विश्व प्र‍कृति दिवस (3 अक्टूबर) – मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि 3 अक्टूबर को विश्व प्रकृति दिवस मनाया जाता हैं | मानव प्रकृति का हिस्सा है | प्रकृति व मानव एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति के बिना मानव की परिकल्पना नहीं की जा सकती | प्रकृति दो शब्दों से मिलकर बनी है – प्र और कृति | प्र अर्थात प्रकृष्टि (श्रेष्ठ/उत्तम) और कृति का अर्थ है रचना | ईश्वर की श्रेष्ठ रचना अर्थात सृष्टि | प्रकृति से सृष्टि का बोध होता है। प्रकृति अर्थात वह मूलत्व जिसका परिणाम जगत है |

वेदों में वर्णित है की मनुष्य का शरीर पंचभूतों यानी अग्नि, वायु, जल,पृथ्वी और आकाश से मिलकर बना है।  इन पंचतत्वों को विज्ञान भी मानता है। अर्थात मानव शरीर प्राकृतिक प्रकृति से बना है | प्रकृति के बगैर मानव अस्तित्व की परिकल्पना नहीं की जा सकती है | मानव का मन, बुद्धि और अहंकार ये तीनो प्रकृति को संतुलित या संरक्षित करते हैं | प्रकृति और मनुष्य के बीच बहुत गहरा संबंध है। मनुष्य के लिए धरती उसके घर का आंगन, आसमान छत, सूर्य-चांद-तारे दीपक, सागर-नदी पानी के मटके और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं। इतना ही नहीं, मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है। आज तक मनुष्य ने जो कुछ हासिल किया वह सब प्रकृति से सीखकर ही किया है। न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिकों को गुरुत्वाकर्षण समेत कई पाठ प्रकृति ने सिखाए हैं तो वहीं कवियों ने प्रकृति के सानिध्य में रहकर एक से बढ़कर एक कविताएं लिखीं।

योग गुरु अग्रवाल ने बताया भारत की छः दर्शन-पद्धतियों में सांख्य दर्शन एक अति प्राचीन दर्शन है। सृष्टि के प्रत्येक कण, सजीव-निर्जीव, दृश्य, अदृश्य, वनस्पति, खनिज, पशु, मानव और यहाँ तक कि दैवी सत्ता में भी वह दो प्रकार की प्राथमिक शक्तियों का आरोपण करता है। सांख्य दर्शन के अनुसार हर अस्तित्ववान पदार्थ दो प्राथमिक शक्तियों की अंतःक्रिया से निर्मित है। ये दोनों शक्तियाँ पुरुष (चेतना) और प्रकृति हैं। इस प्रकार पुरुष (चेतना) और प्रकृति की अंतःक्रिया का परिणाम यह सृष्टि है।

आधुनिक विज्ञान कहता है कि पदार्थ और ऊर्जा की अन्तः प्रक्रिया का परिणाम सृष्टि है। इस भौतिक शरीर में भी दो प्राथमिक शक्तियाँ हैं। हम लोग पुरुष (चेतना) और प्रकृति की अंतः प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। दर्शन में प्रत्येक अस्तित्ववान वस्तु की सर्जनात्मक शक्ति प्रकृति है। सांख्य में प्रकृति दो प्रकार की है- जागतिक प्रकृति और इन्द्रियातीत प्रकृति। जागतिक (इन्द्रियानुभविक) प्रकृति आठ तत्त्वों से निर्मित है – क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर, मन, बुद्धि और अहंकार। ये आठ तत्त्व मिलकर इन्द्रियानुभविक प्रकृति कहलाते हैं। इन आठ तत्त्वों के परिकलन से दृश्य जगत का निर्माण हुआ है। इस पृथ्वी के अतिरिक्त सौर मण्डल और नक्षत्र मण्डल पर विद्यमान दृश्य जगत् का निर्माण उन्हीं आठ तत्त्वों से हुआ है।

