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सत्यनारायण व्रत कथा और क्या है इसका महत्व

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सनातन धर्मावलंबियों में सत्यनारायण व्रत कथा सबसे प्रतिष्ठित व्रत कथा के रूप में मानी जाती है। मान्यता के अनुसार यह भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की कथा है। वैसे तो भगवान विष्णु की पूजा कई रूपों में की जाती है, लेकिन उनमें से उनका सत्यनारायण स्वरूप इस कथा में बताया गया है।

हिंदी पंचाग के अनुसार, हर पूर्णमासी को सत्यनारायण की पूजा-उपासना की जाती है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु जी के नारायण रूप की पूजा की जाती है। वहीं गुरुवार के दिन के कारक देव होने के कारण इस पूजा को गुरुवार के दिन भी कई भक्त करते हैं।

प्रत्येक माह की पूर्णिमा तिथि को सत्यनारायण व्रत रखा जाता है, लेकिन कभी-कभी यह व्रत चतुर्दशी तिथि में भी रखा जाता है क्योंकि चन्द्रोदय कालिक एवं प्रदोषव्यापिनी पूर्णिमा ही व्रत के लिए ग्रहण करनी चाहिए. सत्यनारायण व्रत में कथा, स्नान-दान आदि का बहुत महत्व माना गया है. इस व्रत में सत्यनारायण भगवान अर्थात विष्णु जी की पूजा की जाती है. सारा दिन व्रत रखकर संध्या समय में पूजा तथा कथा की जाती है. पूजा के उपरान्त भोजन ग्रहण किया जाता है.

भगवान सत्यनारायण विष्णु के ही रूप हैं, इन्द्र का दर्प भंग करने के लिए विष्णु जी ने नर और नारायण के रूप में बद्रीनाथ में तपस्या की थी वही नारायण सत्य को धारण करते हैं अत: सत्य नारायण कहे जाते हैं. जानकारों की मानें तो स्कंद पुराण के रेवाखंड में इस कथा का उल्लेख मिलता है। इसके मूल पाठ में पाठांतर से करीब 170 श्लोक संस्कृत भाषा मे उपलब्ध है। जो पांच अध्यायों में बंटे हुए हैं। जो व्यक्ति सत्यनारायण भगवान की पूजा का संकल्प लेते हैं उन्हें दिन भर व्रत रखना चाहिए.

पंडित के अनुसार इस व्रत को करने से व्रती के जीवन से दुख-शोक का नाश होने के साथ ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है, पुत्र की प्राप्ति होती है और सर्वत्र विजय हासिल करने का वरदान मिलता है। इस व्रत को किसी विशेष तिथि की जरूरत नहीं पड़ती है।

इस कथा के दो प्रमुख विषय हैं। जिनमें एक है संकल्प को भूलना और दूसरा है प्रसाद का अपमान। व्रत कथा के अलग-अलग अध्यायों में छोटी कहानियों के माध्यम से बताया गया है कि सत्य का पालन न करने पर किस तरह की परेशानियां आती है। इसलिए जीवन में सत्य व्रत का पालन पूरी निष्ठा और सुदृढ़ता के साथ करना चाहिए।

ऐसा न करने पर भगवान न केवल नाराज होते हैं अपितु दंड स्वरूप संपति और बंधु बांधवों के सुख से वंचित भी कर देते हैं। इस अर्थ में यह कथा लोक में सच्चाई की प्रतिष्ठा का लोकप्रिय और सर्वमान्य धार्मिक साहित्य हैं। अक्सर पूर्णमासी को इस कथा का परिवार में वाचन किया जाता है। अन्य पर्वों पर भी इस कथा को विधि विधान से करने का निर्देश दिया गया है।

भगवान सत्यनारायण कथा के नियम…
: पूजा के संबंध में संकल्प लेने के बाद संकल्प अवश्य पूरा करना चाहिए।
: पूजा के पश्चात प्रसाद तुरंत ग्रहण करना चाहिए।

सामान्य नियम…
: ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
: इस दिन किसी भी तरह से पानी की बर्बादी न करें।
: स्त्रियों को अपने बाल नहीं धोने चाहिए।
: पुरुषों को अपनी दाढ़ी नहीं बनानी चाहिए।
: कपड़े नहीं धोने चाहिए न ही कहीं और धुलने चाहिए।
: घर को धोना यानि पोछा नहीं लगाना चाहिए।
: नाखुन नहीं काटने चाहिए।

