योग से बच्चों में एकाग्रता और सजगता के गुण विकसित करें -योग गुरु महेश अग्रवाल

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योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि योग केंद्र पर बच्चों को योग का विशेष प्रशिक्षण इस उद्देश्य से दिया जाता है कि बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़े |जब आप बच्चों को योग की शिक्षा देने की बात सोचते हैं तो कम-से-कम शारीरिक संरचना एवं शरीर विज्ञान का मौलिक ज्ञान होना आवश्यक है। शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके और छात्रों के शरीर दो अलग-अलग अवस्थाओं में हैं, इसलिए उसके लिए यह समझना आवश्यक है कि बच्चे में शारीरिक एवं ज्ञानात्मक विकास किस प्रकार होता है।

बच्चों में शारीरिक विकास की प्रक्रिया बचपन से किशोरावस्था तक निरंतर चलती रहती है। जीवन के पहले दो वर्षों में यह प्रक्रिया अत्यधिक तीव्रता से होती है और बचपन के मध्य भाग में इसकी गति धीमी हो जाती है। बाद में यौवनारंभ के साथ शरीर का अचानक विकास होने लगता है और वयस्क लंबाई प्राप्त हो जाने पर यह बंद हो जाता है।योगासनों का वर्गीकरण उनको करने की कठिनाई या अभ्यासों की गत्यात्मकता/स्थिरता के आधार पर किया जाता है।

बच्चों को सिखाते समय सबसे पहले सरल, फिर मध्यम प्रकार के और क्रमश: कठिन से कठिनतर आसन बताये जाने चाहिए। बच्चों की कक्षाओं में सिखाये जाने वाले आसनों में मुख्यतया गत्यात्मक अभ्यास होते हैं लेकिन कुछ स्थिर रहने वाले आसन भी सिखाये जाने चाहिए ताकि बच्चे कुछ देर के लिए शांत होकर बैठना भी सीख लें। बच्चा ज्यों-ज्यों बड़ा और परिपक्व होता जायेगा, वह स्वयं स्थिरता वाले आसनों को पसंद करने लगेगा और उनकी माँग करने लगेगा। योग इतिहास या गणित के समान नहीं है जिसे केवल बुद्धि एवं स्मृति के द्वारा सीखा जा सकता हो। इसे समग्र व्यक्तित्व के माध्यम से समझना और इसका अभ्यास करना है। इसके लिए कम-से-कम एक अभ्यास प्रतिदिन किया जाना चाहिए।

प्रतिदिन सुबह में सूर्य नमस्कार का अभ्यास करना चाहिए। पहले दो दिन आसनों को सिखाया जाना चाहिए, उसके बाद जब शिक्षक आसनों की संख्या बोलें तो बच्चों को उनके अनुसार आसन करने चाहिए। कम-से-कम दो हफ्तों तक, जब तक बच्चे आसनों को स्वयं नहीं करने लगते हैं, तब तक एक प्रदर्शक द्वारा बच्चों के सामने आसनों का प्रदर्शन किया जाना चाहिए। सूर्य नमस्कार के तीन चक्रों का अभ्यास किया जाना चाहिए। एक चक्र में बारह आसनों को दो बार किया जाता है, इस प्रकार कुल मिला कर प्रत्येक स्थिति का अभ्यास छः बार किया जाता है। अभ्यास के पूरा हो जाने पर प्रत्येक बच्चे को किसी आरामदायक आसन में बैठ जाना चाहिए, मेरुदंड और सिर सीधे रहें, हाथों को घुटनों पर या गोद में रखें।

एक सप्ताह तक बच्चे अपने श्वास के प्रति सजग होने अभ्यास कर सकते हैं। आँखों को बंद करके उन्हें अपने श्वास के प्रवाह को देखना है, उसके आने-जाने का अनुभव करना है। एक सप्ताह के बाद वे नाड़ी शोधन प्राणायाम की प्रारंभिक अवस्था का अभ्यास आरंभ कर सकते हैं जिसे उन्हें पूरे साल हर सुबह करना होगा। पाँच बार बायीं नासिका से और पाँच बार दायीं नासिका से धीमे श्वसन का अभ्यास दो बार करना होगा। प्राणायाम करते समय बच्चों को अपनी आँखें बंद रखनी हैं और उन्हें केवल अपने श्वास के प्रति सजग रहना है।

योग शिक्षक को प्रत्येक बच्चे के प्रति बहुत सावधान रहने की आवश्यकता होगी। बच्चों के द्वारा किसी भी आसन को आवश्यकता से अधिक नहीं करना है या शरीर में किसी भी प्रकार का तनाव नहीं आने देना है। यदि कोई बच्चा किसी विशेष आसन को नहीं कर पाता है तो उसे करने के लिए जोर नहीं डालना चाहिए। शिक्षक को बच्चों का मार्गदर्शन तो करना ही चाहिए, साथ ही उनके साथ अभ्यास भी करना चाहिए ताकि दोनों को समान अनुभव प्राप्त हो। हर कक्षा के बाद बच्चों को अभ्यास के क्रम में उत्पन्न होने वाली अपनी समस्या या भ्रम के विषय में शिक्षक से बातचीत करने का अवसर मिलना चाहिए।

कुछ निर्देश

  • आसनों का अभ्यास चार तहों में मोड़े गये कंबल या दो तहों वाली चटाई पर करना चाहिए; सख्त जमीन या फिसलने वाली पतली चादर पर नहीं।
  • हल्के, ढीले और आरामदायक कपड़े पहनने चाहिए।
  • आसन एवं प्राणायाम के पहले मूत्राशय खाली होना चाहिए।
  • आसन एवं प्राणायाम के अभ्यास के समय पेट खाली होना चाहिए या कम-से-कम भोजन के तीन घंटों के बाद अभ्यास करना चाहिए।
  • बच्चों को एक व्यावहारिक पुस्तिका रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है जिसमें वे प्रत्येक कक्षा के पाठों को लिखें और शिक्षक की हल्की निगरानी में ही व्यक्तिगत रूप से आसनों के अभ्यास कर पायें।

आदर्श योग आध्यात्मिक योग केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल कई वर्षो से निःशुल्क योग प्रशिक्षण के द्वारा लोगों को स्वस्थ जीवन जीने की कला सीखा रहें है वर्तमान में भी ऑनलाइन माध्यम से यह क्रम अनवरत चल रहा है |