विक्रमादित्य के नौ रत्न में से एक थे – वाराहमिहिर

शेयर करें:

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य भारत के महानतम शासकों में से एक हैं । उनका काल भारतीय सीमा के अपूर्व विस्तार का काल है । इसके साथ ही इसी कालखंड में भारतीय मेधा भी फलीभूत हुई है । जीवन शैली के विभिन्न क्षेत्रों में शोध और प्रगति करने के लिए , उन्होंने अलग अलग व्यक्तियों को अपने राजदरबार में नियुक्त किया था । ये लोग थे : अमरसिम्हा ( संस्कृत शब्दकोश) , धन्वन्तरि ( आयुर्वेद) , हारिसेन ( काव्य एवं संगीत) , कालिदास ( नाटक एवं काव्य ) , क्षपंक ( ज्योतिष ) , शंकु ( स्थापत्य कला ) , वाराहमिहिर ( गणना एवं सांख्यिकी ) , वररुचि ( संस्कृत व्याकरण ) एवं बेताल भट्ट ( जादू ) ।

ये विक्रमादित्य के नौ रत्न कहलाते थे । इनमें वाराहमिहिर का एक अलग स्थान है । आज उनके बारे में जानते हैं ।

वाराहमिहिर का वास्तविक नाम मिहिर था । इनका जन्म सन ५०५ में उज्जैन में हुआ था एवं इनके पिता का नाम आदित्यदास था । वाराहमिहिर महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के शिष्य थे ।

वाराहमिहिर ने गणित के साथ ज्योतिष, भूगोल और जीवविज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है । आपने तीन प्रमुख ग्रंथों की रचना की : वृहत संहिता , वृहत जातक और पंच-संहिता । पंच संहिता में वर्णित पाँच सिद्धांत हैं : सूर्य सिद्धांत , वशिष्ठ सिद्धांत , पौलिस सिद्धांत , रोमका सिद्धांत एवं पैताम्ना सिद्धांत ।

वाराहमिहिर ने ही सबसे पहले मंगल पर पानी होने का आकलन किया था । साथ ही मंगल का व्यास ३७७२ मील बताया था । ये दोनों ही आकलन वर्तमान वैज्ञानिकों के द्वारा लगभग सही पाए गए हैं । मंगल पर पानी की भी पुष्टि हो रही है और उसका व्यास ४२८० मील माना गया है । केवल ११% की त्रुटि है वाराहमिहिर की गणना से ।

वृहत संहिता में ५५० धूमकेतुओं का वर्णन मिलता है ।

त्रिकोणमिति तालिका में भी वारहमिहिर ने बहुत से संशोधन किए थे । शून्य के बीजगणितीय गुणों की व्याख्या की ।साथ ही ऋणात्मक संख्या भी वाराहमिहिर की ही देन है ।

४*४ के जादुई वर्ग , सांख्य-त्रिभुज ( जो पास्कल त्रिभुज के नाम से जाना जाता है ) की खोज भी वाराहमिहिर ने की थी । साथ ही त्रिकोणमिति के ज्या-नियमों में बदलाव भी किए थे ।

ईक्विनाक्स यानि वर्ष के वो दिन जब दिन और रात समान अवधि के होते हैं , उसके सतत विस्थापन की गणना ( लगभग ५०.३२ सेकंड) का भी आकलन वाराहमिहिर ने किया था ।

वाराहमिहिर ने ही बताया था कि चंद्रमा एवं अन्य आकाशीय पिंड सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशमान होते हैं । सूर्य एवं चंद्रग्रहण की व्याख्या सूर्य-संहिता में की गयी है । चींटी और दीमक पानी के समीप पलते हैं ये अवलोकन भी वाराहमिहिर की देन है ।

वाराहमिहिर को वाराह की उपाधि स्वयं राजा विक्रमादित्य ने दी थी । मिहिर ने राजा के पुत्र की मृत्यु और कारण , दोनों का सही आकलन किया था । राजकुमार की मृत्यु जंगली सुअर के आक्रमण से हुई थी जिसे संस्कृत में वाराह बोलते हैं । इससे प्रभावित होकर राजा ने उन्हें वाराह की उपाधि दी ।

भारत-भूमि का इतिहास ऐसे ना जाने कितने साहित्यकारों , गणितज्ञों , वैज्ञानिकों , गुरुओं आदि से भरा पड़ा है । पर ये बाहरी आक्रांताओं के आक्रमण , १२०० सालों की दासता और उसके बाद आयी मानसिक ग़ुलामी का नतीजा है कि हम अपने पूर्वजों की बतलायी बातें जब तक किसी पश्चिमी व्यक्ति से ना सुन लें , उसे सही नहीं मानते । पर जैसे-जैसे इन बातों का ज्ञान होता है , समझ आता है कि दुनिया की वास्तविक मेधा कहाँ थी और किसने केवल मेधावी होने का मुखौटा मात्र पहन रखा है ।