चांद पर पहुंचने की अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा; भारत की टीम इंडस ले रही है हिस्सा

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रोबोटिक यान से कम से कम लागत में अंतरिक्ष खोज के अभियान के उद्देश्य से गूगल और अन्य कंपनियों ने मिलकर दस साल पहले प्रतिस्पर्धा की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य किफायती और कम से कम सरकारी खर्चवाले तरीके इजाद करना है।

अतंरीक्ष स्पर्धा के अगले दौर में यह कोशिश की जा रही है कि इसमें सरकारों की कम से कम भूमिका हो। इसी कोशिश के तहत कम लागत की अंतरीक्षयान तैयार कर चांज तक पहुंचने की स्पर्धा आयोजित की गई है। इस स्पर्धा का नाम ‘गूगल लूनर एक्सप्राइज’ (जीएलएक्सपी) है। इस प्रतिस्पर्धा में भारत की भी एक टीम हिस्सा ले रही है। बेगलूरू स्थित टीम इंडस इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों से मिलकर चांद पर भेजने के लिए रोवर तैयार करने में जुटी है।

25 सितंबर को भारत की टीम इंडस ने एंथम भी लॉन्च किया है जिसे मशहूर संगीतकार-गीतकार राम संपत ने लिखा है और गायिका सोना महापात्र तथा संगीत बैंड सनम ने इसे सुर दिये हैं। टीमइंडस ने बताया कि इस एंथम के माध्यम से उनका उद्देश्य प्रत्येक भारतीय को ‘#हर इंडिया का मून शॉट’ नाम के उनके अभियान में किसी न किसी तरह भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना है।

कंपनी का कहना है कि चंद्रमा के लिए यह निजी मिशन ऐतिहासिक होगा। रोबोटिक यान से कम से कम लागत में अंतरिक्ष खोज के अभियान के उद्देश्य से गूगल और अन्य कंपनियों ने मिलकर दस साल पहले प्रतिस्पर्धा की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य किफायती और कम से कम सरकारी खर्चवाले तरीके इजाद करना है।

इस अभियान में भारत की टीम इंडस के साथ चार अन्य अंतरराष्ट्रीय टीमों को भी आयोजकों ने मंजूरी दे दी है जिनमें इस्राइल की स्पेस आईएल, अमेरिका की मून एक्सप्रेस, जापान की हाकुतो और एक अन्य अंतररराष्ट्रीय टीम सिनर्जी मून शामिल हैं। इस प्रतिस्पर्धा में हर टीम को एक रोबोटिक रोवर बनाकर चंद्रमा पर भेजना है और 500 मीटर चलकर धरती पर तस्वीरें वापस भेजनी हैं। इसमें सरकार के समर्थन वाली नासा या इसरो जैसी अंतरिक्ष एजेंसियों से 10 प्रतिशत से ज्यादा सहयोग नहीं लिया जा सकता। विजेताओं को तीन करोड़ डॉलर के इनाम देने का दावा किया गया है।

प्रतिस्पर्धा की समयसीमा हाल ही में दिसंबर 2017 से बढ़ाकर मार्च 2018 कर दी गयी है और टीमइंडस इस समयसीमा के भीतर अपने मिशन को भेजने के लिए तैयार है। टीम इंडस की मार्केटिंग और आउटरीच विभाग की प्रमुख शीलिका रविशंकर ने बताया कि पूरी टीम इस मिशन में भाग लेने और जीतने के लिए दिन रात मेहनत कर रही है।

उन्होंने इसे बहुत चुनौतीपूर्णऔर जटिल मिशन बताते हुए कहा कि हर कदम बड़े सटीक तथा सही तरीके से रखना है। हम कई परीक्षण और समीक्षाएं कर रहे हैं जिससे जोखिम कम हो। अक्टूबर में एक बड़ा परीक्षण होगा जो इस मिशन के लिए निर्णायक होगा।

शीलिका ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों से सहयोग मिलने का दावा करते हुए बताया कि हमें ऐसे लोगों से सीखने का मौका मिल रहा है जिन्होंने विश्वस्तरीय अंतरिक्ष कार्यक्रम बनाया। इसरो का अंतरिक्ष कार्यक्रम इस मिशन में हमें बहुत मदद कर रहा है और हम स्पर्धा के अग्रणी प्रतिभागी हैं। स्पर्धा की घोषणा 2007 में हुई थी। 2010 में भारत के इस छोटे से समूह ने इसमें पंजीकरण कराया। बाद में आईआईटी के एक छात्र को शामिल कर अवधारणा पर काम शुरू किया किया।

कंपनी की वेबसाइट से मिली जानकारी के अनुसार टीमइंडस के लोगों ने पूर्व इसरो प्रमुख के. कस्तूरीरंगन से भी मुलाकात की थी और मिशन पर उनसे गहन चर्चा के बाद इस मिशन की संभावना को बल मिला। टीमइंडस की वेबसाइट के अनुसार उसके विकसित किये गये अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण पीएसएलवी के माध्यम से श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाएगा। टीमइंडस के अनुसार यह मिशन अतरिक्ष खोज और अनुसंधान की अपार संभावनाएं खोलेगा। हाल ही में सरकार से इतर अंतरिक्ष यात्राओं का मार्ग खुला है। स्पेस एक्स जैसे कुछ निजी क्षेत्र के लोगों ने यह रास्ता दिखाया है।

इस अभियान की लागत कम करके और अधिक लोगों को इस क्षेत्र में लाया जा सकता है। हमें उम्मीद है कि आगे के मिशनों के लिए यह एक रास्ता दिखाएगा। उनके मुताबिक फिलहाल करीब 120 लोग इस परियोजना पर काम कर रहे हैं जिनमें करीब दो दर्जन इसरो के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक हैं।