चम्बल के बीहड़ो के सरताज डाकू मान सिंह- “हम धन लूटते है इज्जत नहीं”

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हा जाता है कि पुराने लोग सत्यवादी और धर्मनिष्ठ हुआ करते थे। नैतिकता उनके ज़हन मे कूट कूट के भरी होती थी और वे अपने सिद्धान्तों से समझोता नही करते थे चाहे इसके लिए उनकी जान ही क्यों न चली जाए। ऐसा ही एक वाक्या डाकू मान सिंह का है।जिसके बारे मे कहा जाता है कि लूट और डकैती के माल को वः गरीबों, असहायों और लाचार लोगों मे बांटा करता था।

एक तरह से ये ही उसके कर्मों का पश्चाताप भी था। दुर्दांत डाकू मान सिंह का चम्बल और भारत के कई राज्यों मे डंका बजता था।आज भी उसके किलों के सबूत खंडहर के रूप मे मिल जाते हैं। एक बार आगरा में डकैती करने गए सेठ को डाकू नान सिंह ने पहले सूचना भेज दी गयी थी (उस समय डकैती करने से पहले सूचना चिठ्ठी के द्वारा भेज दी जाती थी) डाकू मान सिंह के आने की सुचना की भनक लगते ही अंग्रेजो का कप्तान छुट्टी लेकर आगरा से भाग गया ।

तय समय पर डाकू मान सिंह अपनी फौज के साथ सेठ के घर पहुच गया और उसके बैठक में बैठ गया। सेठ ने तिजोरी की सभी चाभियां मान सिंह को दे दी और विनती करके बोला कि मेरी चार जवान बेटिया घर में है इनकी इज्जत मत लूटना !!!

मान सिंह ने कहा हम धन लूटते है इज्जत नहीं । इसी बीच एक डकैत ने सेठ की एक बेटी से छेड़खानी कर दी। लडकी चिल्लाने लगी.. लडकी की आवाज सुनकर सेठ घर के अंदर की ओर भागा । पिता को आता देख बेटी ने कहा एक डकैत ने मेरे साथ छेड़खानी की है।

कहते है सेठ ने ये बात जैसे ही डाकू मान सिंह को बताई, मान सिंह ने सारे गिरोह को लाइन में खड़ा होने को कहा और सेठ की लड़की को अपने पास बुलाया और पूछा बोले बेटी पहचान कौन था जिसने तेरे साथ छेड़छाड़ की ।जैसे ही लड़की ने डाकू को पहचाना मानसिंह ने डाकू को गोली मार दी। इतना ही नही डाकू मान सिंह ने अपना वादा तोड़ने पर उस सेठ से माफ़ी मांगी और लूट का सारा सामान उसके घर में छोड़कर साथी की लाश लेकर लौट गए।

ये था भारत के डकैतो का चरित्र…… आज सम्माज के नब्बे प्रतिशत तथाकथित सफ़ेद पोश राजनैतिक लोगों ने समाज के लिए राजनीती करने को व्यवसाय बना डाला है जो उनके और उनके कुटुंब के लिए एक लाभ का श्रोत बन गया है जिसमे रसूक के साथ साथ कानूनों को जेब मे रखकर चलने का अधिकार भी सामिल हो गया है। भारत के कई गाँव देहात आज भी आज़ादी के 68 सालों बाद बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए महरूम है। पर मानो राजनेताओं ने तो नैतिकता को गिरवी रखकर ही राजनीती मे प्रवेश पाया है।

समाज के द्वारा चुने चुन कर भेजे इन डकैतो ने अपनी सारी हदें पार कर दी है। बेटी की चीखे आज भी बुलंदशहर के वीराने में गूंज रही है, कोई उस चीख को सुनना नहीं चाहता कोई उन हैवानो के खिलाफ नहीं बोल रहा है राजनैतिक अराजकता सर चढ़ कर बोल रही है। और भी न जाने ऐसी कितनी ही घटनायें समाज मे रोज घटित हो रही है पर किसी को सरोकार हो तब जानें कोण कितने पानी मे है, सब मुह छुपाये बैठे है।

इन घटनाओ से कभी कभी लगता है कि आज़ाद भारत के राजनेताओं का चरित्र पतन कितनी तेज़ी से हुआ है।प्रश्न उठता है कि क्या ये विनाश के लक्षण नही है क्या इस कार्यशैली से भारत का लोकतंत्र जीवित रह पायेगा। ये सवाल समाज के लिए भी उतना ही यक्ष है जो घटिया राजनीती के लिए वोट बैंक होने का क़र्ज़ निभा रहा है।