खाना बनाने में लोग देसी ‘घी’ का इस्तेमाल कम क्यों करते है? क्या घी का विकल्प ऑलिव ऑयल सही है?

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युर्वेद में घी को सर्वश्रेष्ठ स्नेह (घी-तेल-मज्जा-वसा) माना गया है. ये मधुर गुण वाला होता है और पित्त और वात दोष में लाभकारी है. बहुत सारी आधुनिक शोध भी यह बताती हैं कि अगर घी का सेवन थोड़ी मात्रा में किया जाये तो यह बहुत गुणकारी है. थोड़ी मात्रा से मतलब यहाँ 2-3 छोटा चम्मच रोजाना है. घी की गुणवत्ता को देखते हुए ही विदेशों में घी का प्रचलन बहुत बढ़ा है और भारतीय दुकानों के साथ साथ यह बहुत ही आराम से अमेरिकन सुपर मार्केट में भी मिल जाता है. नीचे लगी फोटो मैंने अमेरिकन सुपर मार्केट की वसा सेक्शन से ली है जिसमें कई प्रकार के घी रखें हैं जो अमेरिका में ही बनाये गए हैं.

खाने में शुद्धता बनाए रखना जरूरी है। बाजार के सरसों तेल या घी पर मुझे विश्वास नहीं होता। लेकिन options होते हुए भी आज की तेज जिन्दगी में आसान नहीं रहता। मैं कभी कभी कर भी लेता हूँ । सरसों खरीदकर मिल में निकलबा लेता हूँ। एकबार ही अरहर ,चना ,मसूर इत्यादि खरीदकर दाल तैयार करवा देता हूँ जो चलता रहता है। एकबार ऐसा करके देखें । दाल की सुगंध दूरतक जाएगी लेकिन बाजार बाली दाल वैसा सुगंध कभी नहीं देगी।

खाना बनाने में लोग देसी ‘घी’ का इस्तेमाल कम क्यों करते है?

अगर घी शुद्ध है और इसमें मिलावट नहीं है तो यह सेहतकारी है. इसीलिए भारत में खिचड़ी, दाल आदि में घी को ऊपर से भी डाला जाता है. घी का धूम्र बिन्दु या smoking point 252° C है जो अमूमन सभी प्राकृतिक तेलों के धूम्र बिंदु से ज्यादा है. इसका सरल मतलब ये है कि घी को तेज आंच पर इस्तेमाल करने पर भी यह ख़राब नहीं होता. इसलिए भी इसको सेहत के लिहाज से अच्छा माना जाता है. ध्यान रहे कि जहाँ थोडा घी सेहत के लिए अच्छा हैं वहीँ अधिक घी, बल्कि घी ही क्यों कोई भी चिकनाई, बहुतायत में खाना नुकसानदेह है.

घी का प्रयोग कम क्यूँ हो गया है

आजकल सेहत की बात इसलिए ज्यादा होती है क्योंकि आम लोगों के जीवन में मशीने ज्यादा हैं जिससे सुविधा बढ़ी है लेकिन शारीरिक श्रम कम हो गया है. इसीलिए खाने में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं इस पर ज्यादा जोर दिया जाता है. उदहारण के तौर पर, अगर 30-40 साल पहले आप घी से बने लड्डू, जलेबी, और बहुत कुछ पचाने की क्षमता रखते थे तो आज नहीं. मुझे याद है हमारी दादी चक्की से गेहूं, दलिया, बेसन आदि पीसती थीं. सब्जी मंडी पैदल जाती थीं राशन लेकर वापस पैदल आती थीं, आदि….जो हम नहीं करते तो हम फिर इतना घी कैसे हजम करेंगें. यही वजह है कि अब घी को थोडा कम खाने को कहा जाता है. जो कि अच्छी बात है.

घी के विकल्प के तौर पर जैतून के तेल का प्रयोग क्या सही है?

