पहले व्यक्ति को भगवान कृष्ण-राम का पिता बनाया, फिर भगवान की मृत्यु हो गई, उसके बाद जमीन फर्जी पिता को दे दिया

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मोहनलालगंज। बेशकीमती जमीनों को हड़पने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते. ऐसा ही एक मामला मोहनलाल गंज के कुशमौरा हलुवावुर में सामने आया है कि जमीन हड़पने के लिए एक आदमी ने भगवान ही मृतक बना दिया. पहले तो दस्तावेजों में एक व्यक्ति को ही भगवान कृष्ण-राम का पिता बनाया फिर कृष्ण-राम की मृत्यु हो गई. इसके बाद जमीन का मालिकाना हक फर्जी पिता को दे दिया.फर्जीवाड़े के बारे में मंदिर के ट्रस्टी की शिकायत नायब तहसीलदार से होते हुए कलेक्टर तक पहुंची. न्याय नहीं मिला तो

मामला डिप्टी सीएम तक जा पहुंचा तब जाकर जांच शुरू हुई. जांच के बाद पता चला कि पीड़ित मंदिर का ट्रस्ट की शिकायत सही पाई गई.चकबंदी के दौरान मंदिर विग्रह, जिनके नाम पर जमीन थी, उसी नाम से किसी शख्स को दस्तावेजों में जालसाजी करके दर्ज किया था. मामला मोहनलालगंज के कुशमौरा हलुवापुर का है.

डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा के निर्देश पर एसडीएम सदर प्रफुल्ल त्रिपाठी को जांच सौंपी गई. पीड़ित की अर्जी में बताया गया कि वादी मंदिर यानी ट्रस्ट है. सखरा 138त्र 159 और 2161 कुल रकबा 0.730 हेक्टेयर कृष्णाराम भगवान के ना पर खतौनी दर्ज है. मंदिर सौ साल पुराना है. भगवान के नाम 1397 फसली की खतौनी तक यह लगातार दर्ज है.

1987 में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान कृष्णराम को मृतक दिखाकर उनके पिता गया प्रसाद को वारिस बताते हुए नाम दर्ज किया दर्ज गया है. इसके बाद 1991 में गया प्रसाद को भी मृत दर्शाकर उसके भाई रामनाथ और हरिद्वार का नाम फर्जी तौर पर दर्ज किया गया. मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सुशील कुमार त्रिपाठी ने वर्ष 2016 में तहसील दिवस के दौरान भी फरियाद की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की.

जांच में फर्जी निकला मामला
वर्ष 2018 में जब पीड़ित डिप्टी सीएम निदेश शर्मा से मिले तो उन्होंने इस मामले की जांच के निर्देश डीएम लखनऊ को दिए है. एसडीएम सदर प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी के अनुसार जांच में पाया गया कि पूर्व मंदिर और जमीन कृष्ण-भगवान के नाम ही दर्ज थी.
गौरतलब कि दस्तावेजों में भगवान के विग्रह को व्यक्ति के रूप में मान्यता दी जाती है. कुछ लोगों ने हेराफेर करके उसी नाम से किसी शख्स को दस्तावेजों में दर्ज कर दिया. एसडीएम ने बताया कि पहली बार 1968 में यह जमीन मंदिर के नाम पर तहसीलदार के आदेश से दर्ज हुई थी.तहसीलदार ने पट्टा किया था जिस पर मंदिर का निर्माण हुआ है. इससे पूव्र वह जमीन बंजर के नाम थी.अब एक और जांच इस बात की चल रही है कि क्या तहसीलदार को उस समय सीधे तौर पर पट्टा करने का अधिकार था. यह जांच पूरी नहीं हुई है.