प्रयागराज : संगम की रेती पर तम्बुओं में बस गए कल्पवासी, क्या है कल्पवास का महत्व

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प्रयागराज. 14 जनवरी को मकर संक्रांति स्नान पर्व के साथ ही संगम की रेती पर हर साल लगने वाले देश और दुनिया के सबसे बड़े अध्यात्मिक मेले की शुरुआत हो चुकी है. वहीं संगम की रेती पर बने हजारों तम्बुओं में लाखों कल्पवासी भी पौष पूर्णिमा स्नान पर्व के साथ आज से कल्पवास शुरु कर दिया है. सनातन धर्म में क्या है कल्पवास का महत्व, संगम की रेती पर कल्पवास का संकल्प लेकर कल्पवास करना कितना फलदायी और कल्पवास करने के नियम व्रत हैं कितने सख्त.

संगम की रेती पर हर साल माघ मेला, छह वर्षों में कुम्भ और 12 वर्षों में महाकुम्भ का आयोजन होता है. कुम्भ और माघ मेले में छह प्रमुख स्नान पर्व पड़ते हैं. मकर संक्रान्ति, पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि। कुम्भ और माघ मेले में संगम की रेती पर लाखों श्रद्धालु भी यहां आकर कल्पवास करते हैं. कल्पवासी एक माह तक संगम की रेती पर बने तम्बुओं में रहते हैं. इस दौरान उनकी दिनचर्या नियमित और संयमित होती है.

कल्पवासी प्रति दिन ब्रह्म मूहूर्त में उठकर गंगा स्नान करते हैं. कल्पवासी अपने तम्बुओं में आकर पूजा-अर्चना और भजन कीर्तन भी करते हैं. इसी के साथ माघ मेले में संतों का प्रवचन सुनने के साथ ही आध्यात्मिक और धार्मिक कार्यक्रमों में भी शामिल होते हैं. कल्पवासी एक माह तक जमीन पर सोने के साथ चूल्हे पर बना भोजन ग्रहण कर पूरी तरह से सात्विक जीवन ब्यतीत करते हैं.

संतों के मुताबिक संगम की रेती पर कोई भी ब्यक्ति कल्पवास का संकल्प लेकर कल्पवास कर सकता है. उनके मुताबिक कल्पवास करने के लिए कल्पवासियों को 32 प्रकार के नियमों का पालन करना होता है, लेकिन चार ऐसे सख्त नियम भी हैं जिसका पालन हर कल्पवासी को करना अनिवार्य है. सुबह उठकर ही गंगा में स्नान करें, दिन में एक बार आहार करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें और जमीन पर सोने के साथ ही रात्रि जागरण कर प्रभु की आराधना करें. ऐसी मान्यता है कि कल्पवास करने से कायाकल्प हो जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. अखिल भारतीय दंडी सन्यासी परिषद के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम महाराज के मुताबिक कल्पवास करने से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है.

बहरहाल, संगम की रेती पर पौष पूर्णिमा के स्नान पर्व पर संकल्प के साथ ही लाखों श्रद्धालुओं का कल्पवास शुरु हो जायेगा. यह कल्पवास पौष पूर्णिमा से लेकर माघी पूर्णिमा के स्नान पर्व तक चलेगा. इसमें ऐसे ही कल्पवासियों की संगम की रेती पर नियमित और संयमित दिन चर्या चलती रहती है. संगम में कल्पवास की परम्परा सदियों से चली आ रही है और आगे भी इसी तरह लोगों की आस्था बनी रहेगी.