणी मे एक प्रयास और करेंगे की पिछले चुनावो से पहिले जो वादे जन प्रतिनिधियों ने किए थे या जो हमे और आप सब लोगो को लगता है की यह जन प्रतिनिधि जिम्मेदार है इस शहर के अहित के लिए, उन सब प्रश्नो को हम इस माध्यम के द्वारा उन जन प्रतिनिधियों से सीधे पूंछे। ऐसा नहीं है की न्यूज़ पेपर्स यह नहीं करते, लेकिन हम एक माध्यम और बनाए, उन जनप्रतिनिधियों से पूछने के लिए। और हम प्रयास करेंगे कि जन प्रतिनिधि भी अपना जवाब दे, और उन्हे हम आप तक पहूचा सके।

पीआरबी एक्ट
प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट(पीआरबी एक्ट)। सन 1867 में अस्तित्व में आया ये एक्ट आज भी हमारे मीडिया कानून के साथ जुड़ा हुआ है। इसी कानून के तहत सरकार ने हर पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशक को लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया। साथ ही सरकार को किसी भी प्रकाशन के बंद करने, उस पर पाबंदी लगाने से लेकर समाचार के चयन तक का अधिकार दे दिया। इस प्रकार प्रकाशकों तथा समाचार पत्र के मालिकों ने काफी विरोध जताया स्वाधीनता के बाद 26 जनवरी 1950 को प्रतिपादित मीडिया रिवोल्यूशन एक्ट अब तक का सबसे अहम प्रेस कानून है।

यद्यपि हमारे संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार के तहत गिनाई जाती है मगर सन 1975 में पहली बार श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के नाम पर प्रेस की स्वतंत्रता पर वज्र प्रहार के बाद देश में मीडिया के अधिकारों को लेकर काफी बवाल मचा। संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल की मेहरबानियों से परेशान मीडिया समाज बड़ा ही कुपित हुआ और कई अख़बारों ने विरोध स्वरुप संपादकीय कॉलम कुछ लिखने के बजाय कोरा छोड़ दिया, सुचना के अधिकार ने वैचारिक क्रांति लायी है .

पीत पत्रकारिता का भी विस्तार हो चूका है ..कलम से ठीक करना अनेको की प्राथमिकता है .सतर्कता का सन्देश जनता के लिए है…लेकिन जिनका जिम्मेवारी है वे सिर्फ बात करते है ,कानून बनाते है ,और फिर तमाशा देखते है ! पैड न्यूज़ के समज मे कोई भी एक्ट बेमानी है ..जिसे हित साधना है वे रास्ता निकाल ही लेते है ,वैश्विक समाज मे दायित्व निर्वहन का स्तर आज भी वही है !