योग की निरंतरता से आती है सकारात्मकता सृजनात्मकता – योग गुरु महेश अग्रवाल

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आदर्श योग आध्यात्मिक केन्द्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने निरंतर ऑनलाइन माध्यम से 500 दिन एवं 1000 घंटे से अधिक निःशुल्क योग प्रशिक्षण देने के अवसर पर बताया कि इस निरंतरता के लिए मध्यप्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री मंगूभाई पटेल ने बधाई दी एवं कहा कि यदि सभी लोग योग करें तो स्वस्थ रहते हुए सब मिलकर प्रदेश के देश के विकास में योगदान दें सकते हैं, योगाचार्य डॉ. फूलचंद जैन योगीराज, श्री कुलशेकारन शेषाद्री ,आर. एन. पाठक, डॉ. नरेन्द्र भार्गव, सरिता अशोक देशमुख,संगीता सतीश जोशी, स्मिता पाल सिंह कानपुर, शिमला शेखर शर्मा, खंडवा से वरिष्ठ लेखिका पुष्पा शर्मा, प्रिंसिपल डॉ. अनुपमा शर्मा छतरपुर, सुठालिया से महेश अग्रवाल, किरण अग्रवाल, बेल्जियम एंटवर्प से डन्ना डो सहित पुरे देश और विदेश से योग प्रशिक्षण में जुड़े गुरुजनों एवं योग साधकों ने हर्ष के साथ शुभकामनायें भेजी |

योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि सांसारिक मनुष्य का जीवन एक अनवरत यज्ञ है। घर के चूल्हे को जलाये रखने तथा अपने सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने के निमित्त किये गये कार्य उस यज्ञ की आहुतियाँ हैं। एक बार यह सत्य समझ में आ जाये तो अपने जीवन स्थिति के अनुसार अहर्निश कठिन श्रम के मध्य भी व्यक्ति के जीवन में आत्म-साक्षात्कार की झलक को प्रखर रखा जा सकता है।

जीवन के संघर्ष में अनवरत चल रहे क्रियाकलाप अपना प्रभाव डालते ही हैं। चिन्ता, निराशा, शरीर और मन की थकान, सभी मिल कर वृद्धावस्था की गति को ही तीव्र करते हैं। इन विनाशकारी शक्तियों के विरुद्ध योग एक सशक्त उपाय है। कोई अवस्था भी योग साधना में बाधक नहीं है। चाहे व्यक्ति जीवन की दहलीज पर हो, अपनी युवावस्था में हो या जीवन के अन्तिम चरण की ओर अग्रसर हो, वह योगाभ्यास सीख सकता है, कर सकता है। योगाभ्यास के लिए कोई प्रतिबन्धक तत्त्व नहीं है।

भारतीय शास्त्रों में वर्णित अष्टांग योग ही एकमात्र योग नहीं है। नियमित रूप से किये जाने पर आसन, प्राणायाम, जप, नादयोग और त्राटक जैसे सरल अभ्यास भी उतने ही प्रभावशाली हैं। कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग, ज्ञानयोग, योग के विभिन्न पक्ष हैं। संगीत भक्तियोग का अभिन्न अंग है, दमित भावनाओं और उत्तेजित मन पर इसका शान्तिप्रद प्रभाव होता है। इतनी दूर क्यों जायें? जीवन स्वयं ही योग है। हमारे दैनिक कर्म ही योग हैं। इसका क्षेत्र विशाल और आकर्षक है। आइये, योग के स्पन्दन एवं रोमांच के द्वारा अपने जीवन के सभी क्रियाशीलनों को रूपान्तरित होने दें।

योग असम्भव सद्गुणों को उत्पन्न करने में रुचि नहीं लेता। अच्छा हो हम उन्हें नैतिकतावादियों के लिए ही छोड़ दें। योग एक विवेकपूर्ण विज्ञान है, जिसमें अशान्त मन को शान्त करने, शारीरिक एवं मानसिक ऊर्जाओं का उपयोग करने और उनमें लचीलापन बनाये रखने की विधियाँ हैं। संक्षेप में योग का लक्ष्य है-एक समन्वित व्यक्तित्व का विकास। मनुष्य को बुद्धिसम्पन्न ही नहीं होना है, और न उसे पूरी तरह से भावनाप्रधान ही होना है। दोनों का सुखद संयोग होना चाहिए, अन्यथा जीवन में शान्ति नहीं रह पायेगी।

योग शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह संस्कृत की युज् धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है जोड़ना या एक करने की क्रिया। योग का अर्थ है जुड़ना, एकात्मता। सबके सुख-दुःख से जुड़े। अपने हृदय को उदार बनायें और जीवन की क्षुद्रताओं से ऊपर उठें। योग को यदि इस अर्थ में लें तो यह व्यक्तिपरक नहीं रह जाता। जैसे, माता और सन्तान में भावनात्मक एकात्मता रहती है उसी प्रकार अपने परिवेश के साथ भावनात्मक एकात्मता विकसित करें। लोग बड़े ऊँचे संकल्प करते हैं, आत्म-साक्षात्कार चाहते हैं, उच्चादर्शों का पालन करना चाहते हैं।

परन्तु इसमें एक ही अड़चन है, उनमें संकल्पशक्ति का अभाव है। संकल्प शक्ति के अभाव में न भौतिक उन्नति सम्भव है और न आध्यात्मिक। दुहरे व्यक्तित्व का विकास न करें-बाहर में लोगों के सामने संकल्प शक्ति का प्रदर्शन और एकांत में अपने दोषपूर्ण कर्मों में लिप्त रहना वास्तविकता और आदर्श का द्वन्द्व ।

क्या आपको सुखी और सामंजस्यपूर्ण जीवन अच्छा लगता है? क्या आप अपने दैनिक कार्य-कलापों में उत्साह से भरे रहते हैं? जब प्रतिकूल परिस्थितियाँ आपको झकझोर देती हैं, तब क्या आप शान्त मन और सहज भाव से अपना सिर ऊँचा रख पाते हैं? यदि नहीं, तो फिर योग की शरण में आइये। योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया प्रतिदिन सुबह 4:30 बजे से 6:30 बजे तक निःशुल्क ऑनलाइन योग प्रशिक्षण दिया जाता हैं |