कोरोना महामारी के बीच सामने आई ‘बोन डेथ’ नामक नई बीमारी, महाराष्ट्र के बाद अब दिल्ली में आए तीन मामले

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महाराष्ट्र के बाद अब दिल्ली में भी सामने आए बोन डेथ के तीन मामले। कोरोना महामारी के कहर के बीच अब नई-नई बीमारियां सामने आने लगी है। हाल ही में ब्लैक फंगस, व्हाइट और येलो फंगस के साथ हैप्पी हाइपोक्सिया और हर्पीज सिम्प्लेक्स जैसी बीमारियों के मामले सामने आ चुके हैं। इसी बीच अब एवेस्कुल नेक्रोसिस (AVN) यानी बोन डेथ के मामले सामने आए हैं। सोमवार को महाराष्ट्र में तीन मामलों की पुष्टि होने के बाद अब दिल्ली में इसके तीन मामले सामने आ गए हैं। इसने चिकित्सा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

आखिर क्या है ‘बोन डेथ’?
एवस्कुलर नेक्रोसिस को हड्डी के ऊतकों की मौत के रूप में जाना जाता है। इस बीमारी हड्डी तक पर्याप्त खून नहीं पहुंचने के कारण होती है। यह आमतौर पर फीमर या कूल्हे की हड्डी में होती है। खून की आपूर्ति नहीं होने से हड्डी के ऊतक मर जाते हैं। इससे नेक्रोसिस हो जाता है। शुरुआती चरण में किसी तरह के लक्षण नज़र नहीं आते हैं, लेकिन जब व्यक्ति प्रभावित जोड़ पर भार डालता है, तो गंभीर दर्द हो सकता है।

क्या होते हैं इस बीमारी के लक्षण?
हडि्डयों के जोड़ों में होता है बोन डेथ का सबसे अधिक खतरा। इस बीमारी में टिश्यू तक खून की आपूर्ति न होने के कारण हड्डियां गलने लगती हैं। शुरुआती चरण में इसके कोई लक्षण सामने नहीं आते, लेकिन हालत बिगड़ने पर कूल्हों, कंधों, घुटनों, हाथ और पैरों समेत शरीर में कई जगह दर्द होने लगता है। फिजियोथैरेपी, सर्जरी और दवाओं के सहारे इसका इलाज किया जा सकता है। बता दें कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान मरीजों के इलाज में स्टेरॉयड का इस्तेमाल बढ़ा था।

मुंबई में सामने आए थे तीन मामले
सोमवार को मुंबई के माहिम स्थित हिंदुजा अस्पताल में इस बीमारी के तीन मामले सामने आए थे। तीनों मरीजों की उम्र 40 साल से कम हैं और कोरोना संक्रमण से ठीक होने के दो महीने बाद ये इस बीमारी से पीड़ित पाए गए हैं। अस्पताल के निदेशक डॉ संजय अग्रवाल ने कहा कि इन मरीजों को जांघ की हड्डी (फीमर) के सबसे ऊपरी हिस्से में दर्द हुआ था। तीनों डॉक्टर हैं इसलिए लक्षण दिखते ही इलाज के लिए आ गए।

दिल्ली में भी सामने आए तीन नए मामले
महाराष्ट्र में तीन मामलों की पुष्टि होने के बाद मंगलवार को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के BLK सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में इस बीमारी के तीन मामले सामने आए हैं। तीनों की उम्र 32 से 40 साल के बीच है। इनमें दो का उपचार दवाइयों से किया जा रहा है, जबकि एक की सर्जरी की गई है। अस्पताल की चिकित्सा टीम तीनों मरीजों पर नजरें बनाए हुए हैं तथा उनके स्वास्थ्य की नियमित रूप से देखभाल की जा रही है।

स्टेरॉयड के अधिक इस्तेमाल से होता है ‘बोन डेथ’
चिकित्सा विषेज्ञज्ञों ने स्टेरॉयड के अधिक इस्तेमाल को बताया है बोन डेथ का प्रमुख हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार BLK अस्पताल के डॉ ईश्वर बोहरा ने कहा कि यह बीमारी स्टेरॉयड का अधिक इस्तेमाल के कारण होती है। ऐसे में कोरोना संक्रमित मरीजों को भी अधिक स्टेरॉयड दिया जाता है। ऐसे में उनके इस बीमारी के चपेट में आने का खतरा सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद भी लक्षण दिखने के कारण स्टेरॉयड की जरूरत पड़ी, उनके लिए यह चिंता की बात है।

हडि्डयों को कमजोर बनाता है स्टेरॉयड- बोहरा
डॉ बोहरा ने कहा कि स्टेरॉयड हडि्डयों को कमजोर बनाता है। इससे कार्टिलेज गिरने लगता है और हडि्डयों में खून की आपूर्ति बंद हो जाती है। उन्होंने कहा कि अभी तक के सभी मामलों में समय पर उपचार हो गया है। इसके इलाज में फिज़ियोथेरपी, ब्लड थिनर, दर्द से राहत के लिए गैर-स्टेरायडल दवाइयां और व्यायाम जरूरी होता हैं। गंभीर मामलों में सर्जरी की भी जरूरत पड़ती है। इस सर्जरी की लागत तीन-चार लाख रुपये होती है।