मात्र 8 महीने की मेहनत से छत्तीसगढ़ की बेटियां बन गईं राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी

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मात्र 8 महीने की मेहनत और छत्तीसगढ़ की दो होनहार बेटियों ने बीजापुर के जंगलों से निकल कर चमकते स्टेडियम तक का सफ़र तय कर लिया। ये लड़कियां अपने हौसलों की दस्तां सुनाने को तैयार हैं। सुनीता और अरुणा का खेल के मैदान में पहला क़दम किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। इस कहानी में संघर्ष है,सपने हैं और एक मज़िल भी।

इन बेटियों के पैरों तले कभी जंगल की पथरीली ज़मीन हुआ करती थी। इनके हाथों में तेंदू पत्ता और महुआ थे और जीवन का मक़सद सिर्फ दो वक़्त की रोटी थी। लेकिन अपनी मेहनत और लगन से सुनीता और अरुणा ने अपनी ज़िन्दगी का फलसफ़ा ही बदल दिया। ये होनहार बेटियां अब राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं।

इन लड़कियों के सपनों को बुलंद किया ज़िले में खुले नए स्कूलों ने। ये स्कूल 8 महीने पहले एक उम्मीद बनकर आए। ज़िले में डे बोर्डिंग स्कूल अगस्त में ख़ास खेलों के लिए शुरू हुए। फिर क्या था इन लड़कियों ने अपने हौसलों को उड़ान दी और देखते ही देखते सॉफ्टवॉल की खिलाड़ी बनकर उभरीं।

इन कम दिनों के दौरान ही इनके नाम राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय 46 मेडल हैं। अपने दमदार प्रदर्शन की बदौलत ही अब ये फिलीपींस में खेले जाने वाली जूनियर एशियन चैंपियनशिप का हिस्सा होंगी। ये सुखद बदलाव की अब मिसाल हैं,सच है प्रतिभा को अगर सही दिशा मिल जाए तो कुछ भी मुमकिन है। ज़रुरत सिर्फ वंचितों,पिछड़ों और देश के दूर दराज़ के इलाक़ों तक सुविधाएं मुहैया कराने की है