गणेश चतुर्थी : गणपति के अदभुत स्वरूप का रहस्य व्यक्तित्व निर्माण, राष्ट्र निर्माण के लिए संदेश देता है – योग गुरु महेश अग्रवाल

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आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने कहा कि सत्य की खोज करनी है तो मन व बुद्धि के स्तर पर आराधना करें । प्रेम और करुणा ही मानव विकासक्रम का सार है। देना और बदले में कुछ भी नहीं चाहना मानव धर्म है। जीवन में दुख तो होगा पर दुखी होना जरूरी नहीं है।

गणेश चतुर्थी के अवसर पर सभी को शुभकामनायें देते हुए बताया गणपति के अदभुत स्वरूप का रहस्य हमारे व्यक्तित्व निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण के लिए संदेश देता है उसका पालन करके हम भी गणनायक बन सकते हैं – बुधवार को प्रथम पूज्य श्री गणेश की पूजा की जाती है। गणपति लंबोदर एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। उनके चारों हाथ अलग मुद्रा में नजर आते हैं, इनमें से एक वरमुद्रा में है और शेष तीन में वे क्रमश: पाश, अंकुश, और मोदक पात्र धारण करते हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी हैं।

गणपति को रक्त चंदन का तिलक लगा होता है। श्री गणेश हिंदू धर्म में प्रथम पूजनीय देव हैं, उन्हें श्री विष्णु, शिव, सूर्य तथा मां दुर्गा के साथ नित्य वंदनीय पंच देवताओं में सम्मिलित किया गया है। कोई भी पूजा या धार्मिक और सामाजिक संस्कार गणपति पूजन के बिना सफल नहीं होता है। जब वे खुश होते हैं तो समस्त दुखों का नाश कर देते हैं और रुष्ट होते हैं तो हर कार्य में बाधा उत्पन्न हो जाती है। परंतु क्या आपने सोचा है कि समस्त देवी देवताओं के पूजन के पूर्व श्री गणेश वंदना क्यों होती है और उनका स्वरूप बड़े कान, छोटे नेत्र, विशाल पेट और गजमुख जो सूंड़ से युक्त है,  समस्त अंगों का उनका ये अदभुत रूप ही उनके गुण हैं, और इन्ही अदृश्य गुणों के कारण प्रथम पूजनीय गणपति आदिदेव हैं जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया।

ॐ का प्रतीक हैं गणपति– शारीरिक विचित्रता में ही श्री गणेश के सारे गुण विद्यमान हैं तथा इनके कारण ही शारीरिक आकार के बावजूद गणेश प्रधान, सर्वप्रथम वंदनीय और पूजनीय हैं। उनकी शारीरिक संरचना में विशिष्ट व गहरा अर्थ छिपा है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव अर्थात ॐ कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूंड है। उनकी चार भुजाएं चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक हैं, और मनुष्य को क्रियाशील रहने का संदेश देते हुए बताती हैं कि दो हाथों को चार भुजाओं की तरह प्रयोग कर कार्य को समय पर सम्पन्न करना चाहिए। समस्त चराचर सृष्टि उनके उदर में विचरती है इसीलिए वे लंबोदर हैं। साथ ही ये विशाल पेट बताता है कि हर अच्छी और बुरी बात को पेट में ही रख कर हजम कर लें वैमनस्य ना फैलायें। गणेश जी के बड़े कान अधिक ग्राह्यशक्ति और छोटी पैनी आंखें तीक्ष्ण अन्वेषी दृष्टि की प्रतीक हैं। उनकी लंबी नाक यानि सूंड उनके अति बुद्घिशाली होने का प्रमाण है इसीलिए उन्हें ज्ञान और विद्या का देवता भी कहा जाता है। साथ ही लंबी नाक आशय सम्मानित और प्रतिष्ठित होने से भी है।

