ईमानदारी की कहानी : जब एक अंजान व्यक्ति की ईमानदारी, किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेर दे

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अक्सर आप ने देखा होगा कि माँ बाप अपने बच्चों घर में ईमानदारी की शिक्षा देते है और वही ईमानदारी जीवन में एक दिन उसे सम्मान दिलाती है। ऐसी ही ईमानदारी की एक घटना आज के इस पोस्ट में जाने गे। एम एस दसौनी एक ईमानदारी की कहानी शेयर करते हुए बताते है ये घटना उनके रिश्तेदार के साथ 2016 की है, उनकी पोस्टिंग उस वक्त गोरखपुर में थी। एक दिन मेरे कुछ रिश्तेदार देहरादून से गोरखपुर, मुझसे मिलने के लिए आने वाले थे।

जिस दिन वो आये, मैं उन्हें लेने रेलवे स्टेशन चला गया और जब हम घर पहुचे तो करीब 7–8 घंटो के बाद मेरे एक रिश्तेदार को अचानक से ख्याल आया कि उनका हैंड बेग (पर्स) तो ट्रैन में ही छूट गया। जिसमें लाखो के गहने, थोड़ी बहुत नगदी और जितने भी कार्ड थे क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, PAN कार्ड, आधार कार्ड,ड्राइवरिंग लाइसेंस सब कुछ उसी में था।

ये सुनते ही सबके हाथ-पैर फूल गए। अभी रात के 10 बज रहे थे। इस वक़्त कुछ किया भी नही जा सकता था। रेलवे में कई जगहों पर फ़ोन लगाया लेकिन कोई फायदा नही हुआ। उस वक़्त रेलवे मिनिस्टर Suresh prahu हुआ करते थे , इस बारे में उनके भी Twitter पर tweet किया, लेकिन कोई परिणाम नही निकला।

किसी तरह बेचैनी में रात कटी और सुबह-सुबह मैं स्टेशन मास्टर से मिलने पहुच गया, स्टेशन मास्टर ने कहा कि “यदि आपका बैग किसी रेलवे वेन्डर या बाहरी व्यक्ति के हाथों में पड़ गया होगा तो मिलना असंभव है और यदि किसी ईमानदार Railway TTE को मिलता है तो, मिलने की कुछ संभावना जरूर है।

ऐसी स्थिति में भी TTE आपके समान को रेलवे डिपार्टमेंट में जमा करा देगा। वहाँ आपको कागजी कार्यवाही करने के पश्चात की आपका समान मिल पायेगा। ” मैं सोच में पड़ गया कि इतने बड़े रेलवे सिस्टम में, एक छोटे से बैग के मिलने की कोई संभावना होगी भी या नही।

जहाँ हर स्टेशन में न जाने कितने लोग उतरते-चढ़ते है। वैसे भी शीट खाली होते ही, वेन्डर शीट का सारा सामान ( चादर, तकिया, कंबल) उठाकर ले जाता है और शीट पर दूसरा व्यक्ति बैठ जाता है। एक प्रतिशत ये मान भी ले कि बैग मिल ही जायेगा, तो भी उसे कहाँ जमा कराया जाएगा और उसे प्राप्त क़्ररने की क्या प्रक्रिया होंगी कुछ भी पता नही था। बैठे-बिठाई मुसीबत आन पड़ी थी।

इसी सब माथा-पच्ची में आधा दिन निकल गया । तभी अचानक अपने एक मित्र की याद आई नाम था खालिद, जो कि रेलवे में ही TTE के पद पर कार्यरत है। मैंने तुरंत उन्हें कॉल किया और सारी घटना से अवगत करा दिया। साथ मे उस ट्रैन का नाम और नम्बर भी बात दिया। मित्र ने भी पहले तो बड़ी निराशा व्यक्त की लेकिन स्थिति को भांपते हुए, हर संभव मदद देने का आश्वासन दिया और फ़ोन काट दिया।

उधर मेरे जिस रिश्तेदार का सामान था वो बहुत रुआँसी और मायूस हो चुकी थी। क्योंकि बार-बार उन्हें, उनके पति के द्वारा दी हुई एक बहुत ही बेशकीमती हीरे की अंगूठी की याद आ जाती थी, जो कि उसी हैंडबैग में थी। उन्हें बैग मिलने की कोई उम्मीद नही थी, सच पूछो तो किसी को भी नही थी।

