विश्व गर्भनिरोधक दिवस ( 26 सितंबर) – अनचाहे गर्भ के जोखिम से महिलाओं को उबारने के लिए मनाया जाता है दिवस

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि परिवार नियोजन के प्रति जागरूक करने और अनचाहे गर्भ के जोखिम से महिलाओं को बचाने पर जोर दिया जा रहा है । छोटे और सुखी परिवार के लिए लोगों में परिवार नियोजन के प्रति रुझान बढ़ रहा है ।अनचाहे गर्भ के जोखिम से महिलाओं को उबारने के लिए हर साल 26 सितंबर को विश्व गर्भनिरोधक दिवस मनाया जाता है ।

योग गुरु अग्रवाल ने बताया नियमित योगाभ्यास करने वाली स्त्रियों में यह स्वाभाविक विकास स्वयमेव हो जाता है। उनमें यह भी क्षमता आ जाती है कि वे इच्छानुसार गर्भधारण कर सकती हैं। शरीर में एक बहुत महत्त्वपूर्ण ‘हार्मोन ग्रूप’ होता है। इसे प्रोस्टाग्लैण्डिन कहते हैं। ये हार्मोन गर्भ धारण की प्रक्रिया का विरोध करते हैं और शुक्र व रज का मिलन गर्भाशय में नहीं होने देते। यौगिक विधियों से स्त्री-शरीर में इस हार्मोन की मात्रा को यहाँ तक बढ़ाया जा सकता है कि वह खुद ही प्राकृतिक रूप से बर्थ कंट्रोल का काम करे। तब तो तुम्हारा हार्मोन ही गर्भधारण के विरुद्ध कार्यरत रहेगा। योग साधना में ज्यों-ज्यों पूर्णता आती है, बहुत सी स्वाभाविक प्रक्रियाओं में नियंत्रण प्राप्त होता है। आध्यात्मिक प्रगति होने पर मासिक स्राव बंद हो जाये, यह आवश्यक नहीं। कभी-कभी हठयोग की आन्तरिक शुद्धि वाली क्रियाओं के भरपूर अभ्यास से मासिक धर्म बंद हो जाता है, लेकिन यह बहुत सामान्य तथ्य नहीं है। मासिक स्राव नारी के भावनात्मक चयापचय को बताता है।

आध्यात्मिक ऊँचाई की तुलना उसके बाहरी प्रदर्शन या अप्रदर्शन से नहीं हो सकती। बहुत सी स्त्रियों में, उनकी बहुत ऊँची आध्यात्मिक स्थिति होते हुये भी मासिक धर्म जारी रहता है। कुछ स्त्रियों में वह घटते-घटते नहीं के बराबर रह जाता है। कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी हैं जिन्होंने किसी तरह के योगाभ्यास या अन्य आध्यात्मिक जीवन का अभ्यास कभी नहीं किया और उनमें कोई आध्यात्मिक जिज्ञासा भी नहीं है, उन्हें भी मासिक धर्म नहीं होता। जब मामला ऐसा है तो फिर कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हार्मोन देकर मासिक स्राव शुरू करा सकता है। लेकिन एक योगिनी का मासिक धर्म बंद होने पर उसे भलीभाँति ज्ञात रहता है कि ऐसा क्यों हुआ और वह यह भी जानती है कि उसे पुनः आरंभ कैसे किया जाये।अतः वह अपनी इच्छानुसार बच्चे को जन्म देने में हमेशा सक्षम रहती है और न चाहने पर अवांछित गर्भ धारण को टाल भी सकती है।

