भाई बहिन साथ देवरानी -जेठानी का भी पर्व है होली- दोज

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बुंदेलखण्ड क्षेत्र में होली दोज के पर्व पर बहिनो द्वारा भाईयो को तिलक लगाने की परंपरा के साथ ही महिलाओं द्वारा ही देवरानी एवं जेठानी के रिश्तो में मधुरता एवं संयुक्त परिवार की समृद्धि को लेकर गोबर के पुतले बनाकर उनकी पूजा अर्चना की जाती है।

धुरेड़ी के दूसरे दिन चैत्र द्वितीया को आने वाला पर्व भाई दोज कहताता है भाई बहिन के पवित्र रिश्ते में प्रगाढ़ता लाने वाले इस त्योहार पर भाई अपनी बहिन के घर पहुँचकर तिलक लगवाते है एवं उन्हे उपहार भेंट करते है। बहिने भी अपने भाईयो को मिठाई खिलाकर उनसे रक्षा का संकल्प लेती है एवं उन्हे नारियल भेंट करती है एवं उनके दीर्घायु होने की कामना करती है।

बुंदेलखण्ड क्षेत्र में होली दोज पर भाई एवं बहिनो के साथ ही देवरानी एवं जेठानी के संबंधो में मधुरता को लेकर पूजा की जाती है। दोज की सुबह से ही घर की महिलाओं द्वारा घर के आंगन में तुलसी के समीप गोबर के प्रतीक पुतलो के माध्यम से दोज-घर का चित्रण किया जाता है।

 

जिसमें गोबर से बने हुए गाय, बछड़े, उनके भूसा खाने एवं पानी पीने के खिनोटे, चक्की, मूसल, ओखली, चूल्हा, पैसे, कपड़े, पलंग, बर्तन एवं देवरानी जेठानी के गोबर के पुतले बनाये जाते है। जिनकी दिन एवं रात्रि में हल्दी, कुमकुम, चांवल एवं पुष्प, रंग एवं दूध चढ़कार विधि विधान से पूजा अर्चना कर आरती उतारी जाती एवं घी एवं मिष्ठान को होम लगाकर घर में सभी सदस्यो विशेषकर भाई-बहिनो एवं देवरानी जेठानी के रिश्तो में मधुरता की ईश्वर से प्रार्थना की जाती है।

दोज पूजन के दौरान महिलाओं द्वारा भटकटाई के कटीले पौधे को लाकर उसकी मूसल से कुटाई की जाती है ऐसी मान्यता है कि उक्त कटीले पौधे को कुचलने से भाई बहिन एवं देवरानी जेठानी में बुराई एवं कटुता समाप्त हो जाती है। महिलाओं द्वारा रात्रि में उक्त गोबर के दोज पुतलो को चुनरी उड़ाकर उनका शयन किया जाता है एवं बाद में उन्हे एकत्र कर विसर्जन किया जाता है।

पारिवारिक रिश्तो में मधुरता स्थापित करने के लिए महिलाओं द्वारा किये जाने वाले इन प्रयासो की संयुक्त परिवारों में विशेष मान्यता है। इस विशेष पूजन के दौरान महिलाओं द्वारा लोक संगीत के साथ एक साथ दोज गीतो का गायन किया जाता है।