दूरदर्शन के कार्यक्रमो में वह सादगी जो आज के कार्यक्रम में देखने नहीं मिलेगी, यहाँ पढ़ें और देखें भी

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दूरदर्शन का प्रभाव 80 व 90 के दशक के दर्शकों पर ज्यादा दिखता हैं, क्योंकि उस समय और दूसरा विकल्प न था। बचपन में सुबह सुबह सभी रामायण या महाभारत देखते थे, और फिर द जंगल बुक या शक्तिमान कौन भूल सकता हैं। फिर एक दौर चला नए चैनलों का, जिसमे दूरदर्शन कहीं खो से गया।

आज भी दूरदर्शन की सबसे बेहतरीन कार्यक्रम हैं ब्योमकेश बक्शी। इसके अलावा गुलज़ार साहब द्वारा निर्देशित ‘तहरीर…मुंशी प्रेमचंद की’ और ‘किरदार’ बहुत सुंदर कार्यक्रम लगे। आर के नारायण जी की किताब ‘मालगुडी डेज़’ और नेहरू जी की किताब ‘Discovery of India’ पर आधारित कार्यक्रम भी अच्छे बने थे।

दूरदर्शन के कार्यक्रमो में वह सादगी मिली जो आज के कार्यक्रम में नहीं मिलती। वह TRP के लिए नहीं बल्कि ज्ञान के साथ मनोरंजन पर ध्यान रख कर बनाये गए कार्यक्रम थे। सोचिये, जो पढ़ लिख नहीं सकते थे, उनके लिए, ‘तहरीर’ या ‘भारत एक खोज’ किसी ख़ज़ाने से कम न था। ‘ब्योमकेश बक्शी’ जो कि बंगला भाषा मे लिखी गयी उसे अनुवाद कर पढ़ने से कहीं बेहतर एक कार्यक्रम था।

वैशाली शुक्ला बताती है मुझे दूरदर्शन के बहुत से कार्यक्रम अच्छे लगते है ।बचपन में मुझे तीन कार्यक्रम बहुत पसंद जिन्हें में हर हाल में देखती थी। वो तीन कार्यक्रम हैं। गली गली सिमसिम, चंद्रमुखी, शक्तिमान – “शक्तिमान देखने के लिये तो हम लोग पागल थे शक्तिमान शुरू होने के 5 मिनट पहले ही हम लोग टीवी के पास बैठ जाते थे और अक्सर यह होता था कि लाइट चली जाती थीं। तो इसके लिए हम लोगों ने पिता जी से बैटरी लाने के लिए कहा पिताजी मान गए पर उन्होंने एक शर्त रखी कि वो बैटरी तुम्ही लोग चार्ज करवा कर लाओगे मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी बड़े भैया के कहने पर हम लोगो ने शर्त मान ली। फिर शक्तिमान शुरू होने से पहले मैं और मेरा भाई बैटरी लेने पहुंच जाते और दोनों लोग बैटरी पकड़ कर घर लाते इतनी वजन बैटरी थी की हम लोग उसे रास्ते में 8 ,10 बार जमीन पर रखते फिर उठाते जहाँ से हम लोग बैटरी लाते थे वो घर ज्यादा दूर नहीं था मेरे घर के दो घर आगे था ।पर तब हम लोग बहुत छोटे थे दूसरी क्लास में पढ़ते थे। घर तक बैटरी लाते लाते हाथों में जलन होने लगती थी। हाथों को फूंक फूंक कर शक्तिमान देखते थे। घर पर किसी को बताते नहीं थे कि हाथों में जलन हो रही है। क्योंकि शक्तिमान देखने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे ।जब तक शो समाप्त होता था हाथों की जलन भी समाप्त हो जाती थी।

सबसे उत्तम दूरदर्शन के कार्यक्रम यह रहे क्लिक करें और देखें :