वज्रोली और सहजोली का अभ्यास

वज्रोली और सहजोली का अभ्यास गृहस्थ लोग करते हैं। इससे उनका वैवाहिक सम्बन्ध विकसित और आध्यात्मिक होता जायेगा। वज्रोली पुरुषों के लिये है, जिसमें वज्र नाड़ी को नियंत्रित किया जाता है। वज्र नाड़ी ही यौन भावना के लिये जिम्मेदार नाड़ी समूह है।वज्र नाड़ी वीर्य की संचालिका है।यह दो नाड़ियों का समूह है, जो जननेन्द्रिय से नीचे उरुमूल के दोनों बगल में जाती हैं और वहाँ से अंडकोशों में जाकर टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन के उत्पादक को क्रियाशील बनाती हैं। यह हार्मोन पुरुष की यौन इच्छाओं को नियंत्रित करता है और हृदय को भी संचालित करता रहता है। वज्रोली का अभ्यास पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर किया जाता है। जालंधर बंध में श्वास रोकते हुए तुम जननेन्द्रिय क्षेत्र और साथ ही साथ अंडकोश, जननेन्द्रिय और वज्र नाड़ी को संकुचित करते हो। इस अभ्यास दौरान मूत्राशय और गुर्दे भी सिकुड़ते हैं। सहजोली, वज्रोली का समानान्तर अभ्यास है, जो स्त्रियों के लिये है। इसका अभ्यास सिद्धयोनि आसन में किया जाता है। इसमें अंतर्कुम्भक करते हुए योनिगत स्नायुओं और मूत्र मार्ग को संकुचित करके ऊपर की ओर खींचा जाता है और यह आकुंचन उसी तरह का होता है जैसे तुम पेशाब को रोकने के लिये प्रयत्न करते हो। इस दौरान गर्भाशय, मूत्राशय और गुर्दे भी संकुचित होते हैं। सीधे वज्रोली और सहजोली के अभ्यास आरम्भ नहीं करने चाहिये। पहले तुम्हें कुम्भक, उड्डियान बंध और सिद्धासन को पक्का कर लेना चाहिये।

कुछ आसनों को भी सिद्ध कर लेना चाहिए, जैसे-वज्रासन, सुप्त वज्रासन, शलभासन और पश्चिमोत्तानासन। ये आसन जननेन्द्रिय में स्वाभाविक संकुचन लाते हैं। पश्चिमोत्तानासन में कई मिनटों तक रुको। इससे शरीर उड्डियान बंध के लिये तैयार होगा। सिद्धासन में पेरिनियम को दबाया जाता है, जिससे मूलाधार और वज्र नाड़ी में स्वाभाविक तौर पर हल्का आकुंचन होता है। शीर्षासन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह रक्त को मस्तिष्क में संचारित करता है।शिशु को गर्भ में धारण करने वाली शाश्वत माता अनन्त काल से उर्वरता, प्रचुरता और उत्पादकता की प्रतिरूप रही है तथा गर्भावस्था सृजनात्मक चेतना एवं आशावादिता का मौलिक प्रतीक है। यद्यपि गर्भावस्था एक सामान्य स्थिति है; फिर भी यह अपने आप में एक सम्पूर्णता का अनुभव है। यह एक विशिष्ट अवस्था है। शरीर और मन की अंतरंगता का यह प्रभावशाली उदाहरण है। यह एक ऐसी अवस्था है जब स्त्री के अस्तित्व के विभिन्न आयामों के बीच समस्वरता का होना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। *योग के अभ्यास माता के साथ शिशु के शारीरिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक विकास को संयोजित करते हुए शरीर और मन को सर्वोत्तम स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।

गर्भधारण का विचार करना

गर्भधारण के पूर्व योग का नियमित अभ्यास गर्भावस्था के लिए आदर्श पृष्ठभूमि है। भावी माता आसनों के अभ्यास के द्वारा अच्छे समन्वय सहित लचीलापन और सुनम्यता प्राप्त कर लेती है। तब प्राणायाम दो जीवों के लिए पर्याप्त प्राणशक्ति से परिपूर्ण करना सुनिश्चित करता है और ध्यान मातृत्व से जुड़ी परम्पराओं के अनुरूप स्वच्छता का विकास करता है। योग का अभ्यास एक असाधारण आध्यात्मिक क्षमताओं वाले शिशु का आतिथेय करने की दृष्टि से माता-पिता दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण होगा। यह सम्भव है कि शिशु आंशिक या पूर्णरूपेण जाग्रत कुण्डलिनी के साथ उत्पन्न हो। इस प्रकार के व्यक्ति जन्म से ही आध्यात्मिक रूप से विकसित होते हैं और मानवता के प्रति उनका महान् योगदान हो सकता है। इस प्रकार के बच्चे बिरले ही होते हैं और बिरले ही होते हैं वे माता-पिता जो इस प्रकार बच्चों को इस जगत् में लाते हैं, फिर भी हमें यह कभी भूलना नहीं है कि उसकी सम्भावना तो है ही। प्रत्येक बच्चे का गर्भ में प्रतिरोपण यदि माता-पिता की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर हो तो यह अभिभूत करने वाला तथ्य होगा, क्योंकि उन बच्चों की चेतना का गठन एवं पोषण माता-पिता के आध्यात्मिक तत्त्वों से होगा।