मानसिक रोगी एक मरीज हैं और इसी सोच को बदलने की जरुरत है

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माज में अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों को लेकर लोगों की सोच सबसे बड़ी रुकावट है इन मरीजों के सही वक्त पर सही इलाज ना मिलने का देश में बढ़ती मानसिक बीमारियों पर चिंता जताते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि मानसिक रोगी के प्रति समाज की सोच में बदलाव की जरुरत है। उन्होने कहा कि जिस तरह से मानसिक बीमारियां बढ़ रही है अगर वक्त रहते इस पर ध्यान नही दिया गया तो ये महामारी का रुप ले लेगी।

14 फीसद आबादी को तत्काल मानसिक उपचार की जरुरत है। सवा सौ करोड़ आबादी पर महज 5 हजार साईकेट्रिक और 2 हजार साइकोलॉजिस्ट हैं।

दिल्ली में मानसिक स्वास्थ्य पर आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया भर के पचास देशों के तीन सौ से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे है। समाज में अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों को लेकर लोगों की सोच सबसे बड़ी रुकावट है इन मरीजों के सही वक्त पर सही इलाज ना मिलने का। मानसिक रोगी एक मरीज है ना कि पागल ,इस सोच को बदलने की जरुरत है।

हर साल 2 लाख लोग मानिसिक बीमारी की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं। देश के दो फीसद आबादी गंभीर रुप से मानसिक बीमारी की शिकार है। 14 फीसद आबादी को तत्काल मानसिक उपचार की जरुरत है। सवा सौ करोड़ आबादी पर महज 5 हजार साईकेट्रिक और 2 हजार साइकोलॉजिस्ट हैं। ये बिडंबना ही है कि मानसिक बीमारी से ग्रस्त 90 फीसद लोगों को जरुरत पर उपचार नहीं मिल पाती।

हद तो तब होती है जब लोग इस पर बात नहीं करना चाहते और बीमारी का ईलाज कराने से कतराते हैं। बढ़ता शहरीकरण और युवा आबादी वाला देश तेजी से मानसिक बीमारी के चपेट में आ रहा है। यही वजह है कि राजधानी नई दिल्ली में मानसिक स्वास्थ्य पर आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मे राष्ट्रपति ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर वक्त रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो ये एक महामारी का रुप ले लेगा।

समाज में अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों को लेकर लोगों की सोच सबसे बड़ी रुकावट है इन मरीजों के सही वक्त पर सही इलाज ना मिलने का। मानसिक रोगी एक मरीज है ना कि पागल इस सोच को बदलने की जरुरत है।टूटता सामाजिक ताना बाना और करियर का दबाव अक्सर लोगो में अवसाद को जन्म देता है।

अवसाद आत्महत्या का एक बड़ा कारक है। ये चुपके से हमारी जिंदगी मे आ जाती है। अवसाद के लक्षण उदासी, काम में रुचि का ना होना, सुस्त रहना, नींद नही आना, भूख कम लगना, एकाग्रता में कमी, ख्याल आता है कि जीवन बेकार है आत्महत्या का विचार आना ये लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा हो।

भारत ने भी मानसिक रोग से निपटने के लिए कमर कस ली है और हाल ही में मानसिक स्वास्थ्य पर कानून बनाकर सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य को समाज और रोगी केंद्रित बना कर ये साफ है कर दिया कि अब इनके साथ भेदभाव करने की जरुरत नही बल्कि इस पर बात करके ही ऐसा माहौल बनाना होगा जो रोगियों का जल्द, सुगम और बेहतर उपचार सुनिश्चित करे।

यह कानून मानसिक रोगों को लेकर तमाम नकारात्मक धारणाओं को तोड़ने में कारगर होगा जो आज 21वीं सदी में भी बनी हुई हैं। आत्महत्या के प्रयास को अपराध नहीं मानकर केवल मानसिक बीमारी की श्रेणी में रखा जाना इस बात का संकेत है कि इसमें मानवीय संवेदनाओं का पूरा ध्यान रखा गया है।