विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस (10 सितंबर ): जीवन में शान्ति एवं मानसिक संतुलन बनाये रखना ही सुखी जीवन – योग गुरु महेश अग्रवाल

शेयर करें:

आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने कहा कि ऋषि, महात्माओं ने सत्संग की महिमा गायी है। आधुनिक व्यस्त जीवन पद्धति में लोगों को सत्संग मिलना कठिन है, जीवन मशीनवत् हो गया है, कोई प्रेरणा नहीं, कोई दिशा नहीं, मन अशान्त, तन रोगी, गृहस्थी जंजाल लगने लगती है, ऐसी अवस्था में हजारों संतप्त और किंकर्तव्यविमूढ़ों को जीवन की नयी दिशा, उत्साह, प्रेरणा, स्वास्थ्य एवं शान्ति देने के लिए सत्संग स्वरूप पर्व , सद्-साहित्य एवं योग अभ्यास ही मदद दे सकता है।

योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि आत्महत्या को रोकने के तरीकों के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है । योग जीवन जीने की कला और विज्ञान है, और इसका संबंध मन और शरीर के विकास से है। अतः समन्वित रूप से व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करने के लिए योग क्रमबद्ध अनुशासनों का समावेश करता है। हम योगानुशासनों का आरंभ प्राय: व्यक्तित्व के बाहरी आयाम, भौतिक शरीर से ही करते हैं। आसनों का अभ्यास मेरुदण्ड के अतिरिक्त मांसपेशियों तथा जोड़ों को स्वस्थ और लचीला बनाये रखता है। विभिन्न ग्रंथियों की सूक्ष्म मालिश हो जाती है जिससे अवटु (थाइरॉयड) – अतिक्रियता या अवक्रियता, इंसुलिन का दोषपूर्ण स्राव और अन्य हॉर्मोन असंतुलन जैसी दैहिक असामान्यताएँ संतुलित हो जाती हैं।

प्राणायाम केवल फेफड़ों में शुद्ध वायु पहुँचाने और उन्हें शक्ति प्रदान करने के कारण महत्त्वपूर्ण नहीं, बल्कि ये मस्तिष्क और भावनाओं पर भी सीधा असर डालते हैं। प्राणायाम के द्वारा प्राप्त हुई भावनात्मक स्थिरता मानसिक एवं सृजनात्मक ऊर्जाओं को रचनात्मक ढंग से मुक्त करती है और बच्चा अधिक आत्म-विश्वास, आत्म-सजगता तथा आत्म-नियंत्रण से भर उठता है। प्रत्याहार बाहरी वातावरण से सजगता को अन्दर खींचकर दैनिक जीवन के तनाव को कम करता है। प्रत्याहार की विभिन्न विधियाँ, जैसे योग निद्रा, व्यक्ति के सभी आयामों को प्रभावित करती हैं, क्योंकि सजगता के प्रत्यावर्तन से उत्पन्न शारीरिक एवं मानसिक शिथिलीकरण तथा एकाग्रता इस विधि के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। अविच्छिन्न एकाग्रता या ध्यान मन के उपद्रवों को शांत करने और मानसिक शक्तियों को सृजनात्मक दिशा प्रदान करने में अत्यंत सहायक होता है। योगानुशासनों की नियमित पुनरावृत्ति के द्वारा दैनिक जीवन में समचित्तता की अनुभूति और बाद में सभी यौगिक अभ्यासों के अंतिम लक्ष्य, समाधि को पाया जा सकता है। योग का अभ्यास सम्पूर्ण व्यक्तित्व में एक संतुलन उत्पन्न करता है।

योग गुरु अग्रवाल ने कहा कि अपने जीवन संग्राम के कुरुक्षेत्र की लड़ाई समाप्त करो। अपने-अपने घरों में शान्ति स्थापित करो। अपने पड़ोसियों से झगड़ो मत। दूसरों की निन्दा भी न करो। किसी का बुरा करो ही क्यों? अपने आपको दिन भर किसी-न-किसी काम में व्यस्त रखो। चींटी, मधुमक्खी, वायु और सूर्य से सीख ग्रहण करो। क्या वे कभी विश्राम लेते हैं? कितनी दक्षता के साथ वे सतत् कर्मशील रहा करते हैं। हमारे भाई लोग सोने में उस्ताद बन जाते हैं, पर काम करने में कामचोर। देखो, जब कभी तुम्हें समय मिले, सिलाई और बुनाई का काम करती रहो; गरीब बच्चों को पढ़ाओ। भोजन भी बनाओ; भजन भी गाओ। काम करती रहो; नाम जपती रहो। साथ-साथ इस बात का पूरा ध्यान रखो कि तुम्हारे व्यवहारों से परिवार की शान्ति भंग न हो। अगर तुम्हारे पति नहीं चाहते तुम मन्दिर जाओ, तो कदापि मत जाओ। परमात्मा का चिन्तन मन में ही कर लो। अपनी साधना को यथाशक्ति गुप्त रखो। तुलसीदास जी ने कहा है कि ऐसे व्यक्ति को जो ईश्वर के नाम से घृणा करता है, उसी समय त्याग दो, चाहे वह अपना परम प्रिय ही क्यों न हो। परन्तु आपको करना कुछ और है। वह यह कि आपके पति नहीं चाहते कि आप परमात्मा का नाम जपो तो मुँह से कदापि मत जपो, वरन् मन ही मन में स्मरण करती रहो।