आजकल अचानक जैतून का तेल (olive oil) का नाम भारत में बहुत बढ़ गया है. जैतून का तेल बहुत गुणकारी है और ऐसा माना जाता है कि इसका प्रयोग सेहत के लिए अच्छा है. घी और जैतून के तेल में सबसे बड़ा अंतर यह है कि घी दूध से बनता है, जबकि जैतून का पेड़ ठन्डे देशों में होता है और जैतून का तेल जैतून के फल से निकाला जाता है. जैतून के तेल के इस्तेमाल से पहले आप कुछ बातें अच्छी तरह समझ लें- पहली बात तो ये है कि जैतून के तेल में भी लगभग उतनी ही कैलोरी हैं जितनी कि घी में.

दूसरी बात ये है कि जैतून का तेल में भी वसा (fat) है, लेकिन इसमें असंतृप्त वसा (monosaturated fat) अधिक है जबकि घी में संतृप्त वसा (saturated fat) अधिक है. हमारे शरीर के लिए असंतृप्त वसा से आयी कैलोरीज को संतृप्त वसा से आयी कैलोरीज के मुकाबले घटाना आसान होता है क्योंकि असंतृप्त वसा जमती नहीं है. इस एक बात को लेकर बहुधा कह दिया जाता है कि “घी में बहुत अधिक संतृप्त वसा है और ये सेहत के लिए हानिकारक है”. लेकिन ये वैज्ञानिक तथ्यों को पूरी तरह से न जानना हुआ. घी की वसा से सम्बंधित सबसे अच्छी जानकारी और खूबी ये है कि घी में पाई जाने वाली संतृप्त वसा सुपाच्य होती है (small chain fatty acid). आधुनिक शोध भी यही इंगित करती है.

तीसरी बात ये कि तलने के लिए घी के स्थान पर आप जैतून के तेल का प्रयोग बिलकुल भी नहीं कर सकते. ऐसा इसलिए क्योंकि घी का धूम्र बिंदु 252° जबकि जैतून के तेल का लगभग 200° C है.

चौथी बात है खाने में इस्तेमाल की – जैतून के तेल कई प्रकार के हैं, जिनमें एक्स्ट्रा वर्जिन (extra virgin) और वर्जिन (virgin) को ही अच्छा और स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना जाता है. अब ये एक्स्ट्रा वर्जिन क्या होता है? जैतून के फल से जो सबसे पहला तेल निकाला जाता है उसे ही एक्स्ट्रा वर्जिन तेल कहते हैं. यह रिफाइंड नहीं होता है और इसे बनाने में किसी भी रूप में किसी केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. यह तेल तभी फायदेमंद है जब आप इसे कच्चा खाएं. अमूमन इसे सलाद, ब्रेड के साथ , सूप आदि में कच्चा डाल कर खाया जाता है.

मिक्स एंड मैच खाना 

यहाँ मिक्स वेज सूप, सूजी का उपमा, इतालवी ब्रेड फोकेच्या और साथ में कटोरी में जैतून का तेल, जिसमें नमक और काली मिर्च डली है, परोसा गया है. यह हमारी सुपुत्री का पसंदीदा खाना है. मैं अपनी रसोई में एक्स्ट्रा वर्जिन जैतून के तेल को सलाद, सूप, ब्रेड के साथ कच्चा ही प्रयोग करती हूँ या फिर वर्जिन जैतून के तेल को पास्ता, पिज़्ज़ा आदि में डालती हूँ. मैं भारतीय खाने में जैतून के तेल का प्रयोग नहीं करती.

