आस्‍था की डुबकी : माघ पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं पर हुई आसमान से पुष्‍प वर्षा

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प्रयागराज. संगम की रेती पर लगे माघ मेले में माघ पूर्णिमा का प्रमुख स्नान का आयोजन क‍िया गया. माघ पूर्णिमा पर्व पर ब्रह्ममुहूर्त से ही लाखों की संख्या में श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाई. माघ पूर्णिमा स्नान के बाद कल्पवासी भी अपने अपने घरों के लिए रवाना हो गए. माघी पूर्णिमा स्नान पर्व की अगर बात करें तो इसका बेहद खास महत्व है. धार्मिक मान्यता के अनुसार 27 नक्षत्रों में एक मघा से माघ पूर्णिमा की उत्पत्ति हुई है. इस दिन संगम या फिर गंगा स्नान के बाद दान करने से नरक से मुक्ति और बैकुंठ की प्राप्ति होती है. वहीं हेल‍िकाप्‍टर के जरिए श्रद्धालुओं पर पुष्‍प वर्षा भी की गई.

माघ पूर्णिमा के महत्व का उल्लेख पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन देवतागण मानव स्वरूप धारण कर गंगा स्नान के लिए तीर्थराज प्रयाग की धरा पर आते हैं. जो श्रद्धालु प्रयागराज में एक महीने तक कल्पवास करते हैं, उसका समापन भी माघ पूर्णिमा पर ही होता है. इस बार 26 फरवरी को व्रत की पूर्णिमा तथा 27 फरवरी 2021 को दान की पूर्णिमा थी. शिव योगी मौनी महाराज के मुताबिक़ पौराणिक कथाओं में इसका वर्णन है कि माघ पूर्णिमा पर खुद भगवान विष्णु गंगाजल में वास करते हैं.

इसलिए इस दिन गंगा स्नान का महत्व बेहद खास हो जाता है. जो लोग इस दिन संगम या गंगा जल से स्नान न कर पाएं वे डुबकी लगाकर नदी व सरोवरों में स्नान कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं. पद्म पुराण के अनुसार माघ पूर्णिमा स्नान के बाद ध्यान और जप-तप से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं तो मुक्ति और बैकुंठ की प्राप्ति होती है. इस दिन दान करने का बड़ा महत्व है. गोदान, तिल, गुड़ और कंबल दान का विशेष महत्व है. वस्त्र, गुड़, घी, कपास, लड्डू, फल, अन्न आदि चीजों का दान कर सकते हैं. इस दिन भगवान सत्य नारायण की कथा का भी विशेष महत्व है.

ज्योतिषी रमेश जी शास्त्री के अनुसार माघ मास में देवता पृथ्वी पर निवास करते हैं. माघ पूर्णिमा पर शीतल जल गंगा में डुबकी लगाने से व्यक्ति पापमुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्ति होती है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन गंगाजल के स्पर्श मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है. शरीर के सारे रोग दूर हो जाते हैं. संगम तट पर महीने भर से चल रहे कल्पवास की भी पूर्णता इसी खास दिन पर होती हैै.

यहां से जाते समय कल्पवासी गंगा जल को लेकर जाते हैं और साल भर तक उसे ग्रहण करतें हैं। महीने भर के कल्पवास के बाद श्रद्धालुओं के लिए संगम की रेती को छोड़ना बेहद भावुक पल होता है. माघी पूर्णिमा स्नान के साथ ही माघ मेले का अनौपचारिक तौर पर समापन भी माना जाता है, इसके बाद से ही यहां पर लगे तंबू भी उखड़ने लगतें हैं. हालांकि औपचारिक तौर पर माघ मेले का समापन 11 मार्च को महाशिवरात्रि स्नान के साथ होगा.