परशुराम जयंती : भगवान परशुराम से सीखे यें बातें जीवन के हर क्षेत्र में मिलेगी सफलता

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आदर्श योग आध्यात्मिक योग केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल कई वर्षो से निःशुल्क योग प्रशिक्षण के द्वारा लोगों को स्वस्थ जीवन जीने की कला सीखा रहें है वर्तमान में भी ऑनलाइन माध्यम से यह क्रम अनवरत चल रहा है | वर्तमान कोविड 19 महामारी में भी हजारों योग साधक अपनी योग साधना की निरंतरता से स्वयं स्वस्थ रहते हुए सेवा के कार्यों में लगे है |

भगवान परशुराम जयंती अक्षय तृतीया के अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनायें देते हुए कहा कि दुर्गनों को जीत कर हम मानव कहलायेंगे, अनुशासन ब्राह्मचर्य व तप से दुर्गुण नष्ट करें |वर्तमान समय में हम सब एकजुट होकर ऊर्जा का सही उपयोग करें एवं राष्ट्र की बुनियाद मजबूत करें योग प्राणायाम नियमित करें |

योग गुरु अग्रवाल ने भगवान परशुराम जी के बारे में बताते हुए कहा कि धार्मिक ग्रंथो के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म वैशाख कृष्ण पक्ष तृतीया को भृगुवंशीय ऋषि जमदग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से हुआ था | विष्णु के दस अवतारों में से छठे अवतार के रूप मे अवतरित इनका प्रारम्भिक नाम राम रखा गया, लेकिन अपने गुरू भगवान शिव से प्राप्त अमोघ दिव्य शस्त्र परशु (फरसा) को धारण करने के कारण यह परशुराम कहलाए। जन्म समय में छह ग्रह उच्च के होने से वे तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरुष थे। प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य था।

न्याय के पक्षधर परशुराम जी दीन दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता और रक्षा करते थे।  आखिर में परशुराम  ने कश्यप ऋषि को पृथ्वी दान कर स्वयं महेन्द्र पर्वत पर निवास करने लगे। शास्त्रों के अनुसार ये चिरंजीवी हैं व आज भी जीवित व तपस्या में लीन हैं। परशुराम का सप्त चिरंजीवियों में स्थान है

भगवान परशुराम से सीखे ये बातें जीवन के हर क्षेत्र में मिलेगी सफलता 

दान करना – धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम ने अश्वमेघ यज्ञ कर पूरी दुनिया को जीत लिया था, लेकिन उन्होंने सबकुछ दान कर दिया। हमें भगवान परशुराम से दान करना सीखना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार दान अवश्य करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी दान करने का बहुत अधिक महत्व होता है। ऐसा माना जाता है कि दान करने से उसका कई गुना फल मिलता है।

न्याय करना – भगवान परशुराम ने न्याय करने के लिए सहस्त्रार्जुन और उसके वंश का नाश कर दिया था। धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम का मानना था कि न्याय करना बहुत जरूरी है। इसलिए उन्हें न्याय का देवता भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं में इस बात का वर्णन भी है कि भगवान परशुराम सहस्त्रार्जुन और उसके वंश का नाश नहीं करना चाहते थे, परंतु उन्होंने न्याय के लिए ऐसा किया। भगवान परशुराम के लिए न्याय सबसे ऊपर था। हमें भी जीवन में न्याय करना चाहिए।

माता-पिता का सम्मान – भगवान परशुराम ने हमेशा अपने माता-पिता का सम्मान किया और उन्हें भगवान के समान ही माना। माता-पिता के हर आदेश का पालन भगवान परशुराम ने किया। हमें भी जीवन में हमेशा अपने माता-पिता का सम्मान और उनकी हर आज्ञा का पालन करना चाहिए। जो व्यक्ति माता-पिता का सम्मान करते हैं, भगवान भी उनसे प्रसन्न रहते हैं।

विवेक से काम लेना
भगवान परशुराम ने गुस्से में आकर कभी भी अपना विवेक नहीं खोया। धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम का स्वभाव गुस्से वाला था, परंतु उन्होंने हर कार्य को संयम से ही किया। हमें भी जीवन में सदैव विवेक और संयम बना के रखना चाहिए।
भगवान परशुराम का जीवन शिक्षाप्रद है। परशु प्रतीक है शौर्य  व ताकत का, राम प्रतीक हैै मर्यादा, सत्य-सनातन व धर्म का, उसी तरह परशुराम शास्त्र व शस्त्र का अनुठा संगम हैं।