जप योग से मिलती है विपरीत परिस्थितियों में मानसिक शांति – योग गुरु महेश अग्रवाल

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि संस्कृत भाषा में जप का शाब्दिक अर्थ है-भगवन्नाम की पुनरावृत्ति । विश्व के समस्त धर्मों में भगवान के नाम की पुनरावृत्ति के अभ्यास को दैनिक धार्मिक अनुष्ठान हेतु निर्धारित किया गया है।

जप एक अत्यन्त शक्तिशाली कार्यसाधक के रूप में माना गया है, जो साधक को परमानन्द और मोक्ष के उन अन्तिम क्षेत्रों तक पहुँचने में समर्थ बनाता है, जिन्हें समस्त मनुष्य कभी-न-कभी प्राप्त करने की अभीप्सा रखते हैं। इसलिए वर्तमान युग में जब मनुष्य जीवन-मूल्यों के प्रति अपनी सारी समझ खो चुका है और गलत मार्ग पर अग्रसर है, ऐसे समय में सांसारिक दुःखों से छुटकारा दिलाने के लिए ‘जप’ या भगवान का नाम ही शक्तिशाली एवं प्रभावशाली साधन है। इस प्रकार बन्धन से मुक्त होने के लिये जप को सुगम विधि माना जाता है।

योग गुरु अग्रवाल ने बताया पवित्र शब्द ‘ॐ’ सर्वशक्तिमान् ईश्वर का प्रतीक है तथा आत्म-प्रकाश की खोज करने वाले साधकों को इस मन्त्र का मात्र उच्चारण ही नहीं करना चाहिए, वरन् इसके अर्थ पर भी चिन्तन करना चाहिए। अतः स्पष्ट है कि जप को एक यौगिक अभ्यास माना गया है। इसलिये इसकी व्याख्या करते समय ‘जप योग’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका यह अर्थ भी है कि इसकी अवश्य ही कुछ विशेष वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा इस अभ्यास से निश्चित परिणाम की प्राप्ति होती है।

जप योग क्या है?

चूँकि ‘जप’ का अर्थ होता है किसी पवित्र सूत्र की पुनरावृत्ति, अतः इसके लिए एक निश्चित सूत्र होना चाहिए और उस सूत्र को ‘मन्त्र’ कहा जाता है। व्युत्पत्ति के अनुसार जब ‘मन्त्र’ की पुनरावृत्ति और उस पर मनन् किया जाता है, तब वह अभ्यासी को उसके लक्ष्य तक पहुँचने योग्य बनाता है। इसलिये ‘मन्त्र’ की मात्र यंत्रवत् पुनरावृत्ति वर्जित है। अभ्यासी को न केवल उसका अर्थ समझना है, बल्कि उस पर ध्यान भी करना होता है। इसलिए ‘योग’ में जप के अभ्यास को विशेष महत्त्व दिया गया है। मन्त्र दुहराकर आध्यात्मिक सम्बन्ध स्थापित करने की यह एक विधि है। अविरल पुनरावृत्ति के द्वारा आप अपने शरीर में विशेष प्रकार के स्पंदन उत्पन्न करते हैं। मन्त्र के सस्वर पाठ से शरीर शुद्ध होता है तथा मन भी आध्यात्मिक शक्ति से भर जाता है। मन्त्र व्यक्ति को बहुत-सी मानसिक समस्याओं और सनकों से मुक्त करता है। सिद्ध सन्तों के मतानुसार मन्त्र ईश्वर का पूर्ण ज्ञान प्रदान करता है तथा ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए सर्वोत्तम साधन है।
जप के नियम और निर्देश :-
किसी एक मंत्र या देवता का नाम चुन लें। अच्छा होगा यदि मंत्र गुरु द्वारा दिया गया हो। यदि आपने गुरु मंत्र न लिया हो तो ॐ मंत्र का, जो कि एक ब्रह्माण्डीय मंत्र है तथा सभी के लिए उपयुक्त है, प्रयोग किया जा सकता है। एक सौ आठ दानों वाली माला से प्रतिदिन इसका जप एक से दस माला तक करें।

तुलसी या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। माला में सुमेरु के अतिरिक्त एक सौ आठ दाने हों। तांत्रिक अभ्यास के लिए स्फटिक की माला का प्रयोग किया जाता है। दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली और अंगूठे से दानों को घुमायें। तर्जनी और कनिष्ठा का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए।

जप का अभ्यास ध्यान के किसी आसन, जैसे, पद्मासन, सिद्धासन या सिद्धयोनि आसन में बैठकर करना चाहिए। या तो दाहिना हाथ माला के साथ घुटने पर टिका रहे तथा माला भूमि को छूती रहेगी अथवा माला को पकड़े हुए दाहिना हाथ वक्षस्थल के केन्द्र में भी रह सकता है।

