एससी-एसटी एक्ट पर 10 दिन बाद फिर होगी सुनवाई

शेयर करें:

एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के संदर्भ में केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते शीर्ष अदालत ने अपने 20 मार्च के फ़ैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों से तीन दिनों के अंदर लिखित जवाब देने को कहा है। 10 दिन बाद मामले की अगली सुनवाई होगी। अदालत ने कहा कि वह एक्ट के खिलाफ नहीं है लेकिन निर्दोषों को सजा नहीं मिलनी चाहिए।

एससी-एसटी एक्ट से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई शुरु कर दी है । केंद्र सरकार की मामले की सुनवाई मंगलवार को ही करने और खुली अदालत में करने के अनुरोध को स्वीकार करते हुए जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की दो जजों की पीठ ने इस मामले में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई शुरु की । शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को इस मसले पर तीन दिन के भीतर जवाब देने का आदेश देते हुए 10 दिन बाद अगली सुनवाई की बात कही है। केंद्र सरकार ने इसे बड़ी राहत करार दिया है ।

शीर्ष अदालत ने कहा कि हमने ऐक्ट को कमजोर नहीं किया है बल्कि गिरफ्तारी और सीआरपीसी के प्रावधान को परिभाषित किया है। हालांकि कोर्ट ने अपने फैसले पर तो रोक नहीं लगाई है लेकिन दो बातें साफ की हैं । पहला ये कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पीड़ित शख्स को बिना एफआईआर दर्ज किए हुए ही यानि शिकायत दर्ज होने के स्तर पर ही मुआवजा दिया जा सकता है । दूसरा SC/ST एक्ट के अलावा आईपीसी के तहत अन्य धाराओं में FIR दर्ज की जा सकती है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कोर्ट ने जो सुरक्षा उपाय किये है ताकि किसी निर्दोष को सजा न मिले। अदालत ने कहा कि वो एक्ट के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनका मकसद सिर्फ निर्दोष को बचाना है।

इससे पहले सोमवार को केंद्र ने कोर्ट के सामने पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। केंद्र की याचिका में कहा गया है कि – कानून में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के आदेश बाद इस कानून का उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा। अग्रिम जमानत के रास्ते खोलने से इसका अभियुक्त दुरुपयोग करेगा और पीड़ित को धमका सकता है और वो जांच को प्रभावित कर सकता है। अभियुक्त के अधिकारों के संरक्षण के साथ ही एससी, एसटी समुदाय को संविधान में मिले अधिकारों को संरक्षित करना भी महत्वपूर्ण है।

सुनवाई के दौरान भी केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि कानून के प्रावधान में किसी गाइडलाइन की जरूरत नहीं है । इस आदेश के बाद समाज में जबरदस्त रोष है और प्रदर्शन हो रहे हैं। कोर्ट के फैसले से 1989 में बने इस कानून के कुछ कड़े प्रावधान हल्के हो जाते हैं जिसका व्यापक असर पड़ रहा है । अनुसूचित जाति और जनजाति की बड़ी आबादी पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक्ट 1989 से जुड़ा एक अहम फैसला दिया था। इस फैसले में एक्ट के प्रावधानों को नरम करते हुए कहा था कि एससी-एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न की जाए। एक्ट के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत को मंजूरी दी जाए जबकि मूल कानून में अग्रिम जमानत की व्यवस्था नहीं की गई है। कोर्ट के इस फैसले के बाद इसका विरोध शुरु हो गया और मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।