विश्व शांति दिवस ( 21 सितंबर ) – जिन्दगी सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों का मिश्रण है

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आदर्श योग आध्यात्मिक केन्द्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि हर साल 21 सितंबर को विश्व शांति दिवस मनाया जाता है। दरअसल, शांति मधुरता और भाईचारे की अवस्था है, जिसमें बैर अनुपस्थित होता है। देखा जाए तो शांति के बिना जीवन का कोई आधार ही नहीं है। वैसे आमतौर पर इस शब्द का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में युद्धविराम या संघर्ष में ठहराव के लिए किया जाता है। शांति दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों और नागरिकों के बीच शांति व्यवस्था कायम करना और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और झगड़ों पर विराम लगाना है।

संयुक्त राष्ट्र ने दुनियाभर में शांति का संदेश पहुंचाने के लिए कला से लेकर साहित्य, संगीत, सिनेमा और खेल जगत की प्रसिद्ध हस्तियों को शांतिदूत नियुक्त किया हुआ है। सफेद कबूतरों को शांति का दूत माना जाता है, इसलिए इस दिवस पर भारत में जगह-जगह सफेद रंग के कबूतर उड़ाए जाते हैं। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र से लेकर अलग-अलग संगठनों, स्कूलों और कॉलेजों में शांति दिवस के अवसर पर तरह-तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। योग गुरु अग्रवाल ने इस अवसर पर विशेष बताया कि योग का भविष्य अत्यन्त महान् और दिव्य है। आगामी सदी में योग समाज के उत्थान में सर्वप्रमुख भूमिका निभायेगा। कभी लोगों ने सोचा था कि धर्म सभी आवश्यक अच्छाइयाँ देगा, वांछित जरूरतों को पूरा करेगा, लेकिन वह महज एक भ्रम था, एक भारी निराशा थी।

फिर लोगों ने सोचा कि राजनैतिक व्यवस्था द्वारा समाज में शान्ति की अवस्था, प्रेम, बन्धुत्व और सहयोग की भावना आयेगी, लेकिन फिर भी उसको निराश होना पड़ा। अब योग की बारी आई है। लोग अनुभव करने लगे हैं कि जब तक व्यक्ति के निजी जीवन में आवश्यक परिवर्तन नहीं होगा, जब तक मनुष्य के मूल स्वभाव का रूपान्तरण नहीं हो जायेगा, तब तक दीर्घकाल-पर्यन्त कोई ठोस उपलब्धि नहीं होने वाली है। अत: समाज की दृष्टि से, चिकित्सा की दृष्टि से और आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से योग का भविष्य निश्चित रूप से महान् है। अतीत में जो कुछ होता आ रहा है, वह भविष्य में भी एक से दूसरे रूप में जारी रहेगा। युद्ध और घृणा दोनों ही रहेंगे। दुनिया बदलकर कोई आश्रम नहीं बनने वाली हैं। अगर इच्छा, भय, असुरक्षा और महत्त्वाकांक्षा न हो तो जीवन पूर्ण नहीं हो सकता।

जिन्दगी सकारात्मक और नकारात्मक, धनात्मक और ऋणात्मक दोनों का मेल है, मिश्रण है, योग हैं। रात और दिन, सुख और दुःख होने ही चाहिए। एक बच्चे के जन्म होने से तुम्हें सुख होता है और एक वृद्ध की मृत्यु से दुःख होता है, रो पड़ते हो। इन दोनों परस्पर विरोधी शक्तियों में सन्तुलन के बिना यह जिन्दगी जीने लायक ही नहीं रह जायेगी। मनुष्य के पास मन को व्यस्त रखने और विकसित करने के लिए समस्याएँ होनी ही चाहिये। समस्या, द्वन्द्व, विरोध, चिन्ता, तनाव न रहें तब मन का खेल कैसे चलेगा? और वह खेलेगा नहीं तो उसके विकासशील होने का सवाल ही कहाँ है? अगर तृष्णा, ईर्ष्या, घृणा या परेशानी न हो तो मन मूढ़ हो जायेगा, मन्द और मूर्ख बन जायेगा।

जीवन की सन्तुलित अन्तर्दृष्टि को मन की शान्ति कहते हैं। पाने और खोने से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है, वह तो जीवन में हर चीज की समझदारी से सम्बन्धित है। बाहरी जीवन उतार-चढ़ाव से परिपूर्ण होता है और यह एक कमजोर आदमी के लिये थकावट का कारण है, लेकिन शक्तिशाली व्यक्ति के लिये जीवन का हर चढ़ाव एक खुशी है और हर उतार एक खेल है। शरीर के एक स्तर पर कुछ विशेष हार्मोन स्रावित होते हैं जो अशान्ति पैदा करते हैं। इनमें एड्रिनलिन, टेस्टोस्टेरॉन नामक हार्मोन सबसे अधिक विघ्नकारक हैं।

यदि इनके प्रवाहों को ठीक से नियंत्रित कर लिया जाये तो अशान्ति उत्पन्न करने वाले आरंभिक शारीरिक उपद्रवों को दूर किया जा सकता है। आसन, प्राणायाम और ध्यान के प्रतिदिन नियमित अभ्यास से हार्मोन के स्त्रावों में नियंत्रण आयेगा, मानसिक और प्राणिक शक्तियों में एक स्वाभाविक संतुलन होगा और उद्विग्नता जैसी समस्याएँ उत्पन्न नहीं होंगी। साधारण तौर पर अशान्ति का कारण है अतिशय सोचना और इच्छा करना और यह इस बात का सूचक है कि तुम्हारा दिमाग काबू के बाहर हो गया है। इस स्थूल शरीर में दो प्रकार की शक्तियाँ हैं। एक को कहते हैं मानसिक शक्ति और दूसरी को प्राणिक शक्ति। जब तुम बेचैनी का अनुभव करते हो तब समझना कि तुम्हारी मानसिक शक्ति ऊँची है और प्राणशक्ति नीची और दोनों में असन्तुलन आ गया है। ज्ञानेन्द्रियाँ बहुत सक्रिय हैं और कर्मेन्द्रियाँ अल्प सक्रिय।

हठयोग में हम लोग इसे इड़ा और पिंगला के बीच असन्तुलन कहते हैं। आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसे कहते हैं अनुकंपी और परानुकंपी तंत्रिका तंत्र में असन्तुलन। मानसिक शक्ति की इस अधिकता को सन्तुलित करने के लिये राजयोग के ध्यान का अभ्यास अधिक करना चाहिये। सबसे अच्छा उपाय है- मंत्र का जप करना। मंत्र का जप मानसिक रूप से, माला के साथ या बिना माला के किया जा सकता है। श्वास के साथ मिलाकर भी जप किया जाता है। मंत्र के अभ्यास के लिये और भी बहुत से तरीके हैं, लेकिन ऊपर लिखे ये तरीके सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होंगे तथा उनके अभ्यास से मानसिक शक्ति का बहिर्गमन बंद होगा। अगर यह नहीं कर सकते तो इस समस्या के निदान के लिये एक दूसरा उपाय भी है। शरीर में ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाओ। तुम या तो मानसिक शक्ति की मात्रा की जाँच करो अथवा प्राणशक्ति की मात्रा को बढ़ाओ। हठयोग, राजयोग, क्रियायोग, कर्मयोग या वास्तव में योग के प्रत्येक अंग के अभ्यास का उद्देश्य इसी सन्तुलित स्थिति को लाना है।