सत्य को नारायण के रूप में पूजना ही सत्यनारायण की पूजा है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि संसार में एकमात्र नारायण ही सत्य हैं, बाकी सब माया है। सत्य में ही सारा जगत समाया हुआ है। सत्य के सहारे ही शेष भगवान पृथ्वी को धारण करते हैं।

सत्यनारायण पूजा की सामग्री

इसके तहत सर्वप्रथम देव मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, जल का कलश, दूध, देव मूर्ति को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र व आभूषण। धूपबत्ती, कपूर, केसर, चंदन, यज्ञोपवीत, रोली, चावल, हल्दी, कलावा, रुई, सुपारी, 5 नग पान के पत्ते, खुले फूल 500 ग्राम, फूलमाला, कुशा व दूर्वा, पंचमेवा, गंगाजल, शहद, अष्टगंध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, दूध, ऋतुफल, मिष्ठान्न, चौकी, आसन, केले के पत्ते, पंचामृत, तुलसी दल, कलश (तांबे या मिट्टी का), सफेद कपड़ा (आधा मीटर), लाल या पीला कपड़ा (आधा मीटर), दीपक 3 नग ( 1 बड़ा+2 छोटे ), ताम्बूल (लौंग लगा पान का बीड़ा), दूर्वा, प्रसाद के लिए गेंहू के आटे की पंजीरी, फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान में से जो भी हो सवाया लें। दक्षिणा।आदि सामग्री ।

पूजन का मंडप…
पूजन को शुरु करने से पहले मंडप तैयार कर लें। सबसे पहले पूजा के स्थान को साफ कर लें। अब पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर बैठे। पाटा रखें। पाटे पर कोई शुभ चिह्न जैसे अष्टदल या स्वस्तिक बनाएं। बीच में चावल रखें। लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। पान सुपारी से भगवान गणेश की स्थापना करें। अब पूजन स्थल पर भगवान सत्यनारायण की तस्वीर रखें। श्री कृष्ण या नारायण की प्रतिमा की भी स्थापना करें।

सत्यनारायण के दाहिनी ओर शंख की स्थापना करें। जल से भरा एक कलश भी दाहिनी ओर रखें। कलश पर शक्कर या चावल से भरी कटोरी रखें। कटोरी पर नारियल भी रखा जा सकता है। अब बायी ओर दीपक रखें। केले के पत्तों से पाटे के दोनो ओर सजावट करें।

अब पाटे के आगे नवग्रह मंडल बनाएं। एक सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर नौ जगह चावल की ढेरी रखें। पूजन के समय इनमें नवग्रहों का पूजन किया जाना है। मंडप तैयार करने के बाद पूजन शुरु करें।

प्रसाद के लिए पंचामृत, गेहूं के आटे को सेंककर तैयार की गई पंजीरी या शक्कर का बूरा, फल, नारियल इन सबको सवाया मात्रा में इकठ्ठा कर लें। या जितना शक्ति हो उस अनुसार इकठ्ठा कर लें। भगवान की तस्वीर के आगे ये सभी पदार्थ रख दें।

अब पूजन के लिए बड़ी सी चौकी या पटा पर भगवान सत्यनारायण की फोटों या मूर्ति पीला या लाल कपड़ा बिछाकर स्थापित कर दें । आसन के दाहिने ओर दीपक एवं बाई ओर बड़ा दीपक घी का स्थापित कर दें । अब स्वयं भी भगवान के आसन के ठीक सामने कुशा का आसन बिछाकर बैठ जायें विधान के अनुरूप पूजन करें ।

भगवान सत्यनारायण की पूजन विधि…
इस पूजा में सबसे पहले गणेश जी की, इसके बाद इंद्र देव और नवग्रह सहित कुल देवी देवता की पूजा की जाती है। फिर ठाकुर जी और नारायण जी की। इसके बाद माता लक्ष्मी, पार्वती सहित सरस्वती की पूजा की जाती है। अंत में भगवान शिव और ब्रह्मा जी की पूजा की जाती है।

सकंल्प…संकल्प करने से पहले हाथों में जल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोले। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें।