अब बात करते है स्वाद की – जहाँ घी में एक मधुर खुशबू होती हैं वहीं जैतून के तेल की खुशबू तीक्ष्ण होती है. एक बार एक फ्रेंच दोस्त ने, जो भारतीय खाने से बहुत प्रभावित है, गाँव वाली स्टाइल में खाना खाएँ । जैसे मक्के की रोटी, साग , चना ,मक्के का भूँजा, सत्तू , दाल भरी ,आलू भरी रोटी, कई अनाजों को पीसकर बने आंटे की रोटी ।

लोगों ने घी कम क्यों कर दिया तो सीधा उत्तर है बाज़ार में अनेकानेक घी तेल उपलब्ध हो गए तो ग्राहक और दुकानदार भी ज्ञान वर्धक हो गए अब कौन किसकी सुनता है? बिना कारण लोग जैतून तेल खा रहे हैं क्योंकि कहावत है धन की तीन गति दान भोग और नाश।

मै पिछले पंद्रह वर्षो से जैतून का तेल खाने और मालिश में उपयोग कर रहा हूँ भारत में केवल फिगारो ही उपलब्ध था अब कितने ब्रांड आ गए। बेशक जैतून एक अच्छा तेल है पर सलाद में डालकर मसाला रोटी में चुपड़कर और कभी-कभी कोई सब्जी बघारकर खा सकते हैं।

जैतून का तेल चार प्रकार का होता है :-

  • एक्स्ट्रा वर्जिन
  • वर्जिन
  • रिफाइंड
  • पॉमेस

पौषण के आधार पर एक्सट्रा वर्जिन सबसे बेहतर स्तर का होता है। इसमें पर्चुर मात्रा में पौषक तत्व होते हैं।इसे बिना किसी रसायन के प्राकृतिक तरीके से बनाया जाता है। यह मंहगा भी मिलता है।इसका ज़्यादा फायदा तभी मिलता है जब इसे कच्चा खाया जाता है जैसे कि सलाद के ऊपर डालकर। भारतीय खाना बनाने के लिए यह उपयुक्त नहीं है क्योंकि बायह बहुत जल्दी गरम हो जाता है जिससे इसके सारे पौषक तत्व जल जाते हैं।

वर्जिन जैतून का तेल भी प्राकृतिक तरीके से बनाया जाता है लेकिन इसमें एक्स्ट्रा वर्जिन के मुक़ाबले अमलता ज़्यादा होती है और गुणवत्ता कम। इसे सब्जी इत्यादि बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन तलने के लिए यह उपयुक्त नहीं।

तीसरा है रिफाइंड जैतून का तेल जो कि बाज़ार में ज़्यादातर उपलब्ध रहता है। इसे कृत्रिम तरीके से मशीनों का प्रयोग कर के तथा रसायन डालकर बनाया जाता है।इसे भी भारतीय खाना बनाने के लिए उपयोग कर सकते हैं लेकिन जैतून तेल जिन फायदों के लिए खाया जाता है वो फायदे इससे आपको नहीं मिलनेवाले।

पोमेस तेल सबसे निम्न स्तर का होता है। इसे जैतून का तेल निकलने के बाद उसके बचे खुचे छिलकों, बीजों इत्यादि से मशीनों द्वारा निचोड़ कर बनाया जाता है। इसे खाना बनाने के लिए ना ही इस्तेमाल किया जाए तो बेहतर। इसलिए अगर जैतून के तेल का पूरा पूरा फायदा उठाना है तो उसे देसी घी की तरह खाने के ऊपर से डालकर खाएं।

भारत में प्रांत के अनुसार तेल खाये जाते हैं और तेल भी कई तरह के हैं। घी में भी विविधताऐं हैं गाय भैस के दूध का घी और वनस्पति घी। बात का निचोड़ है यदि घर में अकेले हो तो अपनी लिपिड प्रोफाइल में किस फैट की अनुकूलता है वो फैट अर्थात घी तेल खाना शुरू कर देना चाहिए पर यदि संयुक्त परिवार है तो अपने प्रांत अनुसार परम्परागत तेल से तलो बघारकर और रोटी दाल चावल हलुआ आदि शुध्द घी से खाना चाहिए सलाद में एक्सट्रा वर्जिन ऑलिव ऑइल डालकर खाएं।