दिल्ली सरकार व एलजी के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने लिखा ब्लॉग

शेयर करें:

अधिकारों की जंग लेकर दिल्ली सरकार की अपील पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गुरुवार को केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने फेसबुक पर ब्लॉग लिखकर सर्वोच्च अदालत के फैसले के बारे में विस्तार से समझाते हुए इस बारे में अपना तर्क दिया.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या करते हुए अरुण जेटली ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान में निहित संवैधानिक सिद्धांत की विस्तार से व्याख्या करता है और साथ ही संविधान में जो लिखा हुआ है उसकी पुष्टि करता है. जेटली के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले से न तो राज्य सरकार या केंद्र सरकार के अधिकारों में इजाफा हुआ है और न ही किसी के अधिकारों में कटौती हुई है. यह फैसला चुनी गई सरकार के महत्व को रेखांकित करता है. लेकिन दिल्ली संघ शासित प्रदेश है इसलिए इसके अधिकार केंद्र सरकार के अधीन हैं.

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ये फैसला संविधान के आर्टिकल-239एए की भी व्याख्या करता है जिसमें राष्ट्रीय हितों के मसले में केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार पर प्राथमिकता दी गई है. इससे ये भी साफ है कि राज्यपाल राष्ट्रीय राजधानी में राष्ट्रीय चिंताओं का संरक्षण करने के लिए वाचडॉग की भूमिका में हैं. जेटली ने कहा है कि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन पर सीधे टिप्पणी नहीं की गई है.

कोई यह नहीं कह सकता कि ऐसे मुद्दों पर चुप्पी का मतलब है कि मत एक या दूसरे के पक्ष में है.

जेटली ने फैसले का अर्थ समझाते हुए कहा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ हो गया है कि दिल्ली सरकार के पास पुलिस का अधिकार नहीं हैं, ऐसे में वह पूर्व में हुए अपराधों के लिए जांच एजेंसी का गठन नहीं कर सकती. दूसरी बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली अपनी तुलना अन्य राज्यों से नहीं कर सकती. ऐसे में यह कहना कि संघ शासित कैडर सेवाओं के प्रशासन को लेकर दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया गया है, पूरी तरह गलत है.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने बुधवार को फैसला दिया था कि संविधान के मौजूदा प्रावधानों के तहत दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता. उप-राज्यपाल को चुनी हुई सरकार की मदद और सलाह से काम करना है. जेटली ने भी ब्लॉग में कहा है कि कि सामान्य तौर पर लोकतंत्र तथा संघीय राजनीति के हित में उप-राज्यपाल को राज्य सरकार के काम करने के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए.

लेकिन यदि कोई ऐसा मामला है जिसकी सही वजह है और जिसमें असहमति का ठोस आधार है तो उप-राज्यपाल मामले को राष्ट्रपति (अर्थात केंद्र सरकार) को भेज सकते हैं. जिससे उप-राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच किसी मामले में मतभेद को दूर किया जा सके. ऐसे मामलों में केंद्र का निर्णय

उप-राज्यपाल और दिल्ली की निर्वाचित सरकार दोनों को मानना होगा. इस तरह केंद्र की राय सबसे बढ़ कर है. जेटली के मुताबिक कोर्ट का फैसला चुनी हुई राज्य सरकार की राय को पूरी अहमियत देता है लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के व्यापाक हित में केंद्र सरकार की सर्वोच्चता को भी स्वीकार करता है. कोर्ट के फैसले से साफ है कि चुनी सरकार, एलजी और केंद्र सरकार को राष्ट्रीय राजधानी और वहां के लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए मिलकर सौहार्दपूर्ण ढंग से काम करना चाहिए.