कश्मीर में फिर लौट रहा है थियेटर

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बीते दिनों कश्मीर में थियेटर फेस्टिवल के सफल आयोजन ने कश्मीर में थिएटर आंदोलन के पुनरुद्धार की आशा को फिर से जीवित किया है

कश्मीरी थिएटर या स्थानीय परंपराओं की एक समृद्ध परंपरा जो सदियों पुरानी है,लेकिन पिछले दशकों में बंद और हड़ताल दौरान, थियेटर की आज़ादी प्रभावित हुई है, क्रियेटिव कलाकार हाशिये पर आ गए हैं,लेकिन अब थिएटर की बहाली के लिए तहरीक शुरू कर दी गई है।

रंगमंच पर नाटक ही विधा और कला है, जिसमें हमारी जिंदगी का असली चेहरा नजर आता है।कश्मीर पुराने ज़माने से नाटक और थिएटर के लिए मशहूर है।आठवीं शताब्दी से पंद्रहवीं शताब्दी तक कश्मीर के आर्ट ने बहुत तरक़्की की,पंद्रहवीं शताब्दी में सुलतान जैनुल आबदीन ने कश्मीरी फनकारों की खूब हौसला अफजाइ भी की।

लेकिन हालिया दिनों में 1989 से कश्मीर में जारी हालात के दौरान थिएटर में एक ठहराव सा आ गया था।सारे सिनेमा हाल बंद कर दिए गए,हालांकि, तमाम कठिनाइयों के बावजूद, कश्मीरी लोक थियेटर स्थानीय लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए हैं।

बीते दिनों कश्मीर में थियेटर फेस्टिवल के सफल आयोजन ने कश्मीर में थिएटर आंदोलन के पुनरुद्धार की आशा को फिर से जीवित किया है, जो पिछले कई वर्षों से निष्क्रिय रहे हैं।

युवा बंद और तशद्दुद के दौरान ज़िन्दगी की हक़ीकत,अपनी परंपरा और तहज़ीब से भी दूर होते जा रहे हैं।सालों बाद युवा पीढ़ी ने कश्मीर में अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का अनुभव किया है।

थिएटर पुराने ज़माने से ही समाज को संदेश देने का काम करती रही है।एक दूसरे के बीच संवाद बनाने का काम करता है।संगीत,नाटक और नृत्य भारत की बहुमु्ल्य विरासत है। मानव जाती की सांस्कृतिक विरासत के प्रति योगदान के रुप में इसका विकास ज़रुरी है।