अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस (8 सितंबर) : योग शिक्षण का एक बेहतर साधन है, जो विकसित हुए मस्तिष्क एवं मन को करता है समृद्ध – योग गुरु महेश अग्रवाल

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि विश्व साक्षरता दिवस 8 सितंबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य व्यक्तियों, समुदायों और समाजों में साक्षरता के महत्व को उजागर करना है। शिक्षा विनम्रता, शील, शिष्टाचार, नैतिकता, चरित्र, त्याग और समर्पण आदि सिखाती है।

योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि शिक्षा एवं साक्षरता से सकारात्मक विकास, कल्पना कीजिए कि पूरे विश्व के स्कूलों में गणित या विज्ञान की तरह योग पढ़ाया जाए तो क्या होगा? जब हम यह मानते हैं कि विश्व की साठ प्रतिशत जनसंख्या बच्चों की है तो परिणाम अवश्य अचंभित करने वाले होंगे।

हर जगह युवाजन सुव्यवस्थित, स्वस्थ और खुश होंगे। वे संवेदनशील और समझदार, शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ, अपनी क्षमताओं के प्रति अधिक सजग और उनके कार्यान्वयन में अधिक समर्थ होंगे। अपने आध्यात्मिक अनुभव के कारण वे चेतना के उच्चतर स्तर पर कार्य करने में सक्षम होंगे।

अपने इस अनुभव का उपयोग वे अपने बाह्य जीवन में, अपने व्यवसाय में और सामाजिक उत्तरदायित्वों में कर सकते हैं। योग सेवा के लिए प्रोत्साहित करता है, इसका उपयोग मानवता को लाभ पहुँचाने में किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में योग का समावेश करने पर वहाँ से बेहतर स्नातक बाहर आयेंगे जो अपने काम में अपनी बुद्धि का उपयोग अधिक सजगता से करेंगे।

युवा या वृद्ध, हर व्यक्ति को योगोन्मुख होना चाहिए। युवा वर्ग तथा सारे विश्व के भविष्य को योग जैसी प्रणाली की आवश्यकता होगी। योग का अर्थ है ‘संगम’ और इसे हम वैश्विक स्तर पर प्राप्त कर सकते हैं – समस्त विश्व के लोगों का सौहार्द्रपूर्ण संगम। योग के माध्यम से हर व्यक्ति अपनी संस्कृति और अपने जीवन के बारे में ऐसी सूक्ष्म जानकारी प्राप्त कर सकेगा जो पहले उसके लिए अकल्पनीय थी। यह है योग की शक्ति।

यह कोई धर्म नहीं है, बल्कि हमारी पहुँच के अंदर जीवन का विज्ञान है। यदि हम स्वयं को अपने और अपने बच्चों के भविष्य के प्रति उत्तरदायी मानते हैं तो हम यह सुनिश्चित करेंगे कि मनुष्य का विकास सकारात्मक दिशा में हो रहा है। तभी युद्ध बंद होंगे, तभी मनुष्य अपने साथियों से प्रेम करने योग्य होगा, तभी बुजुर्ग युवाओं को और युवा बुजुर्गों को समझ पायेंगे।

शिक्षा की बेहतर पद्धतियाँ –

जैसा कि युगों से होता आया है, शिक्षा की नयी एवं उन्नत पद्धतियों की खोज जारी है। ऐसा लगता है कि योग के प्रकट होने और उसके प्रयोग से एक क्रांति होने वाली है। मस्तिष्क के विभिन्न अंगों की क्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी से योग के उद्देश्य को और अपने जीवन में इन विद्याओं के कार्यान्वयन की आवश्यकता को समझते हुए चेतना के विस्तार को प्रोत्साहन मिला है।

मस्तिष्क दो गोलार्द्धां में बँटा हुआ है। प्रत्येक गोलार्ध का बिल्कुल पृथक् और भिन्न कार्य होता है। दायाँ गोलार्ध हमारे अस्तित्व के प्रज्ञा तथा अंतर्ज्ञान संबंधी पक्षों से सम्बद्ध होता है, जबकि बायाँ गोलार्द्ध बौद्धिक तथा विश्लेषणात्मक क्षमताओं से सम्बद्ध होता है। अब तक शिक्षा में बौद्धिक, वैज्ञानिक और तार्किक विषयों, जैसे पढ़ना, लिखना और गणित को महत्त्व देते हुए बायें गोलार्द्ध पर ही मुख्यत: ध्यान केंद्रित रखा गया है।

कलात्मक और प्रज्ञात्मक विषयों, जैसे कला, नृत्य, संगीत तथा अन्य रचनात्मक गतिविधियों को आर्थिक रूप से तो नगण्य सहायता मिली ही है, स्कूल के शिक्षा कार्यक्रमों में भी वे उपेक्षित ही रहे हैं। शिक्षाविदों का मानना है कि हमारी ऐसी अभिवृत्ति असंतुलित है, इससे शिक्षा अधूरी रहती है जो हमारे जीवन पर हानिकारक प्रभाव डालती है।

संकुचित शिक्षण पद्धतियों के कारण शिक्षकों का अपने व्यवसाय की अंतरात्मा से संपर्क छूट गया है। वर्तमान पाठ्यक्रमों में लचीलेपन का अभाव है। वे हमें मानवता का पाठ नहीं पढ़ाते हैं, न ही जीवन की उन मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं जिनकी खोज हम सभी कर रहे हैं। शिक्षकों को किसी तरह शिक्षा के कलात्मक और अभिनयात्मक, सौंदर्यपरक और आध्यात्मिक पक्षों को अपने शिक्षण में सम्मिलित कर अपने उत्तरदायित्व का विस्तार करना चाहिए। हम शिक्षकों ने बहुत लंबे समय तक व्याख्यानों, पाठ्यपुस्तकों, परीक्षाओं और परीक्षाफलों के पर्दे के पीछे स्वयं को सुरक्षित रखा है।’

संपूर्ण मस्तिष्क की शिक्षा –

शिक्षा व्यवस्था में बौद्धिक और प्रज्ञात्मक (मस्तिष्क के दायें और बायें भाग से संबंधित) दोनों मस्तिष्कों के समन्वयन के लिए ध्यान, योगासन, प्राणायाम, बायोफीडबैक इत्यादि के प्रभाव का अध्ययन किया है। मस्तिष्क के दोनों भागों के समन्वित होने पर सृष्टि की सृजनात्मक शक्तियों के संपर्क में आ जाते है अधिक ऊर्जा एवं सकारात्मकता का अनुभव करते है |

योग – विकास का माध्यम – छात्रों एवं शिक्षकों, दोनों की दृष्टि से योग शिक्षण का एक बेहतर साधन है, जो विकसित होते हुए मस्तिष्क एवं मन को समृद्ध करता है, अपने स्वभाव के द्विविध पक्षों- आंतरिक एवं बाह्य, बायें एवं दाहिने, अंतर्दर्शी एवं विश्लेषणात्मक – के बीच संतुलन स्थापित करता है, युवाओं को यथोचित लक्ष्य प्रदान कर उन्हें एक पहचान दिलाता है तथा जीवन को एक सही दिशा प्रदान करता है।

स्कूली छात्रों के लिए शिथिलीकरण –

यौगिक पद्धतियाँ वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की त्रुटियों को दूर करने में मदद करेंगी। यह न केवल अच्छा आदमी बनने में मदद करेंगी, बल्कि हमें तनावमुक्त तथा एकाग्र बनाकर पढ़ने, लिखने और गणित सीखने जैसी मौलिक योग्यताएँ शीघ्र सीखने में भी सहायक होंगी।