विश्व महिला समानता दिवस (26 अगस्त): स्त्रियों में कठिनाइयों और तनावों को सहन करने की अधिक होती है ताकत

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि स्त्रियों में कठिनाइयों और तनावों को सहन करने की ताकत अधिक होती है तथा शारीरिक रूप से पुरुषों की तरह वे कोमल भी नहीं होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि पुरुष अधिक ताकतवर होते हैं, किन्तु स्त्रियाँ अधिक मजबूत होती हैं।

योग गुरु अग्रवाल ने विश्व महिला समानता दिवस के अवसर पर कहा कि प्राचीन काल से ही स्त्रियां पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रगति के पथ पर अग्रसर होती हुई, अपने सशक्तिकरण का मजबूत स्तम्भ प्रस्तुत कर, जगत के सामने उपस्थित होती रहीं। विश्व में आई असमानता को दूर करने के उपलक्ष्य में ही विश्व महिला समानाता दिवस प्रतिवर्षं 26 अगस्त को मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का खास उद्देश्य यह है कि महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलता है। इसके साथ ही भेदभाव, दुष्कर्म, एसिड अटैक्स, भूर्ण हत्या जैसे कई मुद्दों पर जागरूकता फैलाना है। वैसे आज के समय में महिलाएं हर क्षेत्र में अपना नाम रौशन कर रही हैं।

स्त्री और पुरुष – प्रजनन अंगों के अतिरिक्त पुरुष एवं स्त्री के शरीरों की संरचना समान होती है। उनमें जो न्यूनाधिक अन्तर होते भी हैं, वे नगण्य होते हैं। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय अन्तर है स्त्रियों के अपेक्षाकृत कम क्षमता वाले फेफड़ों का। दोनों में परिसंचरण तन्त्र एक जैसा होता है, किन्तु स्त्री में यह अधिक मजबूत प्रतीत होता है, तभी तो उसे दिल का दौरा पड़ने और उससे सम्बन्धित रोगों की आशंका कम होती है। यद्यपि स्त्रियों और पुरुषों में स्नायु तन्त्र समान होता है, फिर भी कहा जाता है कि पुरुषों का मस्तिष्क बड़ा होता है। यदि शरीर के अनुपात में देखा जाय तो यह पता चलता है कि वस्तुतः स्त्री का मस्तिष्क ही बड़ा होता है।

कुल मिला कर स्त्री की हड्डियाँ पुरुष की अपेक्षा अधिक हल्की और कोमल होती हैं। हालाँकि दोनों के अस्थिपिंजरों में इतनी समानता होती है कि वैज्ञानिक निःशंक होकर इसका निर्धारण नहीं कर सकते हैं कि पिंजर विशेष किसी स्त्री का है या पुरुष का सामान्यतः पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का कंधा कम चौड़ा और झुका हुआ होता है।

अधिकतर पुरुषों के नितम्ब उनके कन्धों से पतले होते हैं, जबकि अधिकतर स्त्रियों में नितम्ब उनके वक्ष और कन्धों से चौड़े होते हैं या बराबर होते हैं। यह सत्य है कि स्त्रियों के पैर उनकी कुल लम्बाई के अनुपात में पुरुषों की अपेक्षा छोटे होते हैं। यद्यपि बाल्यकाल में लिए गये भोजन और उस समय किए गये व्यायामों पर भी यह सब बहुत निर्भर रहता है।

सामान्यतः स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा कम मांसल होती हैं, विशेषकर वक्ष क्षेत्र में स्त्रियों की मांसपेशियों में वसा ऊतक अधिक होते हैं। उनके आकार और कठोरता का विकास पुरुष शरीर के समान नहीं होता है। फिर भी यदि स्त्रियाँ पुरुषों जैसे कार्य लगातार करें तो उनकी मांसपेशियों का वैसा ही विकास सम्भव है।

सार्वभौमिक रूप से यह मान लिया गया है कि पुरुष सबल होते हैं और स्त्रियाँ अबला संरचनात्मक रूप से पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के अधिक सबल होने के प्रमाणों के बावजूद इस बात को दुहराया जाता है। स्त्रियाँ अधिक दिनों तक जीवित रहती हैं। प्रत्येक आयु वर्ग में स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों की मृत्यु दर अधिक होती है। कम स्त्रियाँ ही व्रण (अल्सर) से पीड़ित होती हैं और उन्हें कम ही दिल का दौरा पड़ता है। अब ऐसा माना जाने लगा है कि पुरुषों में हृदय रोग की प्रवणता का सम्बन्ध उनके वृषणों में उत्पन्न होने वाले हार्मोनों से है।

विकास की प्रक्रिया में शक्ति पहले आती है और शिव उनके बाद। यदि आप इस प्रवृत्ति के साथ आध्यात्मिक पथ पर चलें तो आप पायेंगे कि आपकी पत्नी, पुत्री या शिष्या सक्रिय कारक हैं और आप मात्र उनके सहयोगी हैं। यदि एक पुरुष उच्चतर चेतना की अवस्था तक पहुँच भी जाता है, फिर भी उसके लिये बिना किसी स्त्री की सहायता के अपनी अनुभूतियों को अन्य लोगों तक सम्प्रेषित कर पाना कठिन कार्य है।

नवीन समाज – आध्यात्मिक क्षेत्र में स्त्री की भूमिका तो पारिभाषित की गई, किन्तु आधुनिक संस्कृतियों में स्त्रियों की स्थिति इससे बहुत भिन्न है। सम्पूर्ण विश्व में लोग अपने अपराध और पाप से लड़ रहे हैं। यदि आप स्त्रियों की सम्माननीय आद्य अवस्था को पुनर्जीवित करना चाहते हैं तो आपको अपनी मनोवृत्ति में पूर्ण परिवर्तन लाना होगा। वस्तुतः सामाजिक संरचना को धार्मिक वास्तविकताओं की नयी अवधारणा का ऐसा आधार देना होगा। जिसमें मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में स्त्री की भूमिका को अच्छी तरह समझा और स्वीकार किया गया हो। नये समाज के उद्भव के लिए यह परम आवश्यक है।

माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं माता के समान इस दुनिया में कोई जीवदाता नहीं। भारत में जो एक स्त्री का दर्जा है, वो विश्व में कहीं भी देखने को ना मिला है न ही मिलेगा। भारत हमेशा से ही महिलाओं यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो उनकी सामाजिक सुरक्षा, स्वावलंबन स्वायतता के साथ ही साथ उनके शैक्षिक, आर्थिक एवं राजनितिक सशक्तिकरण के लिए संवेदनशील रहा है। भारत में बने विभिन्न कानून इसी बात को प्रदर्शित भी करते हैं। स्त्री अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े भारत के प्रमुख कानून, जिसके बारे में हर स्त्री को जानना चाहिए |