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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का 82 साल की उम्र में निधन

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लगभग दो साल से बीमार चल रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का 82 साल की उम्र में निधन हो गया है। पिछले कई दिनों से गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल की क्रिटिकल केयर यूनिट (CCU) में भर्ती थे।आज उन्होंने सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर अंतिम सांस ली. मुलायम यादव का जन्म 1939 में हुआ था और 10 अक्टूबर 2022 को उन्होंने अंतिम सांस ली, उनके निधन की जानकारी उनके बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीट कर दी। मुलायम सिंह को 2 अक्टूबर को अस्पताल में भर्ती कराया था। तभी से उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी और गुरुवार को उन्होंने अंतिम सांस ली।

बता दें कि मुलायम लगभग दो साल से बीमार चल रहे थे। परेशानी बढ़ने पर उन्हें अक्सर अस्पताल में भर्ती कराया जाता था। पहले भी कई बार उन्हें मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका था। उन्हें जून और जुलाई में भी अस्पताल में भर्ती कराया था, लेकिन जांच के बाद छुट्टी दे दी गई। इसी तरह उन्हें जुलाई, 2021 में पेट के संक्रमण और अगस्त, 2020 में पेशाब नली में संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

पहलवान बनना चाहते थे मुलायम सिंह
22 नवम्बर, 1939 को इटावा के सैफई गांव में जन्मे मुलायम सिंह पांच भाई-बहनों में रतनसिंह यादव से छोटे और अभयराम, शिवपाल, राजपाल और कमला देवी से बड़े थे। शुरूआत में पहलवान बनाना चाहते थे। उन्होंने इटावा से स्नातक और आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर किया था। इसी तरह शिकोहाबाद से बैचलर ऑफ टीचिंग की डिग्री लेकर 1965 में करहल इंटर कालेज में प्रवक्ता की नौकरी जॉइंन कर ली, लेकिन राजनीति में सक्रिय होने पर इस्तीफा दे दिया।

चौधरी नत्थूसिंह ने कराया था राजनीति में प्रवेश
मुलायम सिंह के राजनीतिक गुरू संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी नेता चौधरी नत्थूसिंह थे। वह मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती प्रतियोगिता में मुलायम सिंह से प्रभावित हुए थे और उसके बाद उन्होंने 1967 के विधानसभा चुनाव में अपने परम्परागत सीट जसवन्त नगर से टिकट देकर मुलायम सिंह को राजनीति में प्रवेश कराया था। इस चुनाव में मुलायम सिंह ने साइकिल से प्रचार किया था और ग्रामीणों के सहयोग तथा समर्थन ने उन्होंने पहले ही चुनाव में जीत हासिल कर ली।

ग्रामीणों ने छोड़ दिया था एक समय का खाना
1967 के चुनाव में मुलायम सिंह को वाहन और ईंधन का खर्च मुहैया कराने के लिए ग्रामीणों ने इस हद तक समर्थन किया था कि पैसा जुटाने के लिए उन्होंने एक समय का खाना छोड़ दिया था। ग्रामीणों की यह कुर्बानी उन्हें विधानसभा ले गई।

मुलायम सिंह यादव ने एक साल में ही बदल दी थी पार्टी
12 नवंबर, 1967 को संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक राममनोहर लोहिया का निधन होने के बाद पार्टी कमजोर होने लग गई। उस दौरान चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल मजबूत होती दिख रही थी तो मुलायम ने हवा का रुख भांपते हुए 1968 में उसका दामन थाम लिया। हालांकि, 1969 में भारतीय क्रांति दल का संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में विलय होने पर मुलायम भारतीय लोकदल के नेता बन गए। यह उनकी सियासी पारी की तीसरी पार्टी बनी थी।

मुलायम सिंह ने आठ बाद जीता था विधानसभा चुनाव
अपने राजनीतिक सफर में मुलायम सिंह यादव ने आठ बाद विधानसभा चुनाव जीता था। इनमें 1967, 1974, 1977, 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 में हुए विधानसभा चुनाव शामिल हैं। इसी तरह वह 1982 से 1985 तक विधान परिषद के सदस्य रहे थे। इस दौरान उन्होंने नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई थी। इसके अलावा वह 1985 से 1987 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में राजनीति में सक्रिय रहे थे।

दो बार रहे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
मुलायम सिंह ने 1996 में केंद्रीय राजनीति में पैर रखा था। वह लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में बनी संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री बने थे। उसके बाद 1998, 1999, 2004, 2007, 2009, 2014 में भी लोकसभा पहुंचे थे।

तीन बार रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री
मुलायम सिंह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। उन्होंने 1989 से 1991, 1993 से 1995 और 2003 से 2007 तक राज्य के मुख्यमंत्री की कमान संभाली थी। वह 1980 में लोकदल अध्यक्ष और 1985-87 में उत्तर प्रदेश में जनता दल के अध्यक्ष पद पर भी रहे थे। उन्होंने चौधरी चरण सिंह से अनबन होने और उनकी मौत के बाद खुद की पार्टी बनाने का निर्णय किया और 1992 में लखनऊ में सपा की स्थापना की घोषणा कर दी।

विवाद के बाद बेटे अखिलेश यादव को सौंपी पार्टी की कमान
सपा के गठन के बाद मुलायम सिंह 4 अक्टूबर, 1992 से एक जनवरी, 2017 तक पार्टी के अध्यक्ष रहे। साल 2002 में पार्टी में बड़ी जीत हासिल करते हुए सरकार बनाई और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 2017 में पार्टी पर अधिकार को लेकर पिता और पुत्र में विवाद हो गया था। अखिलेश ने बहुमत के आधार पर चुनाव आयोग से पार्टी का चुनाव चिन्ह हासिल कर लिया था। उसके बाद से ही मुलायम सिंह राजनीति से दूर हो गए।

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