संकल्प का उदाहरण – जैसे 5/3/2015 को श्री सत्यनारायण का पूजन किया जाना है। तो इस प्रकार संकल्प लें। मैं…………..विक्रम संवत् 2071 को, फाल्गुन मास के पूर्णिमा तिथि को गुरुवार के दिन, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में, भारत देश के मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में, महाकाल तीर्थ में, इस मनोकामना से ……………..श्री सत्यनारायण का पूजन कर रही / रहा हूं।

पवित्रकरण… बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की अनामिका से निम्न मंत्र बोलते हुए अपने ऊपर एवं पूजन सामग्री पर जल छिड़कें-

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः।।

पुनः पुण्डरीकाक्षं, पुनः पुण्डरीकाक्षं, पुनः पुण्डरीकाक्षं ।

आसन…मंत्र से अपने आसन पर इस तरह से जल छिड़कें-

पृथ्वी त्वया घता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।

त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु च आसनम्।

ग्रंथि बंधन…यदि यजमान सपत्नीक बैठ रहे हों तो इस मंत्र के पाठ से ग्रंथि बंधन या गठजोड़ा करें-

यदाबध्नन दाक्षायणा हिरण्य(गुं)शतानीकाय सुमनस्यमानाः ।

तन्म आ बन्धामि शत शारदायायुष्यंजरदष्टियर्थासम्।

आचमन करें… इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें व तीन बार कहें-

ऊँ केशवाय नमः

ऊँ नारायणाय नमः

ऊँ माधवाय नमः

यह मंत्र बोलकर हाथ धोएं।

ऊँ गोविन्दाय नमः हस्तं प्रक्षालयामि ।

पृथ्वी पूजन
नीचे दिये मंत्र का उच्चारण करते हल्दी, रोली, अक्षत, पुष्प से पूजन करें ।
ॐ पृथ्वी त्वया घता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु च आसनम्‌ ॥

श्री सत्यनारायण पूजन प्रारंभ
ध्यान- हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर श्री सत्यनारायण भगवान का ध्यान करें ।

ध्यान मंत्र
ॐ सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितंच सत्ये ।
सत्यस्य सत्यामृत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥
ध्यायेत्सत्यं गुणातीतं गुणत्रय समन्वितम्‌ ।
लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभरणं हरिम्‌ ॥

ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि । बोलते हुए अक्षत पुष्प अर्पित कर दें ।

आह्वान- अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए आवाहन करें ।
आह्वान-मंत्र
आगच्छ भगवन्‌ ! देव! स्थाने चात्र स्थिरो भव ।
यावत्‌ पूजां करिष्येऽहं तावत्‌ त्वं संनिधौ भव ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, श्री सत्यनारायणाय आवाहयामि, आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि ।

स्वस्तिवाचन मंत्र… सबसे पहले स्वस्तिवाचन किया जाना चाहिए।

स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।

स्वस्ति नस्ताक्र्षयो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।

द्यौः शांतिः अंतरिक्षगुं शांतिः पृथिवी शांतिरापः

शांतिरोषधयः शांतिः। वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः

शांतिर्ब्रह्म शांतिः सर्वगुं शांतिः शांतिरेव शांति सा

मा शांतिरेधि। यतो यतः समिहसे ततो नो अभयं कुरु ।

शंन्नः कुरु प्राजाभ्यो अभयं नः पशुभ्यः। सुशांतिर्भवतु।

अब सभी देवी-देवताओं को प्रणाम करें-

श्रीमन्महागणाधिपतये नमः ।

लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः ।

उमा महेश्वराभ्यां नमः ।

वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः ।

शचीपुरन्दराभ्यां नमः ।

मातृ-पितृचरणकमलेभ्यो नमः ।

इष्टदेवताभ्यो नमः ।

कुलदेवताभ्यो नमः ।

ग्रामदेवताभ्यो नमः ।

वास्तुदेवताभ्यो नमः ।

स्थानदेवताभ्यो नमः ।

सर्वेभ्योदेवेभ्यो नमः ।

सर्वेभ्यो ब्राह्मणोभ्यो नमः।

सिद्धि बुद्धि सहिताय श्री मन्यहा गणाधिपतये नमः।

भगवान गणेश को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। जनेऊ अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत अर्पित करें। भगवान नारायण को स्नान कराएं। जनेऊ अर्पित करें। गधं, पुष्प,अक्षत अर्पित करें। अब दीपक प्रज्वलित करें। धूप, दीप करें। भगवान गणेश और सत्यनारायण धूप-दीप अर्पित करें। ‘‘ऊँ सत्यनारायण नमः’’ कहते हुए सत्यनारायण का पूजन करें।