नीरज कुमार बताते है सभी की अपनी अपनी पसंद होती है हो सकता है आप के धारावाहिक इस सूची में ना हो पर इसका ये मतलब नहीं के मुझे वो पसंद नहीं। मेरे सब से प्रिय धारावाहिक यही रहे है। देखिये दूरदर्शन का मेरे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव रहा है, जब बहुत सारे चैनल नहीं थे तो सिर्फ दूरदर्शन ही ऐसा चैनल था जो मनोरंजन का जरिया था। एक दो नहीं बहुत से बेहतरीन कार्यक्रम थे जो दूरदर्शन पर प्रकाशित होते थे। उनमें से किसी एक को चुनना मुश्किल होगा फिर भी मैं कुछ बेहतरीन और खासकर के मेरे पसंदीदा कार्यक्रमों की बात बताने की कोशिश करता हूँ।

१.मालगुडी डेज

यह धारावाहिक मेरे दिल के सब से करीब रहा है, स्वामी और उसके दोस्तों की कहानी देखने को बनती है। कैसे स्वामी अपनी मासूमियत और बेवकूफी से अपने दोस्तों और हम सब के दिल में घर कर लेता है पता ही नहीं लगता। सब से अच्छी बात ये है के यह धारावाहिक आज भी YouTube पर उपलब्ध है। मुझे जब भी समय मिलता है मैं इसे देखने के लिए समय निकाल ही लेता हूँ।

२. रामायण

हमारे देश में आज अनगिनत भक्ति धारावाहिक बन रहे है पर जो स्थान इस धारावाहिक ने हमारे दिल में किया वो कोई और नहीं कर पाया। रामायण ही ऐसा धारावाहिक था जिसे देखने के लिए हमने टीवी ख़रीदा था। इस धारावाहिक के किरदार लोगों में ऐसे बस गए थे के जैसे साक्षात भगवान राम सीता सामने खड़े थे। मेरी माँ अपना सारा काम सिर्फ इस लिए जल्दी खत्म कर लेती थी के इस धारावाहिक को देख सके।

३.महाभारत

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ इस श्लोक के साथ इस धारावाहिक की शुरुआत होती है। इस धारावाहिक के कारण ही बहुत से लोगों को महाभारत की कथा के बारे में जानकारी मिली। नितीश भारद्वाज जी का भगवान श्री कृष्णा का वो रूप आज भी हमारी यादों में ताज़ा है।

४. शक्तिमान

मुझे आज भी याद है हर रविवार सुबह 11 बजे हम कैसे टीवी के साथ चिपक जाया करते थे। हमें रविवार का इंतज़ार छुट्टी के लिए नहीं सिर्फ शक्तिमान के लिए होता था। जैसे ही धारावाहिक खत्म होता था बच्चे गलियों में शक्तिमान शक्तिमान चिल्लाते हुए बाहर निकलते थे। मुकेश खन्ना जी को हम आज भी शक्तिमान ही कह के बुलाते है।

५. सत्यावेशी ब्योमकेश बक्षी

मेरे पिता जी आज भी कहते है जासूस हो तो ब्योमकेश बक्षी जैसा हो वरना ना हो। मैंने यह धारावाहिक बचपन में तो नहीं देखा जब मैंने देखा इसका दीवाना हो गया। बिलकुल साधारण तरीके से बनाया गया ये धारावाहिक देखने में बहुत ही पसंदीदा है मेरा और क्यों के यह आज भी YouTube पर उपलब्ध है तो आप इसे आज भी देख सकते है।

६. मोगली द जंगल बुक

“चड्ढी पहन के फूल खिला है” गीत के साथ इस धारावाहिक की शुरुआत होती थी। बच्चों के बीच में ये धारावाहिक हद से ज्यादा प्रसिद्द था और मेरा तो आज भी है। इसमें शेरखान की आवाज़ नाना पाटेकर जी ने दी थी जो सुनने में इतनी अच्छी लगती थी साथ में डराती भी थी। जब भी मोगली शेरखान से अपनी जान बचा के निकल जाता था जितनी ख़ुशी हमें होती थी उतनी तो मोगली को कभी खुद नहीं हुई होगी। उस समय बहुत ही अजीब लगता था जब सब जानवर बात करते थे इस धारावाहिक में, पर खुशियाँ तो इसे देखकर ही आती थी।