आज तुलसी का युग नहीं है। समय बदल गया है। अब तुम्हें प्रत्येक व्यवहार को सही रोशनी में देखना होगा। जो कुछ कार्य तुम करो, वह परिवार की शान्ति को स्थिर बनाने में योग दे। वही व्यवहार, जिससे परिवार में शान्ति स्थापित हो, धर्म कहलाता है। यदि सन्त और अभ्यागतों की सेवा करने तथा मन्दिरों में जाने से परिवार में मतभेदजन्य संघर्ष उत्पन्न हो जाए तो समझो कि सत्कार्यों की संगति ठीक नहीं बैठ रही है। अच्छा हो, यदि उस कार्य को छोड़ ही दिया जाय।

सेवा करते समय स्त्री का रूप सेवक का हो जाता है, सलाह देते समय वह गुरु बन जाती है। पुरुष व्यवस्था करते हैं, स्त्रियाँ सेवा। परन्तु पुरुष अपने को स्त्री की अपेक्षा श्रेष्ठ समझता है, क्योंकि वह शक्ति का उपासक है। नारी कमजोर होती है, क्योंकि वह कोमलता की उपासना करती है। अधिकतर महिलाएँ मनोविज्ञान और व्यवहार शास्त्र से अनभिज्ञ रहती हैं। प्रत्येक महिला को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी है कि जब पति महोदय क्रोध करते हैं तो उसके पीछे कुछ न कुछ कारण तो होगा ही। यह बात वे तभी समझ सकेंगी, जब उन्होंने अपने पति के स्वभाव का आमूल अध्ययन किया हो। अर्थात् किसी व्यक्ति को पहचानना हो तो उसके अंतरंग जीवन में प्रवेश करना होगा। केवल यही नहीं, बल्कि कई बार तो स्त्रियों के लिए बेहतर यही है कि वे अपने जीवन को पति की रुचि और अरुचि की पूरी जानकारी रखकर, तदनुसार ढालें, अन्यथा कुटुम्ब की शान्ति केवल एक छोटे से धर्म के अभाव में, जिसे ‘अक्ल या समझ’ कहते हैं, नष्ट हो जाती है।स्त्री के पास ही वह शक्ति है, जिसके सामने पुरुष को झुकना पड़ता है अतः स्त्री को और कुछ नहीं करना, मात्र तरीका जान लेना है। घर की शान्ति, देश एवं बच्चों का भविष्य प्रधानतः घर की स्त्रियों पर ही अवलम्बित है। जिन हाथों ने पलने झुलाए, वही समाज के भाग्य का निर्माण करते, अथवा सुख शान्ति की कब्र भी खोद डालते हैं।

आप लोग खूब गपशप लगाया करते हैं। इससे शक्ति कम ही होती है। प्रतिदिन 2-4 घण्टे मौन धारण करना चाहिए। शान्ति और एकाग्रता के अभ्यास से साधक तेजस्वी, सुन्दर और सहज प्रभाव वाला हो जाता है। उसके व्यक्तित्व में वशीकरण आ जाता है। अतः येन-केन-प्रकारेण अपने जीवन को पहले की अपेक्षा सुन्दर बनाओ। यह नहीं कि आपके परिवार वालों का चेहरा सदा ऐसा गिरा रहे, मानो दस्त हो रहे हों। गीता से जीने की शक्ति और प्यार करने की कला सीख लो।

जीवन में सम्पत्ति, स्त्री, सन्तान आदि सभी रेलवे स्टेशनों की तरह आएँगे और चले भी जाएँगे। जीवन की प्रत्येक इच्छा ‘आने वाले’ स्टेशन के समान है। ऐसे ही स्टेशन और भी हैं। जीवन की इन इच्छाओं को पार करते हुए, कहीं भूल कर इन्हें जीवन का परम लक्ष्य न समझ बैठना।जो कुछ भी होता है, वह सब भगवान् का संकल्प ही है। अपनी इच्छाओं को सर्वोपरि समझने वालों को शूल भी चुभते हैं, फूल भी मिलते हैं। अगर तुम प्रत्येक घटना में प्रभु के संकल्प की धारणा करोगे तो अनासक्त बन जाओगे। यही है गीता की शिक्षा । गीता जीवन का ‘टाईम-टेबल’ है। इसे सफल-जीवन की कुंजी मानकर गीता का एक ही शब्द समझ कर, उस पर मनन किया जाए तो वही शब्द सारी गीता कह देता है। ‘अनासक्ति, योग, मत्सर, शरणागति, कर्मयोग, वैराग्य, स्थितप्रज्ञता’ – इनमें से कोई एक शब्द चुन कर मनन करना शुरू कर दो। गीता कहती है–’भगवान् एक है; मानवता एक है; जीवन एक है; विश्व एक है;