अब चावल की ढेरी में नवग्रहों का पूजन करें। अष्टगंध, पुष्प को नवग्रहों को अर्पित करें।

नवग्रहों का पूजन का मंत्र-

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तु।

इस मंत्र से नवग्रहों का पूजन करें। अब कलश में वरुण देव का पूजन करें। दीपक में अग्नि देव का पूजन करें।

कलश पूजन-

कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिताः मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृताः। कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्विपा वसुंधरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामगानां अथर्वणाः अङेश्च सहितासर्वे कलशन्तु समाश्रिताः।

ऊँ अपां पतये वरुणाय नमः। इस मंत्र के साथ कलश में वरुण देवता का पूजन करें।

दीपक- दीपक प्रज्वलित करें एवं हाथ धोकर दीपक का पुष्प एवं कुंकु से पूजन करें-

भो दीप देवरुपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविन्घकृत ।

यावत्कर्मसमाप्तिः स्यात तावत्वं सुस्थिर भवः।

आसन- भगवान को बैठने के लिए पीले चावल का आसन दें ।….आसन मंत्र
अनेक रत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम्‌ ।
भवितं हेममयं दिव्यम्‌ आसनं प्रति गृह्याताम ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, आसनं समर्पयामि ।

पाद्यं- भगवान के पैर धुलायें….पाद्यं मंत्र
नारायण नमस्तेऽतुनरकार्णवतारक ।
पाद्यं गृहाण देवेश मम सौख्यं विवर्धय ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि ।

अर्घ्य- भगवान को अर्घ्य दें ।….अर्घ्य मंत्र
गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्घ्यं सम्पादितं मया ।
गृहाण भगवन्‌ नारायण प्रसन्नो वरदो भव ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि ।

आचमन- भगवान को आचमन करायें ।…आचमन मंत्र
कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु शीतलम्‌ ।
तोयमाचमनीयार्थं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि ।

स्नान – भगवान का शुद्ध जल से स्नान करें ।…स्नान मंत्र
मन्दाकिन्याः समानीतैः कर्पूरागुरू वासितैः ।
स्नानं कुर्वन्तु देवेशा सलिलैश्च सुगन्धिभिः ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, स्नानीयं जलं समर्पयामि ।

पंचामृत स्नान – भगवान का पंचामृत- दूध, दही, घी शक्कर एवं शहद मिलाकर पंचामृत से स्नान करें ।…पंचामृत स्नान मंत्र
पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम्‌ ।
पंचामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, पंचामृतस्नानं समर्पयामि,

शुद्धोदक स्नान – शुद्ध जल से स्नान करें ।…शुद्धोदक स्नान मंत्र
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्‌ ।
तदिदं कल्पितं तुभ्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।

वस्त्र – भगवान को वस्त्र या वस्त्र के रूप में कलावा अर्पित करें । – मंत्र
शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम्‌ ।
देहालंकरणं वस्त्रं धृत्वा शांतिं प्रयच्छ मे ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, वस्त्रं समर्पयामि ।
(वस्त्र अर्पित करें, आचमनीय जल दें।)

यज्ञोपवीत – भगवान को जनेऊ अर्पित करें ।
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्‌ ।
उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।

चन्दन – भगवान को चंदन अर्पित करें ।
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्‌ ।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, गन्धं समर्पयामि ।

अक्षत – भगवान को चावल अर्पित करें ।
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ताः सुशोभिताः ।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, अक्षतान्‌ समर्पयामि ।

पुष्पमाला – भगवान को पुष्प तथा फूलमाला चढ़ायें ।
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो ।
मयाऽऽह्तानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, पुष्पं पुष्पमालां च समर्पयामि ।

दूर्वा – भगवान को दूर्वा अर्पित करें ।
दूर्वांकुरान्‌ सुहरितानमृतान्‌ मंगलप्रदान्‌ ।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, दूर्वांकुरान्‌ समर्पयामि ।