इसी तरह आम आदमी ने प्रकृति के तमाम गुणों को समझकर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव किए। दरअसल प्रकृति हमें कई महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाती है। जैसे- पतझड़ का मतलब पेड़ का अंत नहीं है। इस पाठ को जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में आत्मसात किया उसे असफलता से कभी डर नहीं लगा। ऐसे व्यक्ति अपनी हर असफलता के बाद विचलित हुए बगैर नए सिरे से सफलता पाने की कोशिश करते हैं। वे तब तक ऐसा करते रहते हैं जब तक सफलता उन्हें मिल नहीं जाती। इसी तरह फलों से लदे, मगर नीचे की ओर झुके पेड़ हमें सफलता और प्रसिद्धि मिलने या संपन्न होने के बावजूद विनम्र और शालीन बने रहना सिखाते हैं।

उपन्यासकार प्रेमचंद के मुताबिक साहित्य में आदर्शवाद का वही स्थान है, जो जीवन में प्रकृति का है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि प्रकृति में हर किसी का अपना महत्व है। एक छोटा-सा कीड़ा भी प्रकृति के लिए उपयोगी है, जबकि मत्स्यपुराण में एक वृक्ष को सौ पुत्रों के समान बताया गया है। इसी कारण हमारे यहां वृक्ष पूजने की सनातन परंपरा रही है। पुराणों में कहा गया है कि जो मनुष्य नए वृक्ष लगाता है, वह स्वर्ग में उतने ही वर्षो तक फलता-फूलता है, जितने वर्षो तक उसके लगाए वृक्ष फलते- फूलते हैं।

प्रकृति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपनी चीजों का उपभोग स्वयं नहीं करती। जैसे-नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती, पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते, फूल अपनी खुशबू पूरे वातावरण में फैला देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती, लेकिन मनुष्य जब प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ करता है तब उसे गुस्सा आता है। जिसे वह समय-समय पर सूखा, बाढ़, सैलाब, तूफान के रूप में व्यक्त करते हुए मनुष्य को सचेत करती है | जल,जंगल और जमीन विकास के पर्याय हैं | जल,जंगल और जमीन जब तक है तब तक मानव का विकास होता रहेगा | मानव जो छोड़ते हैं उसको पेड़ – पौधे लेते हैं और जो पेड़-पौध छोड़ते हैं उसको मानव लेते हैं | जल ,जंगल और जमीन से ही जीवन है | जीवन ही नहीं रहेगा तो विकास अर्थात बिजली,सड़क,आदि किसी काम के नहीं रहेंगे |

यह कहने में आश्चर्य नहीं होगा कि समुदाय का स्वास्थ्य ही राष्ट्र की सम्पदा है | जल,जंगल और जमीन को संरक्षित करने लिए मन का शुद्ध होना बहुत जरुरी है | मन आतंरिक पर्यावरण का हिस्सा है | जल,जंगल और जमीन वाह्य (बाहरी) पर्यावरण का हिस्सा है | ऋग्वेद में वनस्पतियों से पूर्ण वनदेवी की पूजा की गई है – वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं।

तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधीय गुण भी मौजूद हैं। पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसीलिए की जाती है क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है। गुरु ग्रन्थ साहिब में वर्णित है पवन गुरु,पानी पिता,माता धात महत अर्थात हवा को गुरु ,पानी को पिता तथा धरती को माँ का दर्जा दिया गया है | आपदाएं प्राकृतिक हों या मानव निर्मित दोनों आपदाओं में मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वर्ष 2020 में जैविक आपदा और प्राकृतिक आपदाओं का कहर ये साबित करता है की मानव ने काफी लम्बे समय से प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है | वर्ष 2020 में पूरा विश्व प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं से सहमा हुआ है | इन आपदाओं ने मानव अस्तित्व पर गहरी चोट दी है | आपदाओं से बचने के लिए हमे अपने चारों ओर के वातावरण को संरक्षित करना होगा तथा उसे जीवन के अनुकूल बनाए रखना होगा ।