पूरे दो घंटे बाद मेरे मोबाइल में खालिद का फ़ोन आया,एक पल के लिए तो दिल जोरो से धड़का, फिर फ़ोन उठाकर जैसे ही हेलो बोला , दूसरी ओर से खालिद की खुशी से खनकती हुई आवाज सुनाई दी, वो बोला” बधाई हो, आपकी किस्मत बहुत अच्छी है, आपका समान मिल गया है, आपका समान उसी ट्रैन में TTE ने संभाल कर रखा है और मैंने उससे बोल दिया है कि ‘यह समान मेरे किसी रिश्तेदार का है, उस समान को जमा न कराए’।

TTE मित्र ने आगे बताया कि ” कल वह TTE महोदय इसी रुट से वापस आएगा तो, आप उससे अपना सामान ले लेना”। मैंने पूरे दिल से अपने मित्र का शुक्रिया अदा किया और उस बैग को संभाल कर रखने वाले TTE महोदय का मोबाइल नंबर ले लिया। दूसरे दिन मैंने और मेरी वही रिश्तेदार (जिसका बैग था) रेलवे स्टेशन गए।

चूंकि TTE महोदय से पहले ही बात हो चुकी थी तो, हम नियत प्लेटफार्म नंबर पर खड़े थे। जैसे ही ट्रेन आई हम उस डब्बे में चढ़ गए जिसमे TTE पहले से मौजूद थे।

जैसे ही , TTE महोदय के हाथ मे पकड़े बैग पर मेरी रिश्तेदार की नजर पड़ी वो खुशी के मारे जोर से चीख पड़ी और बोली “Ooohh my God….यही तो है मेरा बैग, जिसे हम कल से खोज रहे थे”।

उनकी आँखों मे खुशी की आँसू छलक आए। तभी TTE महोदय बोले कि बैग खोल कर पहले अपना समान चेक कर लीजिए, ट्रैन चलने वाली है।

मैने कहाँ ” अगर अपने बैग को इतने भरोसे के साथ आपने संभाल कर रखा है तो, निश्चित ही समान भी पूरा होगा”।

तभी ट्रेन की सिटी बज उठी। TTE महोदय का शुक्रिया अदा करके जैसे ही हम बोगी से नीचे उतरने को हुए, हमने TTE महोदय को कुछ पैसे देने की कोशिश की, जो कि उनके द्वारा किये गए कार्य की तुलना में कुछ भी नही थे, लेकिन उन्होंने लेने से साफ इंकार कर दिया।

घर जाकर जब बैग खोलकर देखा तो उसमे सारा सामान पूरी तरह से सुरक्षित था। एक बार ये सोचते हुए दोनो TTE महोदय को हमने मन ही मन फिर से धन्यवाद दिया कि इतने बड़े रेलवे सिस्टम में, एक छोटा सा बैग 24 घंटे के भीतर ही मिल जाना कोई छोटी बात नही थी। एक अंजान व्यकि की ईमानदारी ने दूसरे अंजान व्यक्ति को ढेर सारी खुशियां देकर, उसके चेहरे की मुस्कान लौटा दी। अन्यथा इस सदमे से कब उबर पाते कह नही सकता।

TTE महोदय जितेंद्र श्रीवास्तव जी की ईमानदारी से लबरेज मुस्कान के साथ एक तस्वीर

 

इस घटना से इस बात पर यकीन और पक्का हो गया कि…इंसानियत अभी जिंदा… ईमानदारी अभी बाकी है..

ईमानदारी कोई विज्ञापित करने की वस्तु नहीं है न घमंड की। वह एक जीवन मूल्य है, एक जीवन उद्देश्य है। एक अच्छा संवेदनशील और संतुलित व्यक्ति ही ईमानदारी की मशाल आगे बढ़ा सकता है। ईमानदार होने के लिये जरूरी है कि वह इतना सजग और सचेत हो कि बेईमानों के इरादे समय रहते भांप ले और उस पर बिना किसी हल्ले के अंकुश लगा सके। बहुत सहजता से ऐसे अवसर कम से कम आने दे जिसमें बेईमानी की गुंजाइश हो। महज ईमानदारी का झण्डा फ़हराने भर से कुछ नहीं होता। ईमानदार होने के लिए अच्छी नीयत, दृढ संकल्प और स्वार्थहीनता जरुरी होती है और ये गुण अच्छे मूल्यों व स्वस्थ वैज्ञानिक सोच से ही आ सकते हैं। केवल ईमानदारी का झण्डा फ़हराने से कुछ नहीं होने का।