धूप, दीप – भगवान को धूप दीप दिखायें ।
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यः गन्ध उत्तमः ।
आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया ।
दीपं गृहाण देवेश ! त्रैलोक्यतिमिरापहम्‌ ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, धूपं, दीपं दर्शयामि ।

नैवेद्य — भगवान को मिठाई अर्पित करें । (पंचमिष्ठान्न व सूखी मेवा अर्पित करें)
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च ।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, नैवेद्यं निवेदयामि ।

ऋतुफल – भगवान को केले, आम, सेवफल आदि चढ़ायें ।
फलेन फलितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्‌ ।
तस्मात्‌ फलप्रदादेन पूर्णाः सन्तु मनोरथाः ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, ऋतुफलं निवेदयामि। मध्ये आचमनीयं जलं उत्तरापोऽशनं च समर्पयामि ।

ताम्बूल – भगवान को पान सुपारी अर्पित करें ।
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्‌ ।
एलालवंगसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि ।

दक्षिणा – भगवान को अपना कमाई का एक अंश के रूप में कुछ द्रव्य अर्पित करें ।
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः ।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः, दक्षिणां समर्पयामि ।

कथा-वाचन और आरती-

पूजन का क्रम पूरा होने पर क्रमशः भगवान श्री सत्यनारायण की कथा का पाठ स्वयं करें या किसी योग्य ब्राह्मण से सुने । श्रीसत्यनारायण व्रत का वर्णन देवर्षि नारद जी के पूछने पर स्वयं भगवान विष्णु ने अपने मुख से किया है…

श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा:

एक बार योगी नारद जी ने भ्रमण करते हुए मृत्युलोक के प्राणियों को अपने-अपने कर्मों के अनुसार तरह-तरह के दुखों से परेशान होते देखा। इससे उनका संतहृदय द्रवित हो उठा और वे वीणा बजाते हुए अपने परम आराध्य भगवान श्रीहरि की शरण में हरि कीर्तन करते क्षीरसागर पहुंच गये और स्तुतिपूर्वक बोले, ‘हे नाथ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मृत्युलोक के प्राणियों की व्यथा हरने वाला कोई छोटा-सा उपाय बताने की कृपा करें। ’

तब भगवान ने कहा, ‘हे वत्स! तुमने विश्वकल्याण की भावना से बहुत सुंदर प्रश्न किया है। अत: तुम्हें साधुवाद है. आज मैं तुम्हें ऐसा व्रत बताता हूं जो स्वर्ग में भी दुर्लभ है और महान पुण्यदायक है तथा मोह के बंधन को काट देने वाला है और वह है श्रीसत्यनारायण व्रत। इसे विधि-विधान से करने पर मनुष्य सांसारिक सुखों को भोगकर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर लेता है।’

इसके बाद काशीपुर नगर के एक निर्धन ब्राह्मण को भिक्षावृत्ति करते देख भगवान विष्णु स्वयं ही एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में उस निर्धन ब्राह्मïण के पास जाकर कहते हैं, ‘हे विप्र! श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं.। तुम उनके व्रत-पूजन करो जिसे करने से मुनष्य सब प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाता है।

इस व्रत में उपवास का भी अपना महत्व है किंतु उपवास से मात्र भोजन न लेना ही नहीं समझना चाहिए। उपवास के समय हृदय में यह धारणा होनी चाहिए कि आज श्री सत्यनारायण भगवान हमारे पास ही विराजमान हैं। अत: अंदर व बाहर शुचिता बनाये रखनी चाहिए और श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान का पूजन कर उनकी मंगलमयी कथा का श्रवण करना चाहिए.’ सायंकाल में यह व्रत-पूजन अधिक प्रशस्त माना जाता है।

श्री सत्यनारायण की कथा बताती है कि व्रत-पूजन करने में मानवमात्र का समान अधिकार है। चाहे वह निर्धन, धनवान, राजा हो या व्यवसायी, ब्राह्मण हो या अन्य वर्ग, स्त्री हो या पुरुष. यही स्पष्ट करने के लिए इस कथा में निर्धन ब्राह्मण, गरीब लकड़हारा, राजा उल्कामुख, धनवान व्यवसायी, साधु वैश्य, उसकी पत्नी लीलावती, पुत्री कलावती, राजा तुङ्गध्वज एवं गोपगणों की कथा का समावेश किया गया है।

