बुद्ध ने कैसे किया राजा का हृदय परिवर्तन

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अध्यात्म । जितने भी साधु और महात्मा हुए है उन सभी ने बलि देने का विरोध किया है। सभी ने अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म माना है। लेकिन कुछ अज्ञानी लोग उनकी बातों को नहीं मानकर चली आ रही प्रथाओं के अनुसार बलि देने का अपना धर्म मानते है।

ऐसी ही एक कहानी है भगवान बुद्ध की। उन्होंने किस प्रकार से एक बकरे को बलि देने से बचा कर राजा का सही मार्ग पर लाए। किसी राज्य में यज्ञ के राजा एक बकरे की बलि देने की तैयारी कर रहा था। तभी वहां से भगवान बुद्ध जा रहे थे। जब भगवान बुद्ध ने राजा को ऐसा करते देखा तो उसको रोकर पूछा कि यह क्या कर रहे हो। इसकी बलि क्यों दे रहे हो।

राजा ने बताया कि बकरे की बलि चढ़ाने से मुझे बहुत पुण्य प्राप्त होगा और यह हमारी प्रथा भी है। इस पर बुद्ध ने कहा कि आप मेरी बलि दे दो। यह सुनकर राजा थोड़ा घबराया क्योंकि उसने सोचा कि बकरे की तरफ से बोलने वाला कोई होगा, ऐसा राजा सोच नहीं सकता था मगर बुद्ध की बलि चढ़ाने की बात मन में आते ही राजा कांप गया।

उसने कहा, ‘‘अरे नहीं महाराज! आप ऐसी बात न करें। बकरे की बात अलग है। ऐसा तो पुराने समय से चलता आ रहा है। बकरे का भी फायदा ही है। वह सीधा स्वर्ग चला जाएगा।’’

बुद्ध बोले, ‘‘यह तो बहुत ही अच्छा है, मैं स्वर्ग की तलाश कर रहा हूं, तुम मुझे बलि चढ़ा दो और मुझे स्वर्ग भेज दो या फिर ऐसा क्यों नहीं करते कि तुम अपने माता-पिता को ही स्वर्ग भेज दो तथा खुद को ही क्यों रोके हुए हो।

जब स्वर्ग जाने की ऐसी सरल व सुगम तरकीब मिल गई है तो काट लो गर्दन। इस बेचारे बेजान बकरे को क्यों स्वर्ग में भेज रहे हो। यह शायद स्वर्ग में जाना भी न चाहता हो। बकरे को खुद ही चुनने दो कि उसे कहां जाना है।’’

राजा के सामने अपने तर्कों की पोल खुल चुकी थी। वह महात्मा बुद्ध के चरणों में झुक कर बोला, ‘‘महाराज आपने मेरी आंखों पर पड़े अज्ञान के पर्दे को हटाकर मेरा जो उपकार किया है वह मैं भूल नहीं सकता।’’