मोदक और मूषक भी हैं विशेष  – गणेश जी का शरीर ही नहीं उनका वाहन और प्रिय भोजन भी अपने में अलग विशेषता रखते हैं। जैसे उनका वाहन अपने आप में विलक्षण है, मूषक कहीं से भी उनकी काया और विशिष्टता के अनुकूल नहीं है लेकिन इसके पीछे एक विशेष रहस्य छुपा है। मूषक को चंचलता का द्योतक माना गया है, इस दृष्टिकोण से गणेश जी चंचलता पर सवारी करके उसे अंकुश में रखते हैं। ऐसा ही रहस्य उनके प्रिय भोजन मोदक यानि लड्डू में भी निहित है। उनके संदेश के अनुसार खाद्य पदार्थ सिर्फ सुस्वाद ही नहीं सहज उपलब्ध और सुपाच्य भी होना चाहिए।

गणेशजी मंगलमूर्ति हैं, इसका सार उनके परिवार में है। महादेव उनके पिता हैं। जगतजननी पार्वती जैसी महिमामय नारी उनकी मां हैं। बड़े भाई कार्तिकेय देवसेना के प्रमुख हैं। ऐश्वर्य की प्रतीक रिद्धि और सामर्थ्य की प्रतीक सिद्धि उनकी पत्नियां हैं। उनके दो पुत्रों में लाभ और क्षेम है। एक अप्राप्य की प्राप्ति कराता है और दूसरा प्राप्य की रक्षा करता है। आशय है परिवार का प्रत्येक सदस्य लोक कल्याण में संलग्न है और प्रतीक यह कि जिस परिवार में सभी सदस्य अपने-अपने कार्य में रत होकर सबका मंगल करने के लिए संकल्पित रहते हों, उसमें उसी प्रकार सुख, शांति और आनन्द बरसता है, जिस प्रकार गणेशजी के परिवार में

श्रीरामचरितमानस में ‘भवानीशंकरों वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ’ कहकर शिव-पार्वती की वंदना की गई है। अर्थात माता श्रद्धा और पिता विश्वास के प्रतीक हैं। हर काम की सफलता के लिए श्रद्धा और विश्वास दोनों आवश्यक है। जहां ये दोनों हों, वहीं आनन्द सम्भव है। गणेशजी इसीलिए मंगलमूर्ति और आनन्द के दाता हैं क्योंकि उनका जन्म श्रद्धा और विश्वास से हुआ है। जिसके मूल में ये दोनों हो वह मोद यानी आनन्द को पसंद करने वाला भी होगा और आनन्द का प्रदाता भी होगा। ठीक उसी भांति जैसे गणेशजी हैं।

जीवन में सार और विस्तार – गणेश के जीवन से जुड़ी बहुश्रुत कथा है। कथा अनुसार जब पृथ्वी की परिक्रमा को लेकर बड़े भाई कार्तिकेय से प्रतिस्पर्धा हुई तब विद्यावान, गुणी, अति चातुर गणेशजी ने माता-पिता की परिक्रमा करके जय प्राप्त की और शिवजी के वरदान से प्रथमपूज्य बने। इसका प्रतीक है कि जीवन को विस्तार में जानने के बजाय उसके सार को जानना अधिक महत्वपूर्ण है। हम सब सदा कार्तिकेय की तरह परिक्रमा के लिए निकल पड़ते हैं। यानी विस्तार में जानने के चक्कर में पिछड़ जाते हैं। मगर जो गणेशजी की तरह भावुक और बुद्धिमान होता है वह सार पर टिकता है। जो माता पिता को ही महत्व देता है वही हर जगह सबसे पहले पूजा जाता है।

गणेशजी जन-जन के मन में रहते हैं और गण या गणों के नायक हैं। इस अर्थ में वे समूह, सामूहिकता और समूह शक्ति के प्रतीक हैं। वे समर्थ हैं क्योंकि उनके पास समूह या समूहों के जन-मन की मिली-जुली ताक़त है। जो सिखाती है कि जो समाज समूहशक्ति में विश्वास करता है, जो अपने नायक में निष्ठा रखता है, वह हर प्रकार के विघ्नों का नाश करके सर्वत्र मंगल की स्थापना में समर्थ हो जाता है। स्वाभाविक है गण शक्ति से परिपूर्ण नायक विशिष्ठ अर्थात विनायक होता है।