विश्व स्तनपान दिवस : स्तनपान प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो बच्चे को निरोगी और स्वस्थ रखती है- योग गुरु महेश अग्रवाल

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि स्तनों का सीधा सम्बन्ध प्रजनन से नहीं होता है, किन्तु ये नवजात शिशु के परिपोषण के स्रोत हैं। ये शरीर की लयात्मकता के सूचक भी हैं। ग्रन्थियों के एक जोड़े के रूप में स्तन वक्ष के दोनों ओर स्थित होते हैं। इनमें ग्रन्थियुक्त ऊतक होते हैं जिनमें दूध उत्पन्न होकर निस्सरित होता है। यह दूध वाहिनियों द्वारा चूचुक तक आता है जो उद्धर्षी ऊतकों का बना होता है। इसमें अनेक छिद्र होते हैं जिनके द्वारा शिशु दूध चूसता है। चूसने की क्रिया दूध के बहाव को उत्तेजित करती है। माँ का दूध बच्चे को प्रतिरक्षित तो करता ही है, यह उसकी आवश्यकता और पाचन शक्ति के अनुकूल भी होता है।

योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि स्तनपान के प्रति जन जागरूकता लाने के मक़सद से अगस्त माह के प्रथम सप्ताह को पूरे विश्व में स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। स्तनपान सप्ताह के दौरान माँ के दूध के महत्त्व की जानकारी दी जाती है। नवजात शिशुओं के लिए माँ का दूध अमृत के समान है। माँ का दूध शिशुओं को कुपोषण व अतिसार जैसी बीमारियों से बचाता है।

स्तनपान को बढ़ावा देकर शिशु मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है। शिशुओं को जन्म से छ: माह तक केवल माँ का दूध पिलाने के लिए महिलाओं को इस सप्ताह के दौरान विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाता है। स्तनपान शिशु के जन्म के पश्चात एक स्वाभाविक क्रिया है। भारत में अपने शिशुओं का स्तनपान सभी माताऐं कराती हैं, परन्तु पहली बार माँ बनने वाली माताओं को शुरू में स्तनपान कराने हेतु सहायता की आवश्यकता होती है। स्तनपान के बारे में सही ज्ञान के अभाव में जानकारी न होने के कारण बच्चों में कुपोषण का रोग एवं संक्रमण से दस्त हो जाते हैं।

शिशु के लिए स्तनपान संरक्षण और संवर्धन का काम करता है। रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति नए जन्मे हुए बच्चे में नहीं होती है। यह शक्ति माँ के दूध से शिशु को हासिल होती है। माँ के दूध में लेक्टोफोर्मिन नामकतत्त्व होता है, जो बच्चे की आंत में लौह तत्त्व को बांध लेता है और लौह तत्त्व के अभाव में शिशु की आंत में रोगाणु पनप नहीं पाते। माँ के दूध से आए साधारण जीवाणु बच्चे की आंत में पनपते हैं और रोगाणुओं से प्रतिस्पर्धा कर उन्हें पनपने नहीं देते।

माँ के दूध में रोगाणु नाशक तत्त्व होते हैं। माँ की आंत में वातावरण से पहुँचे रोगाणु, आंत में स्थित विशेष भाग के संपर्क में आते हैं, जो उन रोगाणु-विशेष के ख़िलाफ़ प्रतिरोधात्मक तत्त्व बनाते हैं। ये तत्त्व एक विशेष नलिका थोरासिक डक्ट से सीधे माँ के स्तन तक पहुँचते हैं और दूध के द्वारा बच्चे के पेट में। बच्चा इस तरह माँ का दूध पीकर सदा स्वस्थ रहता है।

माँ का दूध जिन बच्चों को बचपन में पर्याप्त रूप से पीने को नहीं मिलता, उनमें बचपन में शुरू होने वाली मधुमेह की बीमारी अधिक होती है। बुद्धि का विकास उन बच्चों में दूध पीने वाले बच्चों की अपेक्षाकृत कम होता है। अगर बच्चा समय से पूर्व जन्मा (प्रीमेच्योर) हो, तो उसे बड़ी आंत का घातक रोग, नेक्रोटाइजिंग एंटोरोकोलाइटिस हो सकता है। अगर गाय का दूध पीतलके बर्तन में उबाल कर दिया गया हो, तो उसे लीवर (यकृत) का रोग इंडियन चाइल्डहुड सिरोसिस हो सकता है। इसलिए माँ का दूध छह-आठ महीने तक बच्चे के लिए श्रेष्ठ ही नहीं, जीवन रक्षक भी होता है।

स्तनपान की विशेषताएँ:- माँ के दूध की विशेषताओं के बारे में महिलाओं को ख़ासतौर पर विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान बताया जा रहा है। कहा जाता है कि माँ के दूध में ज़रूरी पोषक तत्व, एंटी बाडीज,हार्मोन, प्रतिरोधक कारक और ऐसे आक्सीडेंट मौजूद होते हैं, जो नवजात शिशु के बेहतर विकास और स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी होते हैं।

