8 जून विश्व महासागर दिवस : पृथ्वी पर जीवन का आरंभ महासागरों से ही, जीवन एवं आजीविका के लिए इनका सरंक्षण जरुरी – योग गुरु महेश अग्रवाल

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योग गुरु महेश अग्रवाल ने कहा कि मानव जीवन में महासागरों की महत्वपूर्ण भूमिका और इनके संरक्षण के लिए अनिवार्य प्रयासों के संबंध में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 8 जून को ‘विश्व महासागर दिवस’ मनाया जाता है। जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा, पारिस्थितिकी संतुलन, जलवायु परिवर्तन, सामुद्रिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग इत्यादि विषयों पर प्रकाश डालना और महासागरों की वजह से आने वाली चुनौतियों के बारे में दुनिया में जागरूकता पैदा करना ही इस दिवस को मनाने का प्रमुख कारण है।

दरअसल हमारे जीवन में समुद्रों का बहुत अहम स्थान है और दुनियाभर के महासागर बढ़ते मानवीय क्रियाकलापों के कारण बुरी तरह प्रदूषित हो रहे हैं, इसलिए इस दिवस के आयोजन का प्रमुख उद्देश्य समुद्रों की साफ सफाई के प्रति जन जागरूकता फैलाना और रोजमर्रा के जीवन में महासागरों की प्रमुख भूमिका का स्मरण कराना है।

यह दिवस महासागरों को सम्मान देने, उनका महत्व जानने तथा उनके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाने का अवसर प्रदान करता है। दरअसल भोजन और दवाओं के प्रमुख स्रोत तथा जीवमंडल का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं महासागर, इसीलिए इनका संरक्षण बेहद जरूरी है। महासागरों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से बड़ा महत्व और पृथ्वी पर जीवन का आरंभ इन्हीं महासागरों से ही माना जाता है। ऐसा माना गया है कि पहली बार महासागरीय जल में ही जीवन का अंकुर फूटा था लेकिन आज यही महासागर प्रदूषण के बोझ से कराह रहे हैं।

दरअसल दुनिया में विकास की रफ्तार तेज होने के साथ महासागरों के दूषित होने की गति भी उसी तेजी से बढ़ती गई है। पृथ्वी पर वायु और जल ही जीवन के आधार हैं और हमारी पृथ्वी का करीब दो तिहाई हिस्सा महासागरों से घिरा है, जिनमें पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल का करीब 97 प्रतिशत जल समाया हुआ है| इस साल 2021 की थीम ‘महासागर: जीवन और आजीविका’ है। इस दिन को मनाने के पीछे उद्देश्य है कि मानव जीवन में समुद्र से होने वाले लाभों के बारे में जागरूकता पैदा की जाए। हमारी जिम्मेदारी बनती है कि सतत विकास के लिए समुद्र और समुद्री संसाधनों का संरक्षण किया जाए।

धरती बनाने के लिए समुद्र मंथन जरूरी था, क्योंकि उस वक्त धरती का छोटा सा हिस्सा ही जल से बाहर था, बाकी हर जगह पानी ही पानी था। इसके लिए केवल देवता ही काफी नहीं थे। देवताओं के साथ राक्षसों की शक्ति का भी प्रयोग होना था। राक्षस राजी हो गए, क्योंकि समुद्र मंथन से जो अमृत मिलता, वह उन्हें अमर कर देता । त्रिदेव ने लीला रची और इंद्र से ऋषि दुर्वासा का अपमान हो गया। इंद्र को अपने सिंहासन से हाथ धोना पड़ा, तब वह विष्णु की शरण में गए और उनकी सलाह पर वह सागर का मंथन

करने के लिए तैयार हुए मंथन से निकलने वाले अमृत को देवताओं को पिलाना था। मंदार पर्वत और वासुकि नाग की सहायता से समुद्र मंथन की तैयारी शुरू हुई।  विष्णु ने कछुए का रूप लेकर मथनी बन मंदार पर्वत अपनी पीठ पर रखा और उसे समुद्र में नहीं डूबने दिया। सबसे पहले विष निकला जिसे देवताओं और राक्षसों दोनों ने लेने से मना कर दिया। इससे सृष्टि नष्ट हो सकती थी, इसलिए शिव जी ने इस विष का पान किया, लेकिन पार्वती के प्रयत्नों से विष शिव के गले में ही अटक गया और उनका गला नीला हो गया, इसलिए शिव नीलकंठ कहलाए।

समुद्र मंथन के वक्त कई और चीजें भी निकलीं जैसे कामधेनु गाय, उच्चैश्रवा नामक सफेद घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, धन की देवी, देवों के चिकित्सक धनवंतरि आदि। अंत में अमृत के लिए सभी इंतजार कर रहे थे। असुरों के हाथ न लगे, इसलिए विष्णु ने मोहिनी बन कर असुरों का ध्यान अमृत से हटाया और देवताओं को अमृत-पान कराया। समुद्र मंथन में छिपे जीवन उपदेश और इस पौराणिक कथा का आध्यात्मिक संबंध है। आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो समुद्र का अर्थ है शरीर, और मंथन से अमृत और विष दोनों निकलते हैं। इस कहानी के किरदार हमारे जीवन से मेल खाते हैं जैसे देवता सकारात्मक सोच और समझ को दर्शाते हैं वहीं असुर नकारात्मक सोच एवं बुराइयों के प्रतीक हैं।

  • समुद्र -समुद्र हमारे दिमाग के समान दिखाया गया है, जिसमें कई तरह के विचारों एवं इच्छाओं की उत्पत्ति होती है और समुद्र की लहरों के समान यह भी समय-समय पर बदल जाती हैं।
  • मंदार पर्वत -मंदार, अर्थात मन और धार, पर्वत आपकी एकाग्रता को दर्शाता है, क्योंकि यह एक ही दिशा में सोचने की बात कहता है।
  • कछुआ – कथा में कछुए यानी विष्णु जी ने अहंकार को हटा कर समुद्र मंथन का सारा भार अपनी पीठ पर लिया। ऐसे ही हमें भी अहंकार को हटा कर सबके हित में अथवा एकाग्रता की राह पर चलना चाहिए।
  • विष और मोहिनी – विष या हलाहल जीवन से जुड़े दुःख और परेशानियों का प्रतीक है। विष को पीने वाले महादेव बाधाओं को दूर करना सिखाते हैं। मोहिनी यानी ध्यान का भटकना,जो हमें हमारे लक्ष्य से दूर करता है।
  • अमृत – अमृत हमारे लक्ष्य यानी जीवन के सार को दर्शाता है। मंथन के दौरान पाई जाने वाली वस्तुएं सिद्धियों की प्रतीक हैं। यह सिद्धियां भौतिक दुःख दूर करने के बाद प्राप्त होती हैं।

समुद्र मंथन का प्रतीक दर्शन यही है कि परिस्थतियां कितनी भी बुरी क्यों न हों कभी भी निराश नहीं होना चाहिए। कोई न कोई मार्ग अवश्य निकल आता है और स्थिति पहले जैसी हो जाती है। आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल कई वर्षो से निःशुल्क योग प्रशिक्षण के द्वारा लोगों को स्वस्थ जीवन जीने की कला सीखा रहें है वर्तमान में भी ऑनलाइन माध्यम से यह क्रम अनवरत चल रहा है | योग प्रशिक्षण के दौरान केंद्र पर योग साधकों को जल के महत्व के बारे में बताते हुए नदी तालाब समुद्र एवं महासागर के सरंक्षण के लिए जागरूक किया जाता है |