बिजली विभाग द्वारा किसानों की खेती के मुफ्त में व्यवसायिक इस्तेमाल पर विशेष

शेयर करें:

✍ भोलानाथ मिश्र

क परम्परा है कि जो भी किसी की भूमि भवन आदि का इस्तेमाल अपने व्यवसायिक या निजी कार्यों के लिए करता है उसके बदले उसका किराया उस भूस्वामी या भवन स्वामी आदि को प्रतिमाह देता है। मोबाइल कम्पनियां अपना टावर लगाने के लिए जो भूमि किराये पर लेती हैं उसका प्रतिमाह भुगतान करते हैं।

इसी तरह तमाम व्यवसायिक कार्य या अन्य कार्य किराए पर जमीन आदि लेकर होते हैं। किसान के पास उसकी खेती ही उसके जीवन की पूंजी होती है और उसी खेती के सहारे अपने परिवार का पालन पोषण एवं अपने अन्य जरूरी कार्य सम्पादित करता है। खेती ही उसकी कमाई का एकमात्र मुख्य जरिया होती है और उसके लिए बिसुवाँ दो बिसुवा जमीन का बहुत महत्व होता है।

किसान की सबसे ज्यादा भूमि बिजली के खंभे लगने पर खराब होती है क्योंकि जहाँ पर बिजली पोल लगता है उसके आसपास की भूमि खेती करने लायक नहीं बचती है।बिजली विभाग की अधिकांश छोटी बड़ी लाइनें किसानों के खेत से होकर गुजरती है और गर्मी के दिनों इन्हीं लाइनों से निकलने वाली चिंनगारिया देखते ही देखते किसान की फसल को जलाकर किसान को दाने दाने का मोहताज बनाकर तबाह कर देती है।

हालांकि बिजली से फसल नुकसान होने पर बिजली विभाग किसान को मुआवजा देता है लेकिन उस मुआवजे से किसान की लागत भी नहीं आ पाती है और वह मुआवजा उसके लिये ऊँट के मुँह में जीरे के समान होता है। बिजली विभाग एक व्यवसायिक सरकारी संस्था होती है जो उपभोक्ताओं के हाथ अपने उत्पाद की बिक्री करके उससे मुनाफा कमाती है और अपना रोजगार चलाती है।

उसे अपने व्यवसाय के लिये बिजली की लाइनें बनानी पड़ती है और यह लाइनें अधिकांश किसानों के खेतों से होकर गुजरती हैं और किसान की अच्छी भली भूमि इसमें बरबाद हो जाती है।खम्भें के आसपास फसल पैदा नहीं हो पाती है और खेत का उपयोग नहीं हो पाता है।बिजली विभाग किसानों की भूमि पर पोल तो जरूर गाड़कर खेत को बरबाद कर देता है लेकिन किसानों को इसके बदले में कोई किराया अथवा छूट नही देता है।

बिजली विभाग समय समय पर अपनी बिजली के मूल्यों में वृद्धि तो करके अपनी कमाई को बढ़ाता रहता है लेकिन जिसके सहारे उसका व्यवसाय चलता है उसे उस कमाई में भागीदार नहीं बनाता है।अगर किसान अपने खेतों से बिजली ले जाने से रोक लगा दे तो बिजली का व्यवसाय नहीं चल सकता है।एक तरह से किसान ही बिजली विभाग का मुख्य अन्नदाता भगवान होता है तथा उसी के सहारे विभागीय अधिकारी कर्मचारी मौज करते हैं। लेकिन किसान की खेती बरबाद होने से हर साल किसानों को हजारों का नुकसान झेलना पड़ता है।

यह सही है कि इसी लाइन के सहारे किसानों के नलकूप चलते हैं लेकिन नलकूप में जो बिजली खर्च होती है उसका बिल भी तो वह उस किसान से वसूल लेता है और बिल अदा न कर पाने पर बेदर्दी के साथ उसकी बिजली भी काट देता है। कहने का मतलब सिर्फ बिजली विभाग ही इकलौती व्यवसायिक संस्था है जो कि बिना किराया या मुआवजा न देकर हरामखोरी करता है।बिजली विभाग अपने व्यवसायिक एवं नैतिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन न करके किसानों के साथ अन्याय कर रहा है।

बिजली विभाग का दायित्व बनता वह किसानों के खेत में पोल गाड़ने से होने वाली क्षति के बदले उसे या तो मुफ्त में बिजली दे या फिर व्यवसायिक दरों पर वह उस भूमि का किराया प्रतिमाह दे।किसानों की हमदर्द बनने वाली राजनैतिक पार्टियों तथा सरकार का फर्ज बनता है कि किसानों के साथ न्यायिक व्यवहार करते हुये इस दिशा में न्यायिक पहल शुरू करें।दुख की बात है कि किसानों के प्रति हमदर्दी तो बहुत दिखाई जाती है लेकिन आजतक इस दिशा में किसी ने भी विचार ही नही किया है। ????????