माँ का दूध सर्वोतम आहार:- एकनिष्ठ स्तनपान का अर्थ जन्म से छः माह तक के बच्चे को माँ के दूध के अलावा पानी का कोई ठोस या तरल आहार नहीं देना चाहिए। माँ के दूध में काफ़ी मात्रा में पानी होता है जिससे छः माह तक के बच्चे की पानी की आवश्यकताऐं गर्म और शुष्क मौसम में भी पूरी हो सकें। माँ के दूध के अलावा बच्चे को पानी देने से बच्चे का दूध पीना कम हो जाता है और संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है। प्रसव के आधे घण्टे के अन्दर-अन्दर बच्चे के मुँह में स्तन देना चाहिए। ऑपरेशन से प्रसव कराए बच्चों को 4- 6 घण्टे के अन्दर जैसे ही माँ की स्थिति ठीक हो जाए, स्तन से लगा देना चाहिए।

प्रथम दूध (कोलोस्ट्रम):- प्रथम दूध (कोलोस्ट्रम) यानी वह गाढ़ा, पीला दूध जो शिशु जन्म से लेकर कुछ दिनों (4 से 5 दिन तक) में उत्पन्न होता है, उसमें विटामिन, एन्टीबॉडी, अन्य पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं। यह संक्रमणों से बचाता है, प्रतिरक्षण करता है और रतौंधी जैसे रोगों से बचाता है। स्तनपान के लिए कोई भी स्थिति, जो सुविधाजनक हो, अपनायी जा सकती है। कम जन्म भार के और समय पूर्व उत्पन्न बच्चे भी स्तनपान कर सकते हैं। यदि बच्चा स्तनपान नहीं कर पा रहा हो तो एक कप और चम्मच की सहायता से स्तन से निकला हुआ दूध पिलायें।

बोतल से दूध पीने वाले बच्चों को दस्त रोग होने का ख़तरा बहुत अधिक होता है अतः बच्चों को बोतल से दूध कभी नहीं पिलायें। यदि बच्चा 6 माह का हो गया हो तो उसे माँ के दूध के साथ- साथ अन्य पूरक आहार की भी आवश्यकता होती हैं। इस स्थिति में स्तनपान के साथ-साथ अन्य घर में ही बनने वाले खाद्य प्रदार्थ जैसे मसली हुई दाल, उबला हुआ आलू, केला, दाल का पानी, आदि तरल एवं अर्द्व तरल ठोस खाद्य पदार्थ देने चाहिए, लेकिन स्तनपान 1/2 वर्ष तक कराते रहना चाहिए। यदि बच्चा बीमार हो तो भी स्तनपान एवं पूरक आहार जारी रखना चाहिए। स्तनपान एवं पूरक आहार से बच्चे के स्वास्थ्य में जल्दी सुधार होता है।

बच्चों को स्तनपान के साथ-साथ अर्धठोस आहार, मिर्च मसाले रहित दलिया, खिचडी, चावल, दालें, दही या दूध में भिगोई रोटी मसल कर दें। एक बार में एक ही प्रकार का भोजन शुरू करें। भोजन की मात्रा व विविधता धीरे-धीरे बढ़ाए। पकाए एवं मसले हुए आलू, सब्जियाँ, केला तथा अन्य फल बच्चे को दें। बच्चे की शक्ति बढाने के लिए आहार में एक चम्मच तेल या घी मिलाएँ। स्तनपान से पहले बच्चे को पूरक आहार खिलायें।

शिशु को सही समय और पर्याप्त मात्रा में माँ का दूध न मिल पाना भी कुपोषण की समस्या का एक प्रमुख कारण है। पोषण में सुधार लाने के लिया समुदाय स्तर पर पोषण से सम्बंधित व्यवहारों में परिवर्तन लाकर पोषण स्तर में सुधार लाया जा सकता है। उचित पोषण के कुछ प्रमुख व्यवहार को हमें ध्यान रखना चाहिए जैसे– शिशु को गरम रखना एवं किसी भी बाह्य संक्रमण से बचाना।

गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान दिन में दो घंटे आराम तथा एक अतिरिक्त खुराक अवश्य लेनी चाहिए। उम्र के अनुसार निर्धारित टीकाकरण अवश्य कराना चाहिए। माँ को पोष्टिक आहार लेते रहना चाहिए। खाने में ऐसे खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करना चाहिए जिसमें लोहे की मात्र ज़्यादा से ज़्यादा हो, इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि माँ और बच्चा दोनों ही हमेशा ‘आयोडीन’ युक्त नमक का ही प्रयोग करें ।