यदि आप कोई जमीन खरीदते हैं तो जमीन की कितनी गहराई व ऊंचाई तक होता है आपका अधिकार?

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जमीन के ऊपर वहां तक है जहां तक आपके क्षेत्र का विकास अधिकरण आपको इजाजत देता है, उदाहरण स्वरूप आवास विकास, विकास प्राधिकरण, नगर या ग्राम पंचायत आदि। आसान शब्दों में जहां तक राज्य सरकार इजाजत दे। जमीन के नीचे वहां तक तक जहां तक कोई प्राकृतिक खनिज, पुरातन खजाना आदि न निकले। यदि इस प्रकार का कोई भी तत्व नहीं मिलता है तो भी जहां से भूजल मिलेगा आपका अधिकार वहीं खत्म हो जाएगा। कमाल की बात यह है कि सरकार भूजल तक पहुचने की भी फीस लेती है। यदि सीधी बात करें तो आपकी जमीन पर आप वही काम कर सकते हैं जो सरकार चाहे। यह बात ज्यादातर लोगों को अटपटी लग सकती है लेकिन यही सत्य है।

जब हम जमीन खरीदते हैं तो केवल 6 इंच तक कि गहराई तक ही आपका अधिकार है। केवल पानी के लिए कुंवा बनाना या घर मकान के लिए नीव बनाना आदि और कोई पेड़ बड़े हों तो उनकी जड़े जमीन के काफी गहराई तक जाती है वह मुख्य पेड़ को सहारा देती है बस ऐसे ही काम के लिए 6 इंच से गहरे में आपका अधिकार है। अगर कोई खनिज उस जगह में मिलेगा तो उसपर सरकार का अधिकार और नियंत्रण होगा। 6 इंच ही सही है।

कितने तो खनिज जमीनपर ऐसे ही पड़े मिलते हैं। बालाघाट ज़िला मध्यप्रदेश में कितने सारे खेतो में तो जमीन पर पड़े सामान्य पत्थर उच्च दर्जे का mangnese अयस्क होता है। जबकि पुलिस उसे बेचते हुए किसानों को हिरासत में लेते हुए कितनो बार सुना है। कानूनन इन पथरो को वो काफी ऊंची कीमत भी मिले तब भी बेच नही सकते हैं।

असल मे आपके खेत मे पकने वाले अनाज तथा लकड़ी आदि के अलावा और कुछ भी बेचने का आपका अधिकार नही है। जैसे खेत की मिट्टी, पत्थर बालू आदि सब कुछ माइनर मिनरल्स है उन्हें भी बेचने के लिए रॉयल्टी देनी पड़ती है। जमीन में दबी हुई या गाड़ कर रखी हुई या कोई भी कारणसे वहाँ जो मिलती है ऐसी हर धरोहर की मालकी हक्क सरकार का ही होता है।

यह कानून बहुत पुराना है। फिर भी अगर वह वस्तु ज्यादा महत्वपूर्ण न हो तो सरकार उसकी कीमत का चौथाई भाग खोजने वालो को दे सकती है। मगर ऐसी वस्तु प्राप्त होने के पश्चात कानूनन आपकी जवाबदेही है इस बातकी सूचना तुरन्त नजदीकी उपजिलाधिकारी या सक्षम अधिकारी को देनी होगी।

इस विषय मे एकाएक इतनी दिलचस्पी बढ़ गई है।

यदि खरीदी गयी जमीन पर कोई पेड़(फलदार या छायादार) है तो उसे खरीदार काट नही सकता है | काटना आवश्यक ही हो तो वन विभाग से लिखित अनुमति लेनी पडेगी | कानून की और एक बारीकी यह है कि आम का पेड़ यह अचल संपत्ति है। क्योंकि उसकी कीमत खड़ा रहने पर ही है। मगर सागवान का पेड़ एक चल संपत्ति है उसकी कीमत तो काटकर फर्नीचर बनाने से ही मिलेगी खड़ा होने पर कोई कामके नही है ये पेड़। इसके अलावा भी एक कानून है खजाने का अगर आपको कहीं से ₹10 या उससे अधिक मिले तो कानूनी तौर पर संबंधित जिला अधिकारी को सूचना देनी होगी अन्यथा आपके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती हैं

बहुत पुराना कानून है करीब 140 साल पुराना
असल मे 26 जनवरी 1950 से भारत मे वह सब कानून या उनकी धारा निरस्त हो गई जो भारत के संविधान के किसी भी तत्व या धारणा के विरोध में जाती है। जबकि इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। यह नीति और सोच तो वाजिब ही है जमीन में छुपी हुई धरोहर जो आपने अर्जित नही की है हो सकता है सेंकडो वर्ष पूर्व की हो उसकी मलकियत तो स्वाभाविक ही सरकार की ही होनी चाहिए। आपका अधिकार जमीन का उपयोग करने तक ही सीमित है। और किसी जरूरी काम के लिए जैसे रोड बनाना या जलाशय या कोई भी समाज के उपयुक्त कार्य करने है तो सरकार आपकी जमीन उचित मूल्य देकर अधिग्रहित भी कर सकती है।

एक संशय और है
यदि आप की जमीन पर आपके दादा जी ने या आपके पूर्वजों ने ही कुछ अमूल्य वस्तु गड़ा दी हो तो उस पर भी सरकार का हक है आपका ?

तब तो वो केवल आपकी ही होंगी। सवाल बस यही रहता है कि अगर यह बात सरकारी अधिकारियों को पता चली तो वह सरकारी है कहने के इरादे से आपके घर जरूर पहुंचेंगे। ऐसी चुनींदा घटनाए जानने को मिली है। किसी को 400 वर्ष पुराना खजाना चांदी के सिक्के करीब 1100 (12 किलो चांदी थी) मील गए चुपचाप से उसे गलाकर बेचने का इरादा रखकर सब काम कर रहा था। और गांव में बात फैल गई और उपजिलाधिकारी को इन्ही लोगों ने शिकायत कर दी। आखरी यह हुआ कि उस धरोहर को खोजने का 25% इनाम केवल मिला। अगर वो सबूत कर पाता कि यह हमारे परदादा की रखी चीज है तो बात अलग होती जबकि जमीन अगले ने कुल 15 -20 साल पूर्व में ही खरीदी थी। दूसरी बात जिस पीतल के घड़े में वह सब रखा गया था उसका परीक्षण करने से और सिक्को की पहचान से सब पता चल ही गया। किस जमाने की धरोहर थी वह। अब म्यूजियम सरकारी में रखे गए हैं वह सब सिक्के।