इस स्थिति में माला को कपड़े के झोले में भी रखकर घुमाया जा सकता है। यह झोला गले या कलाई में झूलता रहेगा। कलाई को कंधे से झूलती हुई पट्टी के अन्दर डाल कर भी रखा जा सकता है। माला पर दूसरों की दृष्टि न पड़े। जब इसका उपयोग न हो रहा हो तब उस समय उसे कपड़े में बाँध कर या किसी रेशमी थैले के अन्दर रखें।

जप की माला को पहनना नहीं चाहिए। सुमेरु को पार करके माला न घुमायें। सुमेरु पर पहुँच कर वहीं से माला को उलटा घुमा कर जपें। कुछ समय के लिए मानसिक जप करें। यदि मन इधर-उधर भागने लगे तो बैखरी जप शुरू कर दें। फिर जितनी जल्दी सम्भव हो, पुनः मानसिक जप प्रारंभ कर दें।

मंत्र के प्रत्येक अक्षर का शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण करें। जप न तो बहुत द्रुत गति से करें और न बहुत मन्द गति से। जब मन इधर उधर भटकने लगे, तो जप की गति अवश्य बढ़ा दें। जप करते समय किसी सांसारिक वस्तु की कामना न करें। इस बात का अनुभव करें कि मंत्र शक्ति के प्रभाव से आपका हृदय और मन शान्त और स्थिर हो रहे हैं। अपने गुरु मन्त्र को गुप्त रखें। उसे किसी के सामने प्रकट न करें। किसी भी काम में क्यों न लगे हों, मंत्र की धारा प्रतिपल अन्तर्मन में प्रवाहित होती रहे।

साधकों को यथासम्भव उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुँह करके मंत्र जप करना चाहिए। जप करते समय अवचेतन मन के छिपे हुए संस्कार विभिन्न प्रतिबिम्बों, चित्रों, दृश्यों और विचारों के रूप में चेतन मन के तल पर आयेंगे। एक तटस्थ दर्शक की तरह उन्हें देखें, लेकिन उनसे प्रभावित होकर जप करना न भूल जायें।

जप करने से चित्त शुद्धि होती है, मन पवित्र होता है, वासनाओं और संस्कारों का क्षय होता है। आध्यात्मिक जीवन के विकास तथा चित्त शुद्धि के लिए संस्कारों और वासनाओं का क्षय होना आवश्यक है, अन्यथा वे आध्यात्मिक जीवन की उच्च अवस्थाओं में बड़ी बाधायें खड़ी कर देते हैं।

विभिन्न प्रकार की मालाएँ कौन सी हैं और उनके क्या उपयोग हैं? तंत्र शास्त्र की पुस्तकों में 80 से भी अधिक मालाओं का प्रयोग बताया गया है। इनमें से अधिकांशतः उपयोग में आने वाली तुलसी, रुद्राक्ष, चंदन, कमल बीज, मूँगा और स्फटिक की मालाएँ हैं। तुलसी के दाने उसके पौधे के तने से तैयार किये जाते हैं।

भारत में तुलसी को उसके आध्यात्मिक गुणों के कारण अत्यधिक आदर दिया जाता है। तुलसी की माला की संवेदनशीलता जप के लिये सर्वाधिक उपयोगी साधन होती है, लेकिन इसके प्रयोग में व्यक्तिगत योग्यतानुसार कुछ प्रतिबंध भी हैं। तुलसी की माला पर जप करने वालों को मदिरा और मांसाहार का निषेध करना होता है।

उपयोग की दृष्टि से रुद्राक्ष का प्रयोग दूसरे नंबर पर आता है। यह आध्यात्मिक चीजों के प्रति उतना संवेदनशील नहीं है और इसलिये इसके प्रयोग पर कोई प्रतिबंध भी नहीं है। रुद्राक्ष रुधिर-संचार में वृद्धि करता है, हृदय और श्वास क्रिया को सुसंचारित करता है और उच्च रक्तचाप को कम करता है।

इसलिये उपचारात्मक दृष्टि से बहुतेरे लोग रुद्राक्ष माला पहनना अधिक पसंद करते हैं। चंदन की माला का उपयोग बहुधा चर्मरोगों के लिये होता है। एक्जिमा, दाद, खास आदि तथा मानसिक समस्याओं, जैसे, सिजोफ्रेनिया, नाड़ी रोग और मनोविक्षिप्ति के लिये मूंगे की माला काम में आती है। स्फटिक का प्रयोग अनुष्ठानात्मक जप और उच्च तांत्रिक साधना के लिये होता है।

क्या आपको सुखी और सामंजस्यपूर्ण जीवन अच्छा लगता है? क्या आप अपने दैनिक कार्य-कलापों में उत्साह से भरे रहते हैं? जब प्रतिकूल परिस्थितियाँ आपको झकझोर देती हैं, तब क्या आप शान्त मन और सहज भाव से अपना सिर ऊँचा रख पाते हैं? यदि नहीं, तो फिर योग की शरण में आइये। मास्क का उपयोग करें, एवं घर पर रहकर योग करने की आदत डालें |