कथासार ग्रहण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस किसी ने सत्य के प्रति श्रद्धा-विश्वास किया, उन सबके कार्य सिद्ध हो गये. जैसे लकड़हारा, गरीब ब्राह्मण, उल्कामुख, गोपगणों ने सुना कि यह व्रत सुख, सौभाग्य, संतति, संपत्ति सब कुछ देने वाला है तो सुनते ही श्रद्धा, भक्ति तथा प्रेम के साथ सत्यव्रत का आचरण करने में लग गये और फलस्वरूप इहलौकिक सुख भोगकर परलोक में मोक्ष के अधिकारी हुए।

साधु वैश्य ने भी यही प्रसंग राजा उल्कामुख से विधि-विधान के साथ सुना, किंतु उसका विश्वास अधूरा था. श्रद्धा में कमी थी. वह कहता था कि संतान प्राप्ति पर सत्यव्रत-पूजन करूंगा। समय बीतने पर उसके घर एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया. उसकी श्रद्धालु पत्नी ने व्रत की याद दिलायी तो उसने कहा कि कन्या के विवाह के समय करेंगे।

समय आने पर कन्या का विवाह भी हो गया किंतु उस वैश्य ने व्रत नहीं किया। वह अपने दामाद को लेकर व्यापार के लिए चला गया। उसे चोरी के आरोप में राजा चन्द्रकेतु द्वारा दामाद सहित कारागार में डाल दिया गया। पीछे घर में भी चोरी हो गयी। पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती भिक्षावृत्ति के लिए विवश हो गयीं।

एक दिन कलावती ने किसी विप्र के घर श्री सत्यनारायण का पूजन होते देखा और घर आकर मां को बताया. तब मां ने अगले दिन श्रद्धा से व्रत-पूजन कर भगवान से पति और दामाद के शीघ्र वापस आने का वरदान मांगा। श्रीहरि प्रसन्न हो गये और स्वप्न में राजा को दोनों बंदियों को छोडऩे का आदेश दिया। राजा ने उनका धन-धान्य तथा प्रचुर द्रव्य देकर उन्हें विदा किया. घर आकर पूर्णिमा और संक्रांति को सत्यव्रत का जीवन पर्यन्त आयोजन करता रहा, फलत: सांसारिक सुख भोगकर उसे मोक्ष प्राप्त हुआ।

इसी प्रकार राजा तुङ्गध्वज ने वन में गोपगणों को श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा, किंतु प्रभुता के मद में चूर राजा न तो पूजास्थल पर गया, न दूर से ही प्रणाम किया और न ही गोपगणों द्वारा दिया प्रसाद ग्रहण किया. परिणाम यह हुआ कि राजा के पुत्र, धन-धान्य, अश्व-गजादि सब नष्ट हो गये।

राजा को अकस्मात् यह आभास हुआ कि विपत्ति का कारण सत्यदेव भगवान का निरादर है। उसे बहुत पश्चाताप हुआ। वह तुरंत वन में गया। गोपगणों को बुलाकर काफी समय लगाकर सत्यनारायण भगवान की पूजा की। फिर उसने उनसे ही प्रसाद ग्रहण किया तथा घर आ गया. उसने देखा कि विपत्ति टल गयी और उसकी सारी संपत्ति तथा जन सुरक्षित हो गये. राजा प्रसन्नता से भर गया और सत्यव्रत के आचरण में निरत हो गया तथा अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर दिया।

कथा समापन के बाद
कथा पूरी होने पर सभी देवों की आरती करें और हवन कर पूजा सम्पन्न किया जाता है। आरती के बाद मंत्रपुष्पांजलि अर्पित करें । अंत में शांतिपाठ कर क्षमा याचना का भाव करते हुए श्री सत्यनारायण भगवान की बिदाई करें । चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करें, पुरोहित जी को दक्षिणा एवं वस्त्र दे व भोजन कराकर पुराहित जी के भोजन के पश्चात उनसे आशीर्वाद लेकर आपको स्वयं भोजन करना चाहिए, भगवान का प्रसाद सभी भक्तों को बांटे।