विश्व हेपेटाइटिस दिवस : बीमारी एक ऐसी दशा है जिसका अनुभव शरीर में किया जाता है, पर इसका अस्तित्व होता है मन में – योगगुरु महेश अग्रवाल

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि बीमारी एक ऐसी दशा है जिसका अनुभव शरीर में किया जाता है, पर इसका अस्तित्व होता है मन में। योग के अनुसार बीमारी हमारी अन्तश्चेतना में दबी रहती है, चूँकि हम उसके प्रति संवेदनशील नहीं होते, अत: उसकी अनुभूति मन और इन्द्रियों के जरिये शरीर में होती है। सभी रोग, चाहे वे पाचन सम्बन्धी हों या रक्त परिसंचरण सम्बन्धी, असावधानी और स्वास्थ्य के नियमों के प्रति लापरवाही से ही पैदा होते हैं।

योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हर साल 28 जुलाई को विश्व हेपेटाइटिस दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को हेपेटाइटिस रोग के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। हेपेटाइटिस शब्द का उपयोग लिवर की सूजन के लिए किया जाता हैं। यह वायरल संक्रमण या अल्कोहल जैसे हानिकारक पदार्थों के संपर्क में आने के कारण होता है। हेपेटाइटिस लक्षण रहित और सीमित लक्षणों के साथ हो सकता है, लेकिन इसमें प्राय: पीलिया, अत्यधिक थकान (भूख में कमी) और अस्वस्थता हो सकती है। हेपेटाइटिस दो प्रकार- तीव्र (एक्यूट) और दीर्घकालिक (क्रोनिक) का होता है।

इस वर्ष की थीम  हेपेटाइटिस मुक्त भविष्य है, माँ और नवजात शिशुओं में हेपेटाइटिस बी को रोकने पर केन्द्रित है। हेपेटाइटिस वायरस ए, बी, सी, डी और इ पांच प्रकार का होता है। इनमें से हेपेटाइटिस बी और सी क्रोनिक संक्रमण हैं, जिसमें लंबे समय तक, कभी-कभी वर्षों या दशकों तक लक्षण नहीं दिखाई देते है, और जो लीवर (यकृत) कैंसर का मूल कारण है, विश्व हेपेटाइटिस दिवस के लिए 28 जुलाई की तारीख का चयन इसलिए किया गया था, क्योंकि इस दिन नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ बारुख ब्लंबरबर्ग का जन्मदिन है, जिन्होंने हेपेटाइटिस बी वायरस (एचबीवी) की खोज की तथा वायरस के लिए नैदानिक परीक्षण तथा टीका विकसित किया था।

स्वस्थ यकृत ( लिवर ) के लिए योग अभ्यास मंडूकासन एवं पवनमुक्तासन उपयोगी है | मानव के शरीर में मस्तिष्क के बाद यकृत सबसे जटिल और दूसरा सबसे बड़ा अंग हैं। लीवर मानव शरीर का बेहद अहम अंग है। यकृत के प्रमुख कार्य प्रोटीन पोषण की मात्रा का संतुलन करना, कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करना , रक्त के थक्के (अधिक मोटा/गाढ़ा करना) के निर्माण में सहायता करना, पित्त निकालना (पित्त एक तरल पदार्थ है जो कि पाचन तंत्र में वसा को तोड़ने में मदद करता है),विटामिन B12 का संचय , संक्रमण और रोग से लड़ना, शरीर में रक्त शर्करा को नियमित करना, शरीर से टॉक्सिक (विषाक्त) पदार्थों को निकालना, ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलना

लीवर से संबंधित रोग :-
लिवर का ऑटोइम्यून डिसऑर्डर:इसमें मानव शरीर के तंत्रिका तन्त्र, कोशिकाओं और उतकों को नुकसान पहुंचता है तथा लीवर पर असर पड़ता है और उसके कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है। जब लीवर में वसा या अधिक फैट जमा हो जाता है तो लीवर फैटी हो जाता है। जब यकृत से सम्बंधित बीमारी लंबे समय से हो और वह ठीक न हुई हो तो यह काम करना बंद कर देता है जिसे लीवर फेलियर कहा जाता है। यकृत कैंसर: यकृत की कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि से यह रोग पैदा होता है। यकृत/ लीवर सिरोसिस: यह रोग शरीर में धीरे-धीरे बढ़ता है। इसमे लीवर सिकुड़ने लगता है और लचीलापन खोकर कठोर हो जाता है।

यकृत से संबन्धित बीमारियों से बचाने के उपाय :- स्वस्थ और संतुलित आहार का सेवन। लहसुन, अंगूर, गाजर, हरी पत्तेदार सब्जियां, सेब और अखरोट आदि का सेवन ।जैतून का तेल का उपयोग करें।नींबू और नीबू का रस तथा हरी चाय पीएं। वैकल्पिक अनाज (मोटा अनाज़, बाजरा और कूटू आदि) के सेवन को प्राथमिकता दें।हरी पत्तेदार सब्जियां भोजन में शामिल करें। आहार में हल्दी का उपयोग करें। स्वस्थ जीवन शैली और सुरक्षा उपागम को अपनाना। नियमित योग व्यायाम। अल्कोहल, धूम्रपान और ड्रग्स आदि का निषेध। क्योंकि अल्कोहल, धूम्रपान और ड्रग्स आदि यकृत की कोशिकाओं को नष्ट करते हैं। मोटापे के प्रति सावधानी रखना। क्योंकि मोटापे के कारण गैर-अल्कोहल वसायुक्त रोग हो सकते हैं। जो यकृत के लिए घातक होते हैं।

भारत सरकार लीवर की बीमारियों को रोकने के लिए आयुर्वेदिक पद्धति को बढावा दे रही है। क्योंकि आयुर्वेदिक पद्धति यकृत के लिए एक समग्र दृष्टिकोण का प्रतिपादन करती है। इस पद्धति में स्वस्थ आहार, व्यायाम, योग-प्राणायाम और तनाव को कम करने के उपाय आदि शामिल हैं।