वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन की किताब ‘बॉम्बे मेरी जान’ की समीक्षा…

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मुंबई और दिल्ली महानगर में रहने वाले लोगों को बहुत शौक होता है, अपने शहर को बढ़ा-चढ़ा कर बताने का। यह बात भी लाजिम है कि एक बार जो मुंबई कुछ सालों के लिए रह लेता है, उसे किसी भी दूसरे शहर में जा कर रहने में कई बुनियादी दिक्क्तें आती हैं। सबसे बड़ी बात, सुरक्षा, प्रोफेशलिज्म और जिंदादिली। मुंबई शहर में जीना और रहना आसान नहीं है। पर इस शहर की इतनी खासियतें हैं कि आपको संघर्ष करते हुए भी यहां रहने की आदत पड़ जाती है।

मुंबई की इन खासियतों को बखूबी उभारा है पत्रकार और लेखिका जयंती रंगनाथन ने अपनी किताब ‘बॉम्बे मेरी जान में’। बॉम्बे इसलिए, क्योंकि जिस दौर में वे मुंबई में रहा करती थीं, यह शहर इसी नाम से जाना जाता था।

यह किताब ना उपन्यास है ना कहानी और ना ही आत्मकथा। इसे आप संस्मरण कह सकते हैं। लेखिका के ही शब्दों में, एक बार जब आप इस मायानगरी के रंग में रंग जाते हैं, तो रात-दिन की भाग-दौड़, आसपास की भीड़ में भी अपनेपन का अहसास होने लगता है। हर दिन दफ्तर आते-जाते मुंबई की लोकल ट्रेन में आपको नए किरदार देखने-बुनने को मिलते हैं। ना जाने कितनी कहानियां हर वक्त आपके आसपास तैरती रहती हैं। मुंबई को अगर जानना है, तो खुद एक कहानी बनना होगा।

लेखिका ने इस किताब में तीन किरदारों के बारे में लिखा है, लोकल ट्रेन में गाने-बजाने वाला चरसी बालक हीरा, अपने गुरूर में रहने वाली बार डांसर शबनम और हिजड़ा ज्योति। इन तीनों से लेखिका कैसे मिलीं, कैसे उनके साथ उनकी दुनिया की एक झलक देखी और कैसे इस दौरान मुंबई शहर को बदलते देखा, इसका बहुत खूबसूरती से चित्रण किया गया है।

वो छोकरा का नायक हीरा उर्फ छगन बचपन में अपने घर से भाग कर मुंबई आ गया है। दादर स्टेशन पर कूड़ा-कचरा बीनने का काम करता है। परिस्थितयां उसे ऐसे सूरदास गायक के पास पहुंचाती है, जो उसे अपनी विद्या तो देता है, पर उस पर कम कहर नहीं ढाता। इस पूरी प्रक्रिया में हीरा मजबूत होता जाता है। हीरा के बहाने मुंबई में काम करने वाले उन हजारों-हजार बाल श्रमिकों का मर्मस्पर्शी वर्णन है, जो अकसर गलत हाथों में पड़ जाते हैं। उनका शारीरिक शोषण होता है। अपने बचपन से अनजाने ये बच्चे बहुत जल्द ड्रग का शिकार हो जाते हैं। कई बच्चे अपराध की दुनिया में शामिल हो जाते हैं। सड़कों, झुग्गियों और स्टेशन पर रहने वाले ये बच्चे ऐसी दुनिया में जीते हैं, जहां इन्हें ठोकरें, जिल्लत और तबाही हासिल होती है। हीरा की जिंदगी में तमाम उथल-पुथलों से गुजरती है। अंतिम बार जब वह लेखिका को मिलता है, वह लिखती हैं, हीरा जैसे बच्चे हर हाल में अपने लिए रास्ता बना लेते हैं। पच्चीस साल हो गए इस बात को। हीरा अगर जिंदा है तो चालीस साल का भरा-पूरा आदमी होगा… जेल के अंदर, बाहर, चरसी, जुआरी, कॉन्ट्रेक्ट किलर? अपने से उम्र में दोगुनी बड़ी शकीला के साथ? पता नहीं…

मुंबई में एक समय बियर बार का अच्छा खासा क्रेज था, खासकर बार में नाचने वाली बार डांसरों का। ये लड़कियां कहां से आती हैं? क्या होता है बार के अंदर और उनकी जिंदगी में? क्या करती हैं अपनी कमाई का और बार में आने वाले अपने आशिकों का? शबनम का असली नाम सुरेखा है। अधिकांश बार डांसर इस व्यवसाय के लिए अपना नाम बदल लेती हैं। शबनम का परिचय देती हुई जयंती लिखती हैं—शबनम वो पहली जीती-जागती बार डांसर थी, जिसे मैंने बार के फ्लोर पर नाचते देखा, बातचीत की। उसने बार डांसर को लेकर मेरी कई भ्रांतियां तोड़ीं। कहां तो मैं समझती थी कि बार डांसर दूसरी दुनिया से आई कोई अनछुई सी अप्सरा होगी और कहां खुरदरी हथेलियों वाली शबनम। गोल चेहरा, कमर तक घुंघराले बाल, थोड़े काले, थोड़े रंग उड़े, साफ रंग, छोटी सी नाक, नाक पर बड़ी सी नथ। आंखों में गहरा काजल, बेहद पतले बने आई ब्रोज, छोटा कद, सिमटा शरीर।

जब मैंने उससे सवाल किया था कि क्या कोई भी लड़की बार डांसर बन सकती है, तो उसने मुंह बनाते हुए कहा था-हां, पर थोबड़ा-बीबड़ा तो सुंदर दीखना मांगता ना।

शबनम के बहाने मुंबई के बियर बार का जीवंत वर्णन है। वहां किस तरह हसरतों का कारोबार होता है और कैसे बार के अंदर व्यापार होता है। कैसे जमीन पर बिखरे नोट वेटर झाडू से उठाते हैं, कैसे बार डांसर को कमीशन मिलता है और उनका कद बढ़ता है। बार के अंदर बने तहखाने जहां विशिष्ट मेहमानों को विशेष सेवाएं उपलब्ध रहती हैं। इन सब प्रसंगों के साथ अमजद और शबनम का प्रेम प्रसंग भी चलता है। अंतिम बार जब लेखिका शबनम से मिलती है, वह दुबई जाने ने निर्णय ले चुकी होती है। उसकी कहानी को पूरा करती हुई जयंती लिखती हैं, शबनम से मिलना और बार डांसरों के बारे में जानना एक इंतहाई चौंकाने वाला अनुभव रहा। गुरूर से भरी शबनम और अपनी स्थिति से संतुष्ट गायत्री का मकाम शायद एक ही हो, पर याद रह गई शबनम…उसका उद्दात यौवन, बड़बोलापन, मुंहफट अंदाज, बदतमीजी और अक्खड़पन…

तीसरे संस्मरण के केंद्र में है उस दुनिया की ज्योति। एक आम आदमी उस दुनिया के बारे में कितना कम जानता है, यह पता चलता है इस संस्मरण से। ज्योति दक्षिण भारत से है, लेखिका से उसकी दोस्ती इसलिए हो पाती है क्योंकि दोनों की भाषा एक ही है। जन्म से सुरेश के ज्योति बनने तक की कहानी कहीं भावुक बनाती है तो कहीं यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे समाज में हाशिए पर रहने वालों के लिए कोई स्थान नहीं है। ज्योति दूसरे हिजड़ों की तरह देह व्यापार में नहीं है। उसकी गुरू अम्मल उसका बहुत ध्यान रखती है। भोली है ज्योति। लेकिन क्या अपने भोलेपन के साथ वह हिजड़ों की बस्ती में अपना बसर कर पाती है? एक डाक्यूमेंट्री फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में वह मिलती है। अपने रिहाइश लेकर जाती है, अपनी बिरादरी की शादी दिखाती है। ज्योति से आपको हमदर्दी नहीं होती, तरस नहीं आता, बल्कि उस पर बेतहाशा प्यार आता है। लेखिका को अपनी कहानी बताते हुए ज्योति कहती हैं—मैं सच में लकी है। अम्मल जैसी गुरू मां सब गुरू नहीं होतीं, मेरे को बाद में पता चली, मेरे जैसी यंग हिजड़ा के लिए तो बोली लगती है। मैंने पहले ही दिन अम्मल को बता दी मैं किस फैमिली से आई, लाइफ में क्या करना चाहती। अम्मल ने मेरे कू बहुत संभाल के रखी। वो मेरे को बधाई और हफ्ते के काम में लगाई। बाकि सब चेली उनसे लड़ती, ज्योति को धंधे पर क्यों नहीं लगती? ये तो खूब कमाई करेगी। अम्मल पूछी मेरे को, तू सेक्स वर्कर बनेगी? मैं बोली नको, मैं शादी के बादइच सेक्स करेगी।

हिजड़ों और ट्रांस जेंडर की दुनिया अंदर कदम रखने के बाद आप महसूस करते हैं कि ये हमारे ही अपने लोग हैं। बस हमारी संवेदनाएं सही स्थान पर होनी चाहिए।

बेहद पठनीय है यह किताब। हर चरित्र बेहतरीन तरीके से उभर कर आया है। चूंकि यह कहानी नहीं है इसलिए आप यहां किसी तरह के अंत की अपेक्षा नहीं कर सकते।

पुस्तक: बॉम्बे मेरी जान

लेखिका: जयंती रंगनाथन

प्रकाशन: वाणी प्रकाशन

कीमत: 350 रुपए हार्डकवर