७ फ्लॉप शो

आज वर्तमान में जहाँ घटिया से घटिया धारावाहिक 1000 एपिसोड तक चल जाते है वह फ्लॉप शो जैसा बेहतरीन धारावाहिक सिर्फ 10 एपिसोड तक ही चला। स्वर्गीय जसपाल भट्टी जी का किरदार उस समय बहुत ही हंसाता था। आप इसे भारत के सब से बेहतरीन हास्य धारावाहिकों में गिन सकते है वो भी बिना किसी शक के।

विशाल शुक्ला बताते है -रामायण और महाभारत इस कार्यक्रम को पूरा परिवार एक साथ देखता है।रामायण एक बहुत ही सफ़ल भारतीय टीवी श्रृंखला है, जिसका निर्माण, लेखन और निर्देशन रामानन्द सागर के द्वारा किया गया था। ७८-कड़ियों के इस धारावाहिक का मूल प्रसारण दूरदर्शन पर 25 जनवरी, 1987 से 31 जुलाई, 1988 तक रविवार के दिन सुबह 9:30 किया जाता था। अंतिम एपिसोड: 31 जुलाई 1988

क्या आप इन्हें जानते है। इनका नाम गंगाधर है। और इनमें एक रहस्य छिपा हुआ था। और रहस्य यह था कि यही शक्तिमान थे।महाभारत जो मुझे अब भी पसन्द है। इसके किरदार बहुत ही अच्छे लगते हैं। जैसे अर्जुन ,कृष्ण, भीष्मपितामह आदि किरदारों ने मुझे अत्यंत प्रभावित किया है। शायद आपको भी करते होंगे।

ऋचा शर्मा कोंडी बताती है -दूरदर्शन का पहला प्रसारण (15 सितम्बर 1959) को प्रोगात्मक आधार पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया था उस समय दूरदर्शन का प्रसारण केवल सप्ताह में तीन दिन होता था उस समय इसका नाम “टेलीविजन इंडिया” रखा गया था जोकि बाद में 1975 में बदल कर “दूरदर्शन” कर दिया गया।

1982 में दिल्ली में आयोजित एशियन खेलों के प्रसारण के कारण ही ब्लैक और व्हाइट में दिखाई देना वाला “दूरदर्शन” रंगीन हो गया और तब फ़िर दूरदर्शन ने अपना प्रथम परिवारिक कार्यक्रम “हम लोग” को प्रसारित किया जोकि लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचा।

1980 के आसपास फ़िर आया भारत और पाकिस्तान के विभाजन पर बना कार्यक्रम जिसने लोगों की अंतरात्मा तक को झंझोर दिया था “बुनियाद” इस कार्यक्रम ने लोगो के दिलों को छु लिया था, 1980 से 1990 के दशक में बने कुछ बेहतरीन लोकप्रिय कार्यक्रम बुधवार से शुक्रवार तक रात 8 बजे दिखाए जाने वाले जो इस प्रकार है- मालगुडी डेज़ , चित्रहार और रंगोली, भारत एक खोज, व्योमकेश बख्शी, विक्रम बेताल, अलिफ़ लैला, फ़ौजी, रामायण, महाभारत, गंगा मैया, विष्णु पुराण, बच्चो के लिए जैसे शक्तिमान, जूनियर G, जंगल बुक,चंद्रकांता, टेलस्पिन, डक टेल्स, अलादीन, ऐलिस इन वंडरलैंड आदि. टर रम टू एक मजेदार कार्यक्रम था जिसका उद्देश्य मनोरंजन के साथ शिक्षा देने का था.

शांति 1994 में प्रसारित ( एक औरत की कहानी), आंखें, श्रीमान श्रीमती ,आपबीती, आंखो देखी, मुंगेरी लाल के हसीन सपने, सर्कस, राजा रेंचो, हेल्लो इंस्पेक्टर, कैप्टन व्ह्योम, कृषि दर्शन, वागले की दुनिया, सी हॉकस, सर्कस, आदि कितने ही मज़ेदार और शिक्षित कार्यक्रमों से पूर्ण था हमारा दूरदर्शन जोकि आधुनिक दुनिया हेतु दूषित हो गया हैं।