पोल्ट्री किसानों ने लगाई सरकार से मदद की गुहार, कोरोना के चलते चौपट हुआ पोल्ट्री व्यापार

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हाँ एक तरफ पूरी दुनिया में कोरोना वायरस ने कोहराम मच रखा है, वहीँ लॉकडाउन के चलते पोल्ट्री फार्म किसानो पर बहुत इसका बहुत गहरा असर पड़ रहा है। लोगों ने चिकन खाना कम कर दिया है, और सोयाबीन और मक्का की सबसे ज्यादा खपत चिकन कारोबार में है जो इस समय किसान बड़ा नुकसान झेल रहा है। पॉल्ट्री व्यवसाय को पुनः जिंदा करने के लिए छोटे पोल्ट्री किसानों को ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराने की मांग सरकार से की है।

ऑल इंडिया पोल्ट्री ब्रीडर्स एसोसिएशन (एआईपीबीए) ने दो मार्च को सरकार से राहत पैकेज की मांग करते हुए दावा किया कि इस क्षेत्र में एक महीने में लगभग 1,750 करोड़ रुपए का भारी नुकसान हुआ है। चिकन की मांग में गिरावट के कारण पोल्ट्री बर्ड की कीमतें 5 -10 रुपए प्रति किलोग्राम तक गिर गई हैं जबकि उत्पादन की औसत लागत 80 रुपए प्रति किलोग्राम है।

पोल्ट्री व्यवसाय के ध्वस्त होने का इसका प्रभाव मक्का मार्केट पर भी काफी हद तक पड़ रहा है। कर्ज लेकर व्यवसाय कर रहे लोगों की हालत यह है कि आने वाले दिनों में उनके कर्ज लौटाने का भी भय सता रहा है।

मुर्गी में कोरोना वायरस का कोई प्रभाव नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। शासन से मिले निर्देश के बाद स्वास्थ्य विभाग और पशुधन विभाग ने अपने-अपने स्तर पर सोशल मीडिया में चल रहे अफवाहों को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया है। लोगों को अफवाहों से बचने की सलाह दी है। करीब एक माह पहले खड़ा बायलर 140 रुपए किलो में बिक रहा था, लेकिन जब से सोशल मीडिया में अफवाह उड़ी है, इसकी कीमत में काफी गिरावट आ गई है। किसानो को इससे मेहनताना निकाल पाना भी मुश्किल हो गया है।

 

एक व्यवसायी ने बताया कि जिले मेंं प्रतिदिन औसतन करीब 8 लाख रुपए का कारोबार होता था, लेकिन अब 3 लाख से भी कम का कारोबार हो रहा है। इससे परेशानी बढ़ गई है। उन्होंने आगे बताया कि केन्द्र शासन ने अफवाहों को लेकर खंडन भी जारी किया है। इसके बाद भी व्यापार से रौनक खत्म हो गई है। व‌र्ल्ड एनीमल हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक विश्व में कहीं भी पोल्ट्री से मानव में कोरोना संक्रमण की सूचना प्राप्त नहीं हुई है। पोल्ट्री उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण की अफवाह से अंडा एवं पोल्ट्री व्यवसाय प्रभावित हो रहा है। गरीब किसानों की जीविका पर कुप्रभाव पड़ रहा है।

मुर्गी दाना पर भी असर :
पोल्ट्री व्यवसाय पर असर पड़ने से मुर्गी दाने की खपत भी कम हो गई है। इससे किसानों को नुकसान पहुंच रहा है। मक्का, बाजरा व सोयाबीन, सरसों आदि का 70 से 95 फीसदी इस्तेमाल मुर्गी दाना में किया जाता है। देश में सोयाबीन उत्पादन के क्षेत्र में मध्य प्रदेश का पहला स्थान है जिसकी हिस्सेदारी 55 से 60 प्रतिशत के बीच है। सोयाबीन का रेट इसलिए भी कम हो रहा क्योंकि देश के पोल्ट्री कारोबार पर कोरोना वायरस का बहुत बुरा असर पड़ा है। लोगों ने चिकन खाना कम कर दिया है और सोया मिल्स की सबसे ज्यादा खपत चिकन कारोबार में है जा इस समय बड़ा नुकसान झेल रहा है। मक्का का प्रतिकिलो मूल्य 20-22 रुपये से घटकर 13-14 रुपये हो गया है। पोल्ट्री व्यवसाय के ध्वस्त होने का इसका प्रभाव मक्का मार्केट पर भी काफी हद तक पड़ रहा है. किसान बताते है कि “मुर्गियों को खिलाने के लिए जो दाना बनाया जाता है उसमें 60 फीसदी मक्का होता है. इसके अलावा चावल की ब्रान 10 फीसदी उपयोग में लाई जाती है. मुर्गियों के खाने के लिए बनने वाले विभिन्न तरह के दानों का रोजाना उत्पादन होता था. मार्च अप्रेल महीने में तो बिक्री ही नहीं हुई है”.

छोटे किसानों का उजड़ गया रोजगार
वायरस की अफवाह के चलते उनके रोजगार पर संकट का बादल मंडराने लगा है। बायलर समेत अन्य कॉकरेल मुर्गियों की खपत भी काफी कम हो गई है। सूत्रों की मानें तो डेढ़ महीने में उन्हें लाखों रुपए का नुकसान उठाना पड़ा है। उल्लेखनीय है कि एक – एक शहर में करीब थोक और चिल्हर को मिलाकर करीब 500 पोल्ट्री व्यवसायी है, जो मुर्गी बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में पोल्ट्री व्यवसाय का देश की अर्थव्यवस्था में 10000 करोड़ रुपयों से ज्यादा का योगदान है। इस योगदान का अधिकांश भाग छोटे किसानों के जरिए ही आता है। ऐसे में यह जरूरी है कि इन छोटे किसानों को राज्य की सहायता मिले, जिससे इस व्यवसाय को दोबारा ज़िंदा किया जा सके।

मध्य प्रदेश के जबलपुर में पचास हज़ार ब्रायलर और देसी नस्ल के मुर्गे-मुर्गियों का पोल्ट्री फार्म चलाने वाले एक किसान ने बताया – आने वाले समय में पोल्ट्री का व्यवसाय छोड़ कुछ और करने का सोच रहे हैं, पोल्ट्री में घाटे के अलावा कुछ भी नहीं है, कभी फीड महंगा हो जाता है, कभी कोई बीमारी आ जाती है। इस बार तो बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है।”