अफगानिस्तान में तालिबान के आने पर भारत के लिए अब आगे क्या विकल्प?

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अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है और जिन देशों पर इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर पड़ना है, उनमें भारत भी शामिल है। अफगानिस्तान में लोकतंत्र और विकास को बढ़ावा देने में आगे रहे भारत को तालिबान के आगमन के बाद पिछले 20 वर्षों की अपनी मेहनत खतरे में पड़ती हुई नजर आ रही है। चलिए जानते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने का भारत पर क्या असर पड़ेगा।

अतीत में कैसे रहे हैं भारत और तालिबान के संबंध?
अफगानिस्तान में पहले भी 1990 के दशक से लेकर 2001 तक तालिबान का शासन रह चुका है और इस दौरान भारत के साथ उसके संबंध अच्छे नहीं रहे थे। भारत ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी थी और वह तालिबान को अफगानिस्तान में भारतीय मिशनों पर हुए हमलों के लिए जिम्मेदार मानता रहा है। 1999 में IC-814 विमान के अपहरण के समय भी तालिबान ने इस विमान को अपने यहां कंधार में जगह दी थी।

पाकिस्तान और आतंकी संगठनों के साथ संबंध एक बड़ी अड़चन
पाकिस्तान और पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के साथ तालिबान के संबंध भारत और उसके संबंधों के बीच एक बड़ी अड़चन रहे हैं। उसके जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकी संगठनों के साथ संपर्क रहे हैं जो भारत पर हमला करने की साजिश रचते रहते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान भी तालिबान की मदद के एवज में अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंक विरोधी गतिविधियों के लिए करता रहा है और इस बार भी यही होने का अंदेशा है।

चुनी हुई सरकारों से भारत की नजदीकी भी दूरियों का एक कारण
अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकारों के साथ भारत के मधुर संबंध भी भारत और तालिबान के रिश्ते न पनपने का एक कारण रहे हैं। अफगानिस्तान में लोकतंत्र को बढ़ावा देने में भारत का एक बड़ा योगदान रहा है और इसलिए उसकी तालिबान से दूरी हैं।

धार्मिक मदरसों से उभरा तालिबान सुन्नी इस्लाम की कट्टर विचारधारा का प्रचार करता है और शरिया कानून के कट्टरपंथी संस्करण को लागू करने का समर्थक रहा है। ऐसे में जाहिर है कि भारत के प्रति उसका रुख दोस्ताना तो नहीं है। इसके अलावा अफगानिस्तान में भारतीयों पर हुए कई हमलों में भी उसका हाथ होने की बात सामने आई है। उसके राज में अफगानिस्तान की भूमि का कश्मीर भेजे जाने वाले आतंकियों की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होता रहा है।

हालिया समय में तालिबान के रुख में क्या बदलाव आया है?
हालिया समय में तालिबान का रुख भारत के प्रति थोड़ा नरम रहा है और उसे बीते कुछ समय में कोई भी भारत विरोधी बयान नहीं दिया है। इसके अलावा तालिबान में एक गुट ऐसा भी है जो भारत के प्रति सहयोग वाला रवैया रखता है। जब अनुच्छेद 370 का मुद्दा उठा तो पाकिस्तान ने इसे कश्मीर से जोड़ा, लेकिन तालिबान ने कहा कि उसे इस बात की परवाह नहीं कि भारत कश्मीर में क्या करता है।

अफगानिस्तान के विकास में भारत का क्या योगदान रहा है?
भारत ने पिछले कुछ सालों में अफगानिस्तान के विकास में अहम योगदान दिया है और वह पुनर्निर्माण से जुड़ी योजनाओं में लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश कर चुका है। अफगानिस्तान की नई संसद को भारत ने बनाया है। इसके अलावा कई बांधों और सड़कों का निर्माण भी भारत ने कराया है। देश में अच्छी-खासी संख्या में भारतीय पेशेवर भी काम करते हैं। अफगानिस्तान के विकास में भारत की इस भूमिका को तालिबान भी स्वीकार करता है।

तालिबान के आने से भारत को होने वाली समस्याएं
अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद भारत के लिए मुख्य तौर पर तीन तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पहली समस्या सुरक्षा से संबंधित है और पाकिस्तान आतंकी संगठन भारत विरोधी गतिविधि के लिए अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरी समस्या मध्य एशिया में व्यापार और कनेक्टिविटी को लेकर है जो अफगानिस्तान के जरिए होते रहे हैं। तीसरी दिक्कत पाकिस्तान और चीन को लेकर है जो पहले ही तालिबान से अच्छे संबंध बना चुके हैं।

भारत के लिए अब आगे का रास्ता?
भारत के पास अभी दो विकल्प हैं। पहला वो अफगानिस्तान में बना रहे और तालिबान से संबंध स्थापित करे, वहीं दूसरा ये कि वो सब कुछ बंद करके निकल जाए और पिछले दो दशक की अपनी मेहनत को बर्बाद जाने दे। अभी भारत पहले रास्ते पर जाते हुए दिख रहा है और उसकी तालिबान के साथ अनौपचारिक तौर पर वार्ता करने की खबरें भी आई हैं। हालांकि भारत कोई जल्दबाजी नहीं करेगा और अन्य देशों की प्रतिक्रिया का इंतजार करेगा।