शिक्षा विस्तारीकरण के नाम पर चल रहे फर्जी स्कूल

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शिक्षा विस्तारीकरण के नाम पर चल रहे असली नकली स्कूल और नकली को बंद कराने की मुहिम पर विशेष-

✍ भोलानाथ मिश्र

शिक्षा के विस्तारीकरण के नाम पर इधर दो चार दशकों से सरकारी एवं गैर सरकारी मान्यताप्राप्त स्कूलों के साथ ही साथ “स्कूलों” की बाढ़ सी आ गयी है। कोई पेड़ के नीचे तो कोई छप्पर के नीचे तो कोई किराये के कमरे में तो कोई अपने घर में ही स्कूल चला रहे हैं। जिस तरह झोला छाप डाक्टर फिजीशियन एण्ड सर्जन का बोर्ड लगाकर गली गली दवाखाना चला रहे हैं उसी तरह बिना मान्यता प्राप्त स्कूल भी गाँव गाँव गली गली लम्बा चौड़ा मान्यता प्राप्त का बोर्ड लगाकर स्कूल रूपी दूकान चला रहे हैं।

इन बिना मान्यता प्राप्त स्कूलों के बच्चों की वजह से शैक्षणिक घोटाले होते हैं क्योंकि इन बच्चों के नाम किसी न किसी सरकारी अथवा मान्यताप्राप्त स्कूलों में पंजीकृत कराये जाते हैं और वहीं से परीक्षा दिलवाकर सार्टिफिकेट भी दिलवा दिये जाते हैं।

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फर्जी दाखिले के नाम पर एक मोटी रकम वसूली जाती है और नकल की सुविधा उपलब्ध कराकर बढ़िया परीक्षाफल दिलवाया जाता है।इन नकली स्कूलों की वजह से असली स्कूलों का वजूद ही खतरे में नहीं पड़ता जा रहा है बल्कि शिक्षा के स्तर में गिरावट आ रही है।

शिक्षा के नाम दूकानें चलाकर शिक्षा को नीलाम करने का दौर शुरू हो गया है और इस कार्य में मान्यताप्राप्त तथा बिना मान्यताप्राप्त दोनों जुटे हुये हैं। कुकुरमुत्तों की तरह गली गली चलने वाले दूकाननुमा इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने वाले खुद शिक्षक प्रायः जूनियर हाईस्कूल से लेकर इंटर तक ही पढ़े होते हैं और उन्हें ढंग से पढ़ाने का तरीका कौन कहे व्याकरण एवं शब्दों तक का ज्ञान ढंग से नहीं होता है। गाँव गलियों कस्बों और बाजारों में बिना मान्यता स्कूलों के खुलने का एक सिलसिला लगातार चल रहा है। गाँव गली मोहल्लों में खुलने वाले कुछ स्कूल तो चलते हैं तो कुछ साल दो चार साल बाद हो जाते हैं।

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इन बिना मान्यताप्राप्त स्कूलों में ऐसा कोई नहीं है जो कि चोरी से चलता हो बल्कि सभी खुलेआम विभागीय शह के बिना नहीं चलते हैं। इन फर्जी स्कूलों को बंद कराने की मुहिम सरकार हर साल शिक्षा सत्र शुरू होने पर मौके पर कम कागजों पर अधिक चलाती है और हर साल नोटिस देकर कागज पर इन अपंजीकृत स्कूलों को बंद करवा दिया जाता है।

इस साल भी इन बिना मान्यता प्राप्त विद्यालयों को चिन्हित करके उन्हें सूचीबद्ध करके हमेशा की तरह बंद करने की नोटिश थमा दी गई है। नोटिश देने के बाद अब इस समय शिक्षा विभाग उपजिलाधिकारी तहसीलदार या मजिस्ट्रेट और पुलिस की संयुक्त टीम इन विद्यालयों को बंद कराने औपचारिकता पूरी कर रहा है।

दरअसल स्कूल खोलना बुरी बात नहीं है बल्कि एक समय में स्कूल चलाने वाले का समाज में बहुत सम्मान किया जाता था क्योंकि शिक्षा दान को सर्वोत्तम दान और शिक्षा देने वाले को दानवीर कहा जाता है। यह सही है कि सरकारी शिक्षा की चरमराती व्यवस्था में इन गैर सरकारी स्कूलों खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों का बहुत महत्व है। इन गैर सरकारी विद्यालयों से शिक्षा का स्तर एवं लोगों की अभिरूचि बढ़ी है फलस्वरूप आज नब्बे फीसदी परिवारों के बच्चे इन गैर सरकारी स्कूलों में पढ़ने जा रहे हैं।

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अभिभावक से पढ़ाई से मतलब होती है विद्यालय मान्यता प्राप्त है की नही है इससे उससे मतलब नहीं होता है।नियमानुसार रजिस्ट्रेशन कराने के बाद ही विद्यालय की शुरुआत की जा सकती है और उसके बाद अलग अलग स्तर पर मान्यता लेनी पड़ती है।जूनियर हाईस्कूल की मान्यता लेकर हाईस्कूल या इंटर कक्षायें चलाना गलत है लेकिन अभिभावक इसे बुरा नहीं मानता है क्योंकि उससे पढ़ाई और परीक्षा परिणाम से मतलब होता है। ????????