अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस – समग्र विश्व के लिये सुख की‌ कामना करता है –योग गुरु महेश अग्रवाल

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि वर्तमान विपरीत परिस्थितियों में हमारी सहकार की भावना ही हमें बल प्रदान करती है जहा हम सब एक दूसरे के लिए प्रेम भाव से मदद के लिए आगे रहते है, सहकारिता तथा प्रेम में गहरा सम्बन्ध है। वैसे तो ’लगाव’ से ही लोग आपस में जुड़ सकते हैं, और कार्य भी कर सकते हैं, किन्तु लगाव में वह सेवा भाव नहीं हो पाता जैसा कि प्रेम में‌ होता है। प्रेम सहज ही सहायता करने की प्रेरणा और शक्ति देता है। प्रेम सहकारिता की शक्ति को और सुदृढ़ करता है।

‘हम ´की शक्ति के बारे में बताया कि किसान, मजदूर, गांव, या इकाई जिस लक्ष्य को अकेले नही पा सकते, उसे परस्पर सहयोग और संगठन की शक्ति से आसानी से पा लेते है। सहयोग एक सार्वभौमिक हकीकत है, पक्षियों सहित सम्पूर्ण जीव-जगत में सहयोग की स्वाभाविक प्रकृति होती है । वस्तुतः यह जीवन का मूलभूत तत्व है। इस साल की थीम एक साथ बेहतर पुनर्निर्माण करें।

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस के अवसर पर योग गुरु अग्रवाल ने कहा कि वर्ष 1923 से अन्तर्राष्ट्रीय सहकारिता संघ द्वारा हर वर्ष जुलाई माह के पहले शनिवार को विश्व सहकारिता दिवस मनाया जाता है। भारत में सहकारी संस्थाओं की स्थापना भारतीय सहकारी समिति अधिनियम 1912 के अधीन होती है।

सहकारिता दो शब्दों ‘सह+कारिता’ के मेल से बना है। जिसमें सह से आशय हैं’ मिल जुलकर या साथ-साथ तथा कारिता का अर्थ हैं’ कार्य करना’। इस प्रकार मिल जुलकर साथ साथ काम करना सहकारिता हैं। यह एक ऐसा संगठन होता हैं जिसके सदस्य समानता के आधार पर पारस्परिक हित के लिये मिल जुलकर कार्य करते हैं। यह ‘एक सबके लिये और सब एक के लिये’ की भावना पर आधारित एक जीवन पद्धति हैं। सहकारिता एक ऐसा संगठन हैं जिसमें लोग मनुष्य के रूप में समानता के आधार पर अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सहयोग करते हैं।

सहकारिता से अभिप्राय सह+कार्य अर्थात मिलकर कार्य करने से है। शाब्दिक दृष्टि से सहकारिता का अर्थ मिलजुलकर काम करना है। सहकारिता के अन्तर्गत दो या दो से अधिक साथ मिलकर काम करने वाले व्यक्ति आते है। कोई भी मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अकेले नहीं कर सकता। उसे अन्य लोगों के सहयोग की आवश्यकता जरूर होती है एक-दूसरे को सहयोग करने से ही सहकारिता का जन्म होता है। सहकारिता का आशय निर्बल, अशक्त और निर्धन लोगों का परस्पर सहयोग है ताकि वे उन लाभों को प्राप्त कर सकें जो शक्तिशाली एवं धनी लोगों को उपलब्ध है। सहकारी समिति एक ऐसी स्वैच्छिक संस्था होती है जिसमें कोई भी सम्मिलित हो सकता है। समिति के सभी सदस्यों के समान अधिकार और समान उत्तरदायित्व होते है।

सहकारी आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य कृषकों, ग्रामीण कारीगरों, भूमिहीन मजदूरों एवं समुदाय के कमजोर तथा पिछड़े वर्गों के कम आय वाले और बेरोजगार लोगों को रोजगार, साख तथा उपयुक्त तकनीकी प्रदान कर अच्छा उत्पादक बनाना है। सहकारिता का महत्व इस प्रकार है–सामूहिक रूप में किए उत्पादन वृध्दि की संभावनाएं अधिक होती है।

सहकारी संस्थाएं कृषकों को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराती है। सहकारिता के कारण कृषि लागत में कमी आई है तथा बेरोजगारी पर अंकुश भी लगा है |सहकारिता समितियां कृषकों को कृषि कार्यों हेतु ही ॠण देती है। किसान साहूकारों और महाजनों से विवाह उत्सव और मृत्यु भोज आदि कार्यों के लिए अधिक ब्याज दर पर ऋण लेते थे लेकिन सहकारी सहमितियां किसान को कृषि कार्यों हेतु ही ऋण देती है इस तरह धन का सदुपयोग होता है।

सहकारिता से लोगों में सहयोग की भावना संचार हुआ है। वे मताधिकार तथा पदों एवं अधिकारों-कर्तव्यों के महत्व को समझने लगे है। सहकारिता से सामाजिक चेतना मे वृध्दि हुई है। सहकारिता आन्दोलन ने अशिक्षा, अज्ञानता, अंधविश्वास तथा बेरोजगारी की समस्याओं को दूर करने में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया है।

सहकारिता ने औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ सहकारी नियमों की जानकारी, संगठन की कला और सामुदायिक शिक्षा जैसी अनौपचारिक शिक्षा की व्यवस्था सहकारिता आन्दोलन ने की है। इन सब के अतिरिक्त सहकारिता का प्रजातांत्रिक मूल्यों के विकास, नैतिक गुणों का विकास,  मध्यस्थों के शोषण से मुक्ति, राजनीतिक चेतना के विकास मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्पष्ट होता है की सहकारी समितियां ग्रामीण पुनर्निर्माण एवं विकास का आधार रही है। सहकारी समितियां नकद व्यवहार करती है। इससे रकम डूबने का भय नही रहता और अनेक ग्राहकों के विस्तृत हिसाब-किताब रखने की आवश